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सूचना के संजाल में छीजती संवेदना

समाज में साहित्य के लिए जगह लगातार कम होती जा रही है। प्राय: ऐसा प्रतीत होता है कि समाज को साहित्य की कोई जरूरत नहीं है। समाज की प्राथमिकता से साहित्य का गायब होना चिंता से अधिक चिंतन का विषय है।
Author April 15, 2018 02:24 am
समाज में साहित्य के लिए जगह लगातार कम होती जा रही है। प्राय: ऐसा प्रतीत होता है कि समाज को साहित्य की कोई जरूरत नहीं है। समाज की प्राथमिकता से साहित्य का गायब होना चिंता से अधिक चिंतन का विषय है।

समाज में साहित्य के लिए जगह लगातार कम होती जा रही है। प्राय: ऐसा प्रतीत होता है कि समाज को साहित्य की कोई जरूरत नहीं है। समाज की प्राथमिकता से साहित्य का गायब होना चिंता से अधिक चिंतन का विषय है। साहित्य के नए पाठक बन नहीं रहे हैं और जो पुराने हैं वे धीरे-धीरे विदा हो रहे हैं। हम एक तरह से क्रमश: साहित्य विहीन समाज की ओर बढ़ रहे हैं। साहित्य पढ़ने-पढ़ाने वाले के सिवा साहित्य का सामान्य पाठक अब पूरी तरह परिदृश्य से गायब हो चुका है। जिस भाषा को बोलने वाले करोड़ों में हों, उस भाषा के साहित्य का पाठक विहीन होना कम आश्चर्यजनक बात नहीं है। किसी भाषा और उसके साहित्य के बीच ऐसा अलगाव हिंदी के अलावा दुनिया की किसी भी भाषा में नहीं है।
साहित्य के प्रति उदासीनता धीरे-धीरे भाषा के प्रति उदासीनता में बदल जाती है। भाषा के प्रति स्वत्व और स्वाभीमान का भाव अंतत: खत्म हो जाता है। एक बड़ा प्रश्न है कि हिंदीभाषी जनता का अपने साहित्य के प्रति कोई लगाव क्यों नहीं है? यहां पुस्तक संस्कृति इस कदर कैसे खत्म होती गई? दरअसल, संस्कृति सदा समाज सापेक्ष होती है। समाज के अनुरूप ही उसका निर्माण और विनाश होता है। अगर आज पुस्तक संस्कृति खत्म हो रही है, तो इसका सबसे बड़ा कारण वर्तमान समाज है। ऐसा लगता है कि समाज ने मान लिया है कि उसे पुस्तकों की जरूरत नहीं है। साहित्यिक पुस्तकों की कौन कहे, अब तो पाठ्य-पुस्तकों के प्रति भी एक हिकारत का भाव देखा जा सकता है। पुस्तकें पिछड़ेपन का प्रतीक मान ली गई हैं। समाज ने अपने विकास के जो प्रतिमान और रास्ते तय किए हैं, उसमें किताबों की कहीं कोई उपयोगिता नहीं है।

यह समाज उपयोगिता के विचार से आक्रांत है। वह हर चीज को उपयोगिता की कसौटी पर कसता है। जो इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता, वह या तो धीरे-धीरे नष्ट हो जाता या उसे सप्रयास नष्ट कर दिया जाता है। उपयोगिता को साध्य मानने वाला समाज यह कैसे सोच सकता है कि कुछ चीजों पर उपयोगिता का नहीं, संरक्षण का तर्क लागू होता है। साहित्य, संस्कृति और किताबें ऐसी ही चीजें हैं। सबसे अधिक दुखद बात यह है कि संरक्षण के तर्क को वे भी नहीं समझते हैं, जिनका पूरा कैरिअर साहित्य पर निर्भर होता है और उसी की बदौलत मोटी तनख्वाह पाते और अनेक भौतिक सुविधाएं जुटाते हैं। ऐसे लोगों में हिंदी के अध्यापक सर्वप्रथम हैं।

हिंदी भाषा और साहित्य की कमाई खाने वाले इस वर्ग का पुस्तकों के प्रति रवैया घोर उपेक्षा का होता है। जिनके पास कुछ किताबें होती हैं वे प्राय: इस बात का रोना रोते हैं कि किताबों को घर में रखना बहुत कठिन हो रहा है। यह बात घर की दूसरी भौतिक वस्तुओं के बारे में कभी नहीं कही जाती है। घर में जैसे-जैसे दूसरी चीजें आती जाती हैं, किताबें बेदखल होती जाती हैं। एक दिन ऐसा भी आता है जब घर में सब कुछ होता है, पर किताबें नहीं होतीं। जिन लोगों की रोजी-रोटी साहित्य से चलती है, वे भी अगर किताबों को देश निकाला दे देते हैं, तो दूसरों से किसी तरह की उम्मीद ही व्यर्थ है।

साहित्यिक पुस्तकों के प्रति बच्चों की दिलचस्पी को प्राय: समस्या के रूप में देखा जाता है। माना जाता है कि यह दिलचस्पी उसकी सफलता में बाधक सिद्ध होगी। ऐसे माता-पिता बिरले मिलेंगे, जो बच्चे की साहित्यिक अभिरुचि के प्रति सहज हों। यानी, साहित्य के प्रति अनुराग को बचपन में ही सचेत रूप में खत्म कर दिया जाता है। अब तो हम धीरे-धीरे ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं कि बच्चों में साहित्य के प्रति कोई आकर्षण ही नहीं है। इसका एक बड़ा कारण संयुक्त परिवार का विघटन और एकल परिवार की जीवन स्थितियां हैं। जितने भी बड़े रचनाकार हुए हैं उनमें से अधिकतर की साहित्य में रुचि घर के बड़े-बुजुर्गों के कारण ही पैदा हुई। दादा-दादी, नाना-नानी आदि से बच्चे किस्से-कहानियां सुनते थे। उससे उनमें एक साहित्यिक संस्कार पैदा होता था और बहुत हद तक वे एक संवेदनशील मनुष्य बनते थे। एकल परिवार के दौर में आज यह कड़ी पूरी तरह टूट गई है। घर-परिवार के भीतर साहित्यिक संस्कार देने वाला कोई नहीं रहा। बच्चा एक साहित्य-विहीन माहौल में बड़ा होता है। साहित्य के नए पाठक पैदा न होने का यह एक बड़ा कारण है। बचपन के साहित्यिक संस्कार के कारण ही पहले विभिन्न पेशों से जुड़े लागों का साहित्य से ताउम्र रिश्ता बना रहता था। आज साहित्य मुख्य रूप से अध्यापकों और विद्यार्थियों के बीच सिमट कर रह गया है। हिंदी पढ़ने-पढ़ाने वालों से बाहर उसका दायरा बहुत सीमित हो गया है।

आधुनिक जीवन-स्थितियों ने मनुष्य से उसका सुकून छीन लिया है। फुर्सत के पल उसके लिए वास्तविक न होकर आकांक्षा है। ऐसे में, किताब पढ़ने का धैर्य और समय दोनों उसके पास नहीं हैं। दूसरी तरफ तरह-तरह की तकनीकी विकास ने उसके पढ़ने की आदत को बुरी तरह प्रभावित किया है। ज्ञान को सूचना में अवमूल्यित कर देने का सबसे खतरनाक असर किताबों पर ही पड़ा है। किताबों की तुलना में ये सूचनाएं दूसरे तकनीकी माध्यमों से कहीं भी और कभी भी प्राप्त की जा सकती हैं। दूसरी बात यह है कि साहित्यिक किताबें हम ज्ञान के लिए नहीं पढ़ते। उनके प्रति अनुराग के पीछे एक खास तरह की अस्तित्वगत बाध्यता और मानसिक जरूरत होती है। इसकी तुलना में श्रवण और दृश्य के विभिन्न माध्यम अधिक सुगम और प्रभावकारी साबित हो रहे हैं। इन माध्यमों के असीमित विस्तार और उपस्थिति ने किताबों के साथ हमारी दोस्ती को खत्म नहीं, तो बहुत कमजोर कर दिया है।
ऐसा नहीं कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का असर सिर्फ गंभीर साहित्य पर पड़ा है। लोकप्रिय साहित्य भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं है। रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड पर बिकने वाली पुस्तकों में भी भारी कमी आई है। पहले ऐसे लोग प्राय: दिख जाते थे जो यात्रा के दौरान किताबें पढ़ते हुए समय का उपयोग करते थे। अब रेल या बस यात्राओं में पढ़ते हुए लोग यदा-कदा ही नजर आते हैं। आधुनिक उपकरणों ने संपूर्णता में हमारी पढ़ने की आदत को ही बुरी तरह नष्ट कर डाला है। बचपन से ही छपे हुए शब्दों के साथ जो एक रिश्ता बनता था, अब वह नहीं बन रहा है। आज की नई पीढ़ी मोबाइल, लैपटाप जैसे आधुनिक संचार उपकरणों के अधिक करीब है।

समाज में साहित्य की बेदखली के कारण कई तरह के संकट अब प्रत्यक्षत: दिखने लगे हैं। समाज में ज्ञान और संवेदना के बीच संतुलन लगभग चरमरा गया है। एक हृदयहीन नई पीढ़ी तैयार हो रही है, जो सूचनाओं के मामले में तो बहुत आगे है, पर मानवीय संवेदनाओं के मामले में बहुत पीछे। दरअसल, साहित्य हमारी संवेदना का विकास करता है। मनुष्य मनुष्य को समान धरातल पर जोड़ता है। वंचित तबके के प्रति सहानुभूति जगाता है। जीवन से साहित्य के अनुपस्थित होने का मतलब इन सारी प्रक्रियाओं का रुक जाना है। वर्तमान में सामाजिक विघटन का एक बड़ा कारण जीवन में साहित्य की अनुपस्थिति है। संवेदना का सीधा रिश्ता मूल्यों से है। अगर संवेदना ही नहीं बचेगी, तो मूल्य कहां से बचेंगे। समाज में साहित्य विहीनता की स्थिति अंतत: मूल्यहीनता को आमंत्रित करती है। वर्तमान दौर में संवेदना और मूल्यों का जो विघटन दिखाई दे रहा है उसके मूल में समाज से साहित्य का विस्थापन ही है।

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