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किसान आंदोलन की मुश्किलें

किसान आंदोलन इसलिए भी विफल हो रहे हैं, क्योंकि इसके लिए जितना गहन और दीर्घकालिक संघर्ष चाहिए उतना वक्त किसान नहीं दे सकते। एक मुकम्मल कृषि-दृष्टि, विचारधारा और व्यवस्था परिवर्तन की मांग का भी अभाव रहा है। ज्यादातर नेतृत्व बाहरी रहा है, अगर नेतृत्व उनके भीतर से पनपे तो शायद वे अपनी समस्याएं और मांग को बेहतर तरीके से रख पाएं।

Author February 18, 2018 02:52 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

राजकुमार

किसान उत्पीड़न और शोषण का इतिहास जितना लंबा होगा उतना ही लंबा उसके विद्रोह का भी होगा। भले हमें इस संदर्भ में लिखित दस्तावेज कम मिलते होंं। इस बात की पुष्टि भारत में सक्रिय किसान-आंदोलन के पुरोधाओं में शामिल सहजानंद सरस्वती ने भी किया है। उनका कहना था ‘भारतीय किसानों का आंदोलन प्राचीन है। दरअसल, इस आंदोलन के बारे में लिपिबद्ध वर्णन का अभाव एक बड़ी त्रुटि है।… जब यूरोपीय देशों में किसान आंदोलन पुराना है, तो कोई वजह नहीं है कि यहां भी वैसा न हो। किसानों की दशा सर्वत्र एक-सी रही है। आज से पचास-सौ साल पहले। जमींदारों और सूदखोरों ने उन्हें सर्वत्र बुरी तरह सताया है और सरकार भी इन उत्पीड़कों का साथ देती रही है। फलत: किसानों के विद्रोह सर्वत्र होते रहे हैं।’

एंगेल्स की पुस्तक ‘दी पीजेंट वार इन जर्मनी’ और विल्हेल्म जिमरमान की ‘दी हिस्ट्री आॅफ दी ग्रेट पीजेंट वार’ आदि यूरोपीय समाज में होने वाले किसान आंदोलनों का दस्तावेज हैं। इन पुस्तकों में पांच-छह सौ साल पूर्व हुए आंदोलनों की तथ्यात्मक जानकारी है। भारतीय किसान आंदोलन के संदर्भ में ऐसे दस्तावेज इकट्ठा करना मुश्किल है। लेकिन किसानों के उत्पीड़न, शोषण, विवशता, लगान वसूली आदि को भक्तिकालीन कवियों के यहां शिनाख्त करना मुश्किल नहीं है। कबीर के पदों में कई ऐसे रूपक हैं जो बताते हैं कि जागीरदार के कारिदें लगान वसूली के लिए आए हैं और किसान को बांध कर लिए जा रहे हैं। नानक लिखते हैं- ‘राजे सींह मुकद्दम कुत्ते/ जाइ जगाइन बैठे सूते/ चाकर नहंदा पाइन्हि धाउ/ कतु पितु कुतिहा चटि जाहु/ जित्थे जिआं होसी सार/ नकीं बड़ी लाइत बार’ यानी अत्याचारी शासक शेर की तरह हिंसक है। उसके सामंत कुत्ते की तरह लालची हैं। वे निरीह लोगों को अपने नाखूनों से जख्मी कर रहे हैं और उनका खून कुत्तों की तरह चाट रहे हैं। जहां इनके कर्मों की परख होगी वहां इनकी नाक काट ली जाएगी। ‘खेती न किसान को भिखारी को न भीख, बली’ और ‘बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै’ या ‘पेट ही को पचत, बेचत बेटा बेटकी’ आदि तुलसीदास की चर्चित पंक्तियां भले अकाल पीड़ित सामान्य जन की दुर्दशा का चित्रण है, लेकिन उस दौर में किसानों ने प्रतिरोध में आवाज नहीं उठाई होगी, ऐसा संभव नहीं लगता है। अगर दरिद्रता के दस मुख हो गए हैं (दारिददसानन दबाई दुनी दीनबंधु) और वह समाज को दबाए जा रहा है तो निश्चय ही असंतोष और विप्लव का आगाज है। ये संत कवि किसानों के भीतर उभर रहे असंतोष और हलचल को महसूस कर रहे थे। और आगे यही उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में सामंतों-जमींदारों-सरकारी नौकरशाहों और साहूकारों के चंगुल में किसानों की घुटन, अंतहीन शोषण, किसान आंदोलन या विद्रोह के रूप में दिखाई पड़ता है। यही कारण है कि कुछ समयांतराल में ही एक के बाद एक किसान-आदिवासी आंदोलन उभरते रहे। नील विद्रोह, पाबना विद्रोह, तेभागा आंदोलन, चंपारण सत्याग्रह, बारदोली सत्याग्रह, मोपला विद्रोह और लंबे समय तक चलने वाले प्रभावशाली तेलंगाना कृषक आंदोलन आदि को चिह्नित किया जा सकता है। ब्रिटिश उपनिवेश में किसान दोहरे शोषण के शिकार हो रहे थे, इसलिए तमाम तरह की सख्ती, दबाव और लाचार कर दिए जाने के बाद भी आंदोलन उठ खड़े होते थे।

भारत में कृषि संस्कृति रही है। जब हम संस्कृति कहते हैं तो उसका आशय होता है जीने की एक संगीतात्मक शैली। यह सिर्फ आजीविका तक सीमित नहीं, बल्कि उसके आगे रस्मो-रिवाज, जीवन-मृत्यु की उपत्यका में पग-पग पर लिथड़ी एक मूल्यवान चीज है। अध्यात्मिक अनुभूति भी और वैचारिकी भी। इसीलिए कृषक लोक में यह खूब ध्वनित होता रहा है- ‘उत्तम खेती, मध्यम बान, निषिध चाकरी भीख निदान’। लेकिन ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने भारतीय कृषि-संस्कृति के ताने-बाने को ही तोड़ दिया। जंगल और जमीन से उनके हकों को छीन लिया। कई ऐसे कानून बना दिए, जो किसानों और आदिवासियों के विरुद्ध हो गए। हस्तशिल्प की कब्र पहले ही खोद चुके थे, जिससे कृषि पर दबाव बढ़ चला था। ऊपर से लगान की ऊंची दरें वसूलने लगे। सरकारी महकमों की मनमानी और स्वेच्छाचारिता ने उनका जीना मुश्किल कर दिया। बेदखली, बेगारी, बंधुआगिरी आदि को जबरन लादा जाने लगा। जिसे प्रेमचंद ने महाजनी सभ्यता कहा है, वह उभर आई थी। साहूकार की सूदखोरी में फंसे किसान बर्बाद होने लगे। घर, जमीन, जानवर आदि गिरवी रखते और अक्सरहां सूदखोरों द्वारा हड़प लिया जाता। जिस तरफ इतिहासकारों ने ध्यान कम या नहीं खींचा है या तथ्यों के अभाव में कह नहीं पाए हैं, वे स्थितियां भी रही होंगी। मसलन, सूदखोरों या जागीरदारों द्वारा स्त्री उत्पीड़न की। इसे ‘मदर इंडिया’ या प्रकाश झा की ‘दामुल’ के माध्यम से समझा जा सकता है। जब उनकी अस्मिता और आत्मसम्मान को चोट पहुंचती होगी तो वे विद्रोह करते होंगे।

पिछले दो दशक में हजारों किसानों की आत्महत्याएं न सिर्फ सरकारों के निष्ठुर और विफल हो जाने की कथा कहती हैं, बल्कि समानांतर रूप से किसान आंदोलन और जनआंदोलनों के भी विफल हो जाने का वृत्तांत रचती हैं। औपनिवेशिक दौर में बाबा रामचंद्र, मदारी पासी, सहदेव, बिरसा मुंडा, सहजानंद सरस्वती, गांधी, पटेल, मेड़ता बंधु, मालवीय, अली मुसलियार, नेहरू, वासुदेव फड़के, जतरा भगत जैसे नेता और किसान नेताओं के नेतृत्व में अलग-अलग किसान संगठन के भीतर आंदोलन हुए। ये ज्यादातर आंदोलन क्षेत्रीय समस्याओं के साथ उठे और उसके साथ ही समाप्त हुए। कभी भी किसान आंदोलन देशव्यापी नहीं बना। इसकी बड़ी वजह थी कि राष्ट्रीय नेताओं का मूल उद्देश्य आजादी और ब्रिटिश उपनिवेशवाद का खात्मा था। आंबेडकर के लिए भी जाति और अस्पृश्यता का सवाल ज्यादा महत्त्वपूर्ण था। तेलंगाना आंदोलन बींसवी सदी के मध्य में हुआ व्यापक किसान आंदोलन था। इसमें सीधे-सीधे किसानों की भूमिका थी। मध्यस्थ के बगैर लड़ा गया आंदोलन रहा, लेकिन यह भी देश के संपूर्ण किसानों को एकजुट नहीं कर सका। यहां विचारधारा और नेतृत्व का अभाव रहा।

जब देसी सरकार बनी, तो कृषि उत्पादन पर बल दिया गया, हरित क्रांति को भी अंजाम दिया गया, लेकिन किसान कभी सरकार के एजेंडे का हिस्सा नहीं बने। सरकारें बदलती रहीं, बजट बनता रहा और किसानों को बदलती सब्सिडी में तब्दील कर दिया गया। कभी बिजली सब्सिडी, तो कभी डीजल सब्सिडी, कभी खाद-मसाले पर सब्सिडी। किसानों को उनके उत्पादन की सही कीमत कभी नहीं मिली। बाजार भाव से नीचे फसलें बेचनी पड़ीं। न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग तक कभी पूरी नहीं हुई। शायद ही कोई वर्ष या मौसम गुजरता है जब किसानों को फसल का सही लागत मूल्य मिलता है। अक्सर उन्हें सड़कों पर अपने उत्पाद फेंकने पड़ते हैं। अभी बिहार से खबर है कि दो रुपए किलो भी टमाटर खरीदने को लोग तैयार नहीं हैं। देशभर में लगभग दो सौ किसान संगठन हैं, लेकिन वे आंदोलन करके भी किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं दिला पा रहे। कारपोरेट वर्ग की झोली में किसानों की गाढ़ी कमाई जा रही।

किसान आंदोलन इसलिए भी विफल हो रहे हैं, क्योंकि इसके लिए जितना गहन और दीर्घकालिक संघर्ष चाहिए उतना वक्त किसान नहीं दे सकते। अगर वे आंदोलन में देर तक रुके रहेंगे तो खेत वीरान होगा और परिवार परेशान। आमदनी का दूसरा जरिया न होना उनकी बड़ी समस्या है। एक मुकमल कृषि-दृष्टि, विचारधारा और व्यवस्था परिवर्तन की मांग का भी अभाव रहा है। ज्यादातर नेतृत्व बाहरी रहा है, अगर नेतृत्व उनके भीतर से पनपे तो शायद वे अपनी समस्याएं और मांग को बेहतर तरीके से रख पाएं। फौरी राहत और सब्सिडी के बजाय जीवन-स्तर में सुधार और किसानों की सुरक्षा की मांग करना बेहतर होगा, जबकि आंदोलनों में ऐसा मेनिफेस्टो कम देखने को मिलता है। खेती पर निर्भर लोग भी बेजमीन होते हैं उनके लिए खेती लायक जमीन मुहैया कराने का एजेंडा गायब है। सभी किसान संगठन एकजुट होकर क्षेत्रीय मांग की बजाय राष्ट्रीय स्तर पर एक मेनिफेस्टो बना कर मांग रखें और आंदोलन की दीर्घकालिक योजनाओं को राष्ट्रीय स्तर पर फैलाएं, ऐसा कभी देखने को नहीं आया। नेतृत्व को भी प्रलोभन देकर सरकारें तोड़ती हैं और कुछ मांगों से आश्वस्त कर आंदोलन तोड़ देती हैं। आजकल किसानों का आंदोलन लड़ने के लिए एनजीओ खड़े हो गए हैं जो खुद कई बार बिचौलियों की भूमिका में होते हैं। इन स्थितियों में किसान आंदोलन विफल हो जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं। निश्चय ही किसान आंदोलन साभ्यातिक संकट के दौर से गुजर रहा है।

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