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वक्त की नब्ज: यह जीत उन्हें नहीं पच रही

जिस राजवर्ग को मोदी ने कमजोर किया है प्रधानमंत्री बनने के बाद, वह अभी तक स्वीकार नहीं कर पाया है कि भारत बदल गया है और इस नए भारत में उनको कभी वह जगह नहीं मिलने वाली, जो कभी उनकी थी।

Author May 26, 2019 4:45 AM
शानदार जनादेश के बाद कार्यक्रम में लोगों का अभिवादन स्वीकारते हुए पीएम मोदी। (फाइल फोटो)

पिछले हफ्ते जब भारत के मतदाताओं ने स्पष्ट कर दिया प्रचंड बहुमत देकर कि उनको मोदी पसंद हैं, एक वर्ग था जो खुश नहीं था। इस वर्ग को नरेंद्र मोदी ने हाल में खान मार्केट गैंग का नाम दिया अपने एक इंटरव्यू में, लेकिन दिल्ली के दायरे से कहीं दूर तक है इस वर्ग का असर। इसलिए कि अंग्रेजों के जाने के बाद इस वर्ग के कब्जे में रहा है पूरा भारत। इस वर्ग के हाथ इतने लंबे हैं कि राजनीति और शासन से लेकर पुलिस और सेना तक है इनकी पहुंच। बुद्धिजीवी, बॉलीवुड के बड़े सितारे और मुंबई के बड़े उद्योगपति भी इनके असर में रहे हैं। इस वर्ग को आम भारतीय अंग्रेजों की औलाद कहते हैं, क्योंकि अंग्रेजी है इस वर्ग की मातृभाषा और इनको ताकत मिलती आई है नेहरू-गांधी परिवार की गुलामी करने से। लेकिन इस बात को ये छिपा कर रखते हैं समाजवाद, सेक्युलरिजम, उदारवाद जैसे शब्दों के कवच के पीछे।

इस वर्ग की शक्ति कमजोर होने लगी थी 2014 के आम चुनावों के बाद, जब एक चायवाले के बेटे ने साबित कर दिखाया कि लोकतंत्र का असली मतलब है कि एक चायवाले का बेटा भी बन सकता है देश का प्रधानमंत्री। ऐसा जब हुआ तो लोकतंत्र की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले इस वर्ग के सदस्य थोड़ी देर के लिए खामोश हो गए, लेकिन बहुत थोड़ी देर के लिए। फिर लग गए नरेंद्र मोदी को हर तरह से बदनाम करने में। सो, जो लोग बिल्कुल चुप थे उस दौर में जब भारत में हर साल हुआ करते थे दंगे-फसाद, ऊंची आवाज में चिल्लाने लगे जब मोदी के दौर में गोरक्षकों ने मुसलमानों और दलितों पर हमले करना शुरू किए। हमले गलत थे और अगर मोदी के इस दौर में फिर से होने लगते हैं, तो उम्मीद करनी चाहिए हमें कि इस बार वे चुप नहीं रहेंगे, ताकि इस वर्ग को फिर से हावी होने का मौका न मिले। वैसे ढूंढ़ लेंगे जरूर कोई न कोई दूसरा मुद्दा मोदी को बदनाम करने के लिए जैसे पिछले पांच सालों में हुआ है। कभी देश को बांटने का दोष लगाया मोदी पर, कभी रफाल में चोरी करने का, कभी लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का, तो कभी इतिहास की किताबों के साथ छेड़खानी करने का। ऐसा उन्होंने इसलिए किया, क्योंकि मोदी के आने के बाद उनको पहली बार अहसास हुआ है अपनी शक्ति के कमजोर होने का।

इस लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपनी तमाम उम्मीदें राहुल गांधी से जोड़ रखी थीं। मीडिया चूंकि उनके हाथों में है, सो पिछले कुछ महीनों में पूरी कोशिश की है इन्होंने राहुल गांधी को एक काबिल राजनेता के रूप में पेश करने की। इस प्रयास को उन्होंने और तेज किया जब राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ को राहुल गांधी ने जीत कर साबित किया कि कांग्रेस पार्टी उनके नेतृत्व में चुनाव जीत सकती है।इस वर्ग की समस्या यह है कि असली भारत से उनका बहुत कम वास्ता रहता है, सो इनको जरा भी जानकारी नहीं थी मोदी की लोकप्रियता की। न ही उनको कभी मालूम पड़ा कि ‘चौकीदार चोर है’ जब कांग्रेस अध्यक्ष चिल्लाते फिरते थे, तो वे अपना नुकसान ज्यादा और मोदी का कम कर रहे थे। इस वर्ग की दूसरी समस्या यह थी कि उनको बिल्कुल नहीं मालूम था कि ग्रामीण भारत में आम लोगों के जीवन में कितना परिवर्तन आया है पिछले पांच सालों में। सड़कें बनी हैं वहां, जहां नहीं हुआ करती थीं। पक्के घर बने हैं, जहां कच्ची बस्तियां होती थीं। शौचालय और स्कूल बने हैं, पानी, बिजली और गैस पहुंची है उन गांवों में, जहां इन चीजों की कभी किसी को उम्मीद ही नहीं थी।

मोदी की लोकप्रियता का राज है इन योजनाओं की सफलता। लेकिन परिणाम आते ही इस अंग्रेजीभाषी भारत के दशकों से राज करने वाले वर्ग के बुद्धिजीवियों ने टीवी की चर्चाओं में कहना शुरू कर दिया कि मोदी जीते हैं नफरत और जहरीले किस्म का राष्ट्रवाद फैला कर। विदेशी पत्रकारों पर इस वर्ग की बातों का गहरा असर होता है, क्योंकि बातें करते हैं अंग्रेजी में ये लोग। सो, परिणाम आने के अगले दिन न्यू यॉर्क टाइम्स में एक लेख छपा, जो इस वर्ग के एक प्रसिद्ध लेखक ने लिखा, जिसमें लेखक ने साबित करने की कोशिश की कि मोदी की इतनी बड़ी जीत का एक ही कारण है और वह है हिंदुत्व के नाम पर जहरीला राष्ट्रवाद फैलाना। भारतीय अखबारों में भी इस तरह के लेख छपने लगे हैं अभी से, क्योंकि जिस राजवर्ग को मोदी ने कमजोर किया है प्रधानमंत्री बनने के बाद, वह अभी तक स्वीकार नहीं कर पाया है कि भारत बदल गया है और इस नए भारत में उनको कभी वह जगह नहीं मिलने वाली, जो कभी उनकी थी। कभी उनके लिए लोकसभा भी एक क्लब था, जिसमें वे अपने कब्जे में रखा करते थे अपने चुनाव क्षेत्रों को निजी जायदाद बना कर अपने वारिसों के हवाले करके। इत्तेफाक नहीं है कि कांग्रेस पार्टी के आधे से ज्यादा नौजवान सांसद किसी राजनेता के वारिस हैं। इस बार ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे महाबली भी हार गए हैं। कोई इत्तेफाक नहीं है कि परिवारवाद को इस बार मतदाताओं ने नकारा है राजनीतिक राजकुमारों और राजकुमारियों को हरा कर। परिणाम आने के बाद राहुल गांधी ने नम्रता और तहजीब से मोदी को बधाई दी। लेकिन थोड़ी ही देर में शुरू हो जाएंगे उसी किस्म के वार मोदी पर, जो उनके पिछले दौर में हुए थे। इसलिए कि जिस राजवर्ग और राजघराने को उन्होंने बेघर, बेहाल किया है वे इतनी आसानी से नहीं कबूल करेंगे कि ‘नए भारत’ में उनकी जगह अब वहीं है, जहां आम नागरिकों की होती है।

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