ताज़ा खबर
 

शिक्षा: आशंकाओं का आकाश

देश के बच्चों के ‘बड़े’ होने में केवल माता-पिता, स्कूल-अध्यापक, पाठ्य पुस्तकों का योगदान नहीं होता है। उन पर इसका भी प्रभाव पड़ता है कि भारत की संसद कैसे अपना कार्य-निष्पादन करती है और देश में न्याय लोगों को कितनी सुगमता से मिल पाता है। जब बच्चे दूषित हवा-पानी की वजह से बीमार होते हैं तो वे भी यह पता लगा लेते हैं कि इसके लिए कौन जिम्मेवार है और क्यों है!

इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

शिक्षा का वर्तमान परिदृश्य 2018 में जहां लगातार बढ़ रहे साधन-संपन्न वर्ग के लिए अनेक संभावनाएं उजागर करता दिखाई देता है, वहीं अधिकतर बच्चों और युवाओं के लिए वह आशंकाओं के आकाश का विस्तार बन कर उभरता है। इस समय शिक्षा में युवाओं के समक्ष प्रतिस्पर्धा का जो स्वरूप उभरा है, वह प्रतिभा और समानता के अवसरों के बरक्स नवअभिजात वर्ग के बीच की खाई को निर्बाध बढ़ा रहा है। एक तरफ निजी स्कूलों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में बढ़ती सुविधाओं और उसके लिए अंधाधुंध फीस बढ़ाने की प्रक्रिया तेज है, वहीं ‘सरकारी’ संस्थान हर स्तर पर कमी से और अधिक ग्रसित होते जा रहे हैं। किसी भी देश के विकास की गाथा उसके स्कूलों और उच्च शिक्षा संस्थानों में लिखी जाती है। अगर इनके द्वारा ही अस्वीकार्य वर्गभेद पैदा हो रहा हो तो शायद हरेक देशवासी को गंभीरता से स्थिति पर चिंतन करना चाहिए।

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय तीस करोड़ लोगों की अपेक्षाएं आज उन्हीं संसाधनों में एक सौ तैंतीस करोड़ लोगों में विस्तार पा चुकी है। परिवर्तन की तेजी से सभी परिचित हैं। ज्ञान भंडार तीन वर्षों के अंतराल में लगभग दोगुना हो जाता है। कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि समाज और शिक्षा के परिवर्तन भले ही समसामयिक परिस्थितियों में चकाचौंध पैदा करते हों और वैश्वीकरण के साथ लगातार बढ़ाते भौतिकवाद के परिणाम लगते हों, समस्याओं का पहले का मूल आधार नया नहीं है और इसे आज से सौ साल पहले भी प्रकांड विद्वानों, विचारकों और अध्येताओं ने पहचाना था! मगर उनके समाधान की ओर कभी ध्यान नहीं दिया गया। इसी कारण अब वे विकराल रूप में सामने आकर खड़ी हो गई हैं। शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने और उसे बढ़ाने के लिए पाठ्यक्रम, संस्थागत सुविधाएं और संसाधनों की उपलब्धता, कर्मठ अध्यापकों की उपस्थिति जैसे अवयव आवश्यक हैं, मगर यही काफी नहीं हैं। शिक्षा से इतर संस्थाएं, सामाजिक नेतृत्व, राजनेताओं की साख, प्रशासन पर लोगों के विश्वास की स्थिति और ऐसे अनेक पक्ष हैं जो बच्चों और युवाओं के मन-मष्तिष्क को प्रभावित करते हैं। देश के बच्चों के ‘बड़े’ होने में केवल माता-पिता, स्कूल-अध्यापक, पाठ्य पुस्तकों का योगदान नहीं होता है। उन पर इसका भी प्रभाव पड़ता है कि भारत की संसद कैसे अपना कार्य-निष्पादन करती है और देश में न्याय लोगों को कितनी सुगमता से मिल पाता है। जब बच्चे दूषित हवा-पानी की वजह से बीमार होते हैं तो वे भी यह पता लगा लेते हैं कि इसके लिए कौन जिम्मेवार है और क्यों है!

आठ अक्तूबर 1926 को महात्मा गांधी ने ‘यंग इंडिया’ में लिखा था- ‘विषय-विकारों से भरे वायुमंडल का अनजान और गुप्त प्रभाव देश के स्कूलों में जाने वाले बालकों के मन पर पड़े बिना नहीं रह सकता। शहरी जीवन की परिस्थिति, साहित्य, नाटक, सिनेमा, घर की व्यवस्था, कई सामाजिक रूढ़ियां और क्रियाएं एक ही चीज- विषय-विकार को भड़काती हैं। जिन बच्चों को अपने भीतर के पशु की खबर लग जाती है, वे उस वातावरण के प्रभाव का विरोध नहीं कर सकते। जाहिर है, बड़ों को अपने बालकों और जवानों के प्रति अपना कर्तव्य अदा करना हो तो उन्हें अपने में सुधार आरंभ कर देना चाहिए।’ इस कथन का आज भी उतना ही महत्त्व है। संसद और विधानसभाओं की कार्यप्रणाली से अब सभी परिचित हैं और उसका सीधा प्रसारण भी देखते हैं। इन संस्थाओं के प्रति देश में 1950-60 के दौरान कितनी श्रद्धा और कितना सम्मान था, इसे वही बता सकते हैं जिन्होंने इसे जाना था। आज सामान्य जनजीवन, प्रशासन और व्यवस्था में जिस प्रकार अविश्वास बढ़ा है, निराशा का वातावरण पैदा हुआ है, उसे बदलने में समाज के हर वर्ग को अपना उत्तरदायित्व निभाना होगा।
कई बार नई पीढ़ी पर दोषारोपण किया जाता है कि उनके अंदर श्रद्धा कम हो रही है, उनकी अपनी प्रगति और ज्ञानार्जन में रुचि नहीं है! ऐसा कहने वाले लोग अपने उत्तरदायित्व और समाज में भयावह रूप से बढ़ी स्वार्थपरकता को भूल जाते हैं जो ऐसी प्रवृत्तियों को जन्म देती है। जब किसी शिक्षा संस्थान के अध्यापकों के ऊपर यौन शोषण के आरोप लगते हैं और सही पाए जाते हैं, तब यही सिद्ध होता है कि वर्तमान पीढ़ी उन परंपरागत मूल्यों को जी नहीं पाई, जिन्हें गांधीजी ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय पुनर्जीवित कर दिया था और सारे देश ने उन्हें व्यावहारिक रूप में अंतर्निहित कर लिया था। दुर्भाग्य से जैसे-जैसे पीढ़ियां बदलीं, मानवीय मूल्यों का अनुपालन और मानवीय संवेदनाएं क्षीण होती गर्इं। इस सबमें युवा पीढ़ी का दोष नहीं हो सकता है।

आज की स्थिति का अनुमान दूरदृष्टि रखने वालों के लिए कठिन नहीं था। गांधीजी को भारत, उसके लोगों और उनकी अपेक्षाओं और संस्कृति की अद्भुत समझ थी। गांधी वांग्मय के खंड ग्यारह में उद्धृत उनकी भविष्य-दृष्टि इसका उदाहरण है- ‘शिक्षा जो सुख-समृद्धि का साधन मानी जाती है, (हमारे लिए) घोरतम दुर्दशा का कारण सिद्ध हुई है। पढ़ते-पढ़ते शरीर तो चौपट हो ही जाता है। पढ़ाई-लिखाई के तरीके ऐसे हैं कि पढ़ने वाला तन, मन और धन से बिल्कुल खोखला हो जाता है। इसके अलावा समाज में अपनी स्थिति बनाए रखने का बोझ। मनुष्य ज्यों ही कुछ समझाने-बूझने योग्य हुआ और उसने सिर उठा कर जीवनयापन करने की इच्छा की कि वह कुटुंब-परिवार के बोझ से दब जाता है।’ आज सभी मानते हैं कि बच्चों को शिक्षित करना आवश्यक है। लड़कियों की शिक्षा के प्रति ‘अनावश्यकता’ की भावना अब समाप्त हो गई है। मगर साथ ही अच्छी शिक्षा और कौशलों के प्रशिक्षण की मांग बढ़ी है। स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय तेजी से बढ़े। मगर इसके साथ ही स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक शिक्षा के स्तर में ह्रास स्पष्ट दिखाई दे रहा है। आज प्रबंधन और इंजीनियरिंग के संस्थान सैकड़ों को संख्या में बंद होने लगे हैं, क्योंकि वहां से उपाधियां लेकर निकले युवा क्षेत्र में अपेक्षित स्तर के ज्ञान और कौशल में कमजोर पाए गए- सौ में अस्सी! कारण ढूंढ़ना कठिन नहीं था। निजी संस्थान बड़ी संख्या में खुले, लक्ष्य केवल लाभ-अर्जन तक सीमित हो गए। सत्ता में आए राजनेताओं ने सरकारी संस्थानों में लगातार आ रही कमियों की ओर ध्यान नहीं दिया। अगर देश में स्कूल शिक्षकों के दस लाख से अधिक पद रिक्त हों, केंद्रीय विश्वविद्यालयों में चालीस से सत्तर प्रतिशत प्राध्यापक नियुक्त न किए गए हों तो शिक्षा की गुणवत्ता और स्तर नीचे तो आएंगे ही! इस स्थिति के बनाने में युवा पीढ़ी को दोष कैसे दिया जा सकता है। यह तो नीति निर्धारकों का उत्तरदायित्व था कि वे सारी नियोजन प्रक्रिया में यह व्यवस्था करते कि गुणवत्ता सुधार पर पहले से अधिक ध्यान दिया जाए। लेकिन हमारी शिक्षा व्यवस्था उत्साह, उद्यमिता और नवाचार पर अधिक ध्यान न पहले देती थी और न अब दे पा रही है। हालांकि इस संबंध में नई-नई योजनाओं की घोषणाएं होती रहती हैं। अपेक्षा यही करनी चाहिए कि शिक्षा नीति, नया पाठ्यक्रम और नई पाठ्य पुस्तकें भारत की शिक्षा को नई दिशा देने में सक्षम होंगे।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App