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दूसरी नजर: क्या मोदी सबका भरोसा जीतेंगे

मुझे लगता है नरेंद्र मोदी खुश तो हैं, पर संतुष्ट नहीं हैं। ऐसा कुछ तो है जिसे वे समझ गए हैं और शायद उनकी पार्टी में दूसरे लोग उसे पकड़ पाने में नाकाम रहे हैं, और वह यह कि दलितों, मुसलमानों, ईसाइयों और बेहद गरीबों के वोट हासिल कर लेना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका भरोसा जीतना भी जरूरी है।

Author June 9, 2019 5:41 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। ((Express photo: Ritesh Shukla))

नरेंद्र मोदी को जो जनादेश मिला है, वह वाकई बहुत बड़ा है। निश्चित ही, पहले भी ऐसे मौके आए हैं जब लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दलों को तीन सौ तीन से ज्यादा सीटें मिली हैं। गौर करें, इंदिरा गांधी को 1980 में तीन सौ तिरपन सीटें मिली थीं, और 1984 में राजीव गांधी को चार सौ पंद्रह सीटें। लेकिन तब हालात अलग थे। इंदिरा गांधी ने एक अलोकप्रिय सरकार के खिलाफ बहादुरी से संघर्ष किया था और जेल सहित कई तरह के उत्पीड़न झेले थे और लगभग अकेले ही उन लोगों का समर्थन वापस हासिल किया, जिन्होंने उन्हें (रायबरेली में) और उनकी पार्टी को हराया था। राजीव गांधी के मामले में, वे सहानुभूति की उस लहर में जीते थे जो इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश में पैदा हुई थी।

मतदाताओं का भारी समर्थन
केवल जीती हुई सीटों की संख्या (303) ने नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर हुई भाजपा की जीत ने आश्चर्यचकित कर दिया। सिर्फ तीन राज्यों- केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश- में भाजपा सेंध नहीं लगा पाई। जीत का अंतर भी आश्चर्यजनक रूप से बड़ा रहा, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और असम में तो दोनों दलों के बीच सीधे मुकाबले में यह काफी ज्यादा रहा। जब प्रामाणिक आंकड़े नहीं हैं, चुनाव और सर्वे इस बात की पुष्टि कर चुके हैं, जैसी कि उम्मीद थी, कि हिंदीभाषी और हिंदी जानने-समझने वाले राज्यों में सवर्ण जातियों के वोट पूरी तरह से भाजपा को गए। इसी तरह अन्य पिछड़े वर्गों और दलित, मुसलमानों और ईसाइयों के भी काफी वोट भाजपा को मिले। हो सकता है, उनका मकसद कुछ और रहा हो, लेकिन तथ्य यह है कि उन्होंने भाजपा को वोट दिए।

वोट मिले, विश्वास नहीं
मुझे लगता है नरेंद्र मोदी खुश तो हैं, पर संतुष्ट नहीं हैं। ऐसा कुछ तो है जिसे वे समझ गए हैं और शायद उनकी पार्टी में दूसरे लोग उसे पकड़ पाने में नाकाम रहे हैं, और वह यह कि दलितों, मुसलमानों, ईसाइयों और बेहद गरीबों के वोट हासिल कर लेना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका भरोसा जीतना भी जरूरी है। वे जानते हैं कि अपने पहले कार्यकाल में वे उनका भरोसा नहीं जीत पाए थे, इसलिए सबका साथ सबका विकास में सबका विश्वास भी जोड़ा। यह एक चतुराई भरा कदम है, लेकिन इसमें जोखिम और मुश्किलें भी हैं। इस तरह की मुश्किलों के नाम हैं- गिरिराज सिंह, साध्वी निरंजन ज्योति और संजीव बालियान। और भी हैं जो चुन तो लिए गए, लेकिन दरकिनार कर दिए गए या चुन लिए गए और इंतजार में रखे गए हैं, जैसे- महेश शर्मा, अनंत कुमार हेगड़े, साक्षी महाराज, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और अन्य अनजाने। गिरिराज सिंह जो एक कैबिनेट मंत्री हैं, पहले ही दो सहयोगी दलों के नेताओं के इफ्तार पार्टी में जाने को लेकर बेवजह अनुचित टिप्पणी कर चुके हैं। इसके लिए उन्हें पार्टी अध्यक्ष से फटकार भी सुननी पड़ी, लेकिन उन्होंने कोई खेद व्यक्त नहीं किया। साक्षी महाराज अपनी जीत के लिए धन्यवाद देने एक कैदी से मिलने जेल पहुंच गए जो उन्नाव बलात्कार कांड में जेल में बंद है। इस बलात्कार कांड ने 2017 में देश को हिला कर रख दिया था। साक्षी महाराज को अब तक कोई डांट-फटकार नहीं लगाई गई है। बचपन या जवानी में जो पूर्वाग्रह बन जाते हैं उनसे मुक्त हो पाना आसान नहीं है। अगर संघ और भाजपा के नेता समय-समय पर इन पूर्वाग्रहों (‘ईद के लिए बिजली, दीवाली के लिए बिजली नहीं’, ‘निर्वाचन क्षेत्र जहां अल्पसंख्यक बहुसंख्यक हैं’) को हवा देते रहें तो ये मददगार नहीं होते। अगर दलितों और मुससमानों की भीड़ द्वारा हत्या की घटनाओं, जो कम से कम हफ्ते में एक बार तो हो ही जाती हैं, को नहीं रोक पाते हैं तो ये मददगार नहीं होते। अगर तीन सौ तीन सदस्यों में से एक मुसलिम समुदाय का चुन कर आ जाता है तो भी धारणा को बदलने में ये मददगार नहीं होते।

खौफ, कल्याण
एक और जटिल समस्या है। भाजपा इन वर्गों का विश्वास सिर्फ तभी जीत सकती है जब दो शर्तों को पूरा करे। पहली शर्त यह है कि किसी को भी खौफ में नहीं रहना चाहिए। दूसरी शर्त यह है कि धीरे-धीरे उनका आर्थिक स्तर सुधरना चाहिए। आज दोनों में से कोई भी शर्त पूरी नहीं हो पाई है, इसलिए अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इन दो शर्तों को पूरा करने के लिए कैसे बढ़ती है। खास वर्गों के मन से खौफ खत्म करने के लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत है। जब कभी किसी अपराध के लिए सजा न दी जाए तो अपराधी और सजा न देने वालों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। क्या भाजपा उन लोगों को दंडित करेगी, जिन्होंने सजा देने में कोताही बरती और खौफ फैलाया? यह भारी काम है। आज के हालात में तो यह संभव नहीं दिखता, लेकिन मुझे उम्मीद है कि भाजपा नेतृत्व उन लोगों के खिलाफ अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करेगा जो आपराधिक कृत्यों में शामिल हैं। दूसरी शर्त दरअसल पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में नहीं है। उदासीन वर्गों का आर्थिक स्तर तभी सुधरना शुरू हो पाएगा जब उन्हें और रोजगार मिलेंगे, और ज्यादा रोजगार सुरक्षा मिलेगी, उनकी आमद बढ़ेगी और सार्वजनिक वस्तुओं और सेवाओं तक उनकी पहुंच बेहतर होने लगेगी। रोजगार और आमद उच्च और न्यायसंगत आर्थिक वृद्धि से ही सृजित होती हैं। और 2018-19 का साल किस निराशाजनक स्थिति के साथ खत्म हुआ है कि उच्च और न्यायसंगत विकास दर का दूर तक नाम नहीं है। मुझे संदेह है कि दलित, मुसलिम, ईसाई और गरीबी रेखा से नीचे के तबके के लोगों ने भाजपा के उम्मीदवारों को वोट इसलिए दिया कि कोई और दूसरा उम्मीदवार चुनाव जीतता नहीं लगा और निश्चित रूप से कोई दूसरा उम्मीदवार जीतता हुआ नहीं लग रहा था। यह समझदारी का वोट था, यह विश्वास का वोट नहीं था। इनका भरोसा जीतने के लिए भाजपा को अभी काफी कुछ करना है। यह असाधारण स्थिति है। भाजपा ने अपने उत्साही समर्थकों (जिनकी नजरों में मोदी गलत नहीं कर सकते) और उदासीन वर्गों (जिनकी नजर में मोदी ने अब तक कुछ नहीं किया है) के वोटों के सहारे सरकार बनाई है।
यह देखना दिलचस्प होगा कि संसाधन संपन्न मोदी कैसे इस समंदर में बिना नक्शे के रास्ता तलाशते हैं।

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