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मुद्दा: पुलिस सुधार की जरूरत

भारत की पुलिस व्यवस्था औपनिवेशिक ढांचे पर आधारित है। चूंकि समय बदल गया है, इसलिए इस व्यवस्था में सुधार की मांग हमेशा की जाती रही है। समय-समय पर पुलिस व्यवस्था में सुधार के दावे भी किए जाते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह व्यवस्था केवल कार्यपालिका के मातहत होती, उसी से प्रेरित और उसी के प्रति उत्तरदायी भी होती है। इसलिए कि आज तक हम औपनिवेशिक पुलिस संहिता से ही शासित होते रहे हैं।

Author Published on: June 28, 2020 2:47 AM
Indian police, police reform, policing systemपुलिस व्यवस्था में सुधार की जरूरत काफी समय से महसूस की जा रही है, लेकिन यह हो नहीं पा रहा है।

बिभा त्रिपाठी
जब भी पुलिस का व्यवहार कठघरे में खड़ा होता है, नीतियों, विधियों, निर्णयों आदि पर चर्चा शुरू हो जाती है, पर हासिल कुछ नहीं होता। ऐसे में यह विचारणीय है कि पुलिस व्यवस्था में सुधार के किन बिंदुओं पर गंभीरता से विचार किया जाए। हाल में अश्वेत अफ्रीकी अमेरिकी जॉर्ज फ्लायड की मृत्यु के बाद पूरा अमेरिका पुलिस सुधार की मांग के नारों से गूंज उठा। नतीजतन ‘जस्टिस इन पुलिसिंग’ विधेयक का प्रस्ताव लाया गया, जिसमें पुलिस सुधार और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए तौर-तरीकों की चर्चा की गई, ताकि पुलिस के दुराचरण, अत्यधिक बल प्रयोग और नस्लवादी पक्षपात पर अंकुश लगाया जा सके।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 16 जून को सुरक्षित पुलिसिंग का आदेश दिया। इसमें बल प्रयोग की आवश्यकता, उसकी पूर्ववर्ती घोषणा, पुलिस का प्रशिक्षण आदि बातों पर ध्यान दिया गया है। इसके अलावा सामुदायिक पुलिसिंग और सामाजिक कार्यकर्ताओं को विधि प्रवर्तन तंत्र के साथ मिल कर कार्य करने पर भी जोर दिया गया है। भारतीय परिदृश्य में भी पुलिस सुधार की मांग उठती रही है। कभी निरीह जनता पुलिसिया प्रताड़ना का रोना रोती है, तो कभी पुलिसकर्मी ही व्यवस्था के दोषों का शिकार हो जाते हैं।

ऐसा माना जाता है कि किसी भी सभ्य समाज में हर समय किसी न किसी प्रकार की पुलिस व्यवस्था अवश्य रही है। ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1792 तक भारत की पुलिस व्यवस्था में कोई हस्तक्षेप नहीं किया। सबसे पहली बार लॉर्ड कॉर्नवालिस ने ऐसे पुलिस प्रशासन की बात की, जो कंपनी के प्रति वफादारी निभाए। तभी से दरोगा के पद का सृजन हुआ। 1860 में भारतीय दंड संहिता और 1861 में दंड प्रक्रिया संहिता के अस्तित्व में आने के बाद एक पुलिस संहिता की जरूरत महसूस की गई, जिससे आपराधिक विधि का प्रवर्तन कराया जा सके।

इसलिए 1860 में गठित पुलिस आयोग के आधार पर 1861 का पुलिस अधिनियम बनाया गया, पर इसकी आलोचना 1902 से ही प्रारंभ हो गई, जबकि लॉर्ड कर्जन ने एएचएल फ्रेजर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया और सुधार की संभावना तलाशी। उस समय से ही पुलिस व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार, उसके अपराधीकरण, प्रतिक्रियावादी और क्रूर होने पर प्रश्न उठने लगे।

पुलिस से हम सदा आज्ञाकारी, वफादार, सक्षम और कुशल होने की अपेक्षा करते हैं। अगर उसके कार्यों को देखें तो ऐसा लगता है जैसे समाज के समस्त कार्यों का भार इस एक व्यवस्था पर ही टिका हुआ है। चाहे वह अपराध नियंत्रण और निवारण का कार्य हो, कानून-व्यवस्था, जेल की व्यवस्था बनाए रखने या फिर भीड़ नियंत्रण, बीमारी, आपदा या कोई विशेष कार्यक्रम हो, किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति का आगमन हो, हर जगह अगर किसी से अपेक्षा की जाती है तो वह है पुलिस।

कार्य के इस भीषण बोझ के तले दबने वाली पुलिस कुंठाग्रस्त होकर गरीब और लाचार जनता पर बरबस ही अत्याचार कर बैठती है। ऐसे में हमें पुलिस व्यवस्था की सीमाओं को भी समझने का प्रयास करना होगा। भारत की पुलिस व्यवस्था औपनिवेशिक ढांचे पर आधारित है। चूंकि समय बदल गया है, इसलिए इस व्यवस्था में सुधार की मांग हमेशा की जाती रही है।

समय-समय पर पुलिस व्यवस्था में सुधार के दावे भी किए जाते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह व्यवस्था केवल कार्यपालिका के मातहत होती, उसी से प्रेरित और उसी के प्रति उत्तरदायी भी होती है। इसलिए कि आज तक हम औपनिवेशिक पुलिस संहिता से ही शासित होते रहे हैं। यह व्यवस्था अवर श्रेणी के पुलिसकर्मियों से आंखें बंद कर आदेशों के पालन की अपेक्षा करती है। इसीलिए कुछ विद्वानों ने यह भी कहा है कि पूरा पुलिस विभाग दो भागों में विभक्त है- सवर्ण और अवर्ण। दोनों की ही अपनी अपनी शिकायतें हैं और दोनों के खिलाफ जनता की शिकायतें।

अब पुलिस व्यवस्था में सुधार इतना महत्त्वपूर्ण हो गया है कि इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। विडंबना यह है कि पुलिस व्यवस्था में रहते हुए कोई पुलिस अधिकारी इसकी खामियां उजागर नहीं करता, पर सेवानिवृत्ति के बाद खुल कर बोलता है। 1977 में गठित राष्ट्रीय पुलिस आयोग ने 1988 तक अपनी आठ रिपोर्टें प्रस्तुत की, पर उन सुझावों पर अमल के बजाय समितियों का गठन बदस्तूर जारी रहा। सिफारिशें ठंडे बस्ते में पड़ी रह गईं। इन समितियों ने पुलिस की भी दुश्वारियां गिनाई, उनके काम का बोझ कम करने को कहा, कानून-व्यवस्था और अन्वेषण कार्य को अलग करने की बात भी की गई।

प्रकाश सिंह बनाम यूनियन आफ इंडिया के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस सुधार के मामले में महत्त्वपूर्ण दिशा-निर्देश भी जारी किए, जिसमें पुलिस के कार्य को मूलभूत कार्य और नीतिगत कार्यों के बीच में विभाजित करने को कहा गया। पुलिस अधिकारियों के कार्यकाल को निर्धारित करने की बात कही गई, ताकि हर समय उनके ऊपर स्थानांतरण की तलवार न लटकी रहे। पुलिस थानों में अत्याधुनिक सुविधाएं मुहैया कराने और पुलिस कल्याण ब्यूरो के गठन की भी बात कही गई।

वर्ष 2006 में एक मॉडल पुलिस अधिनियम भी बनाया गया और राज्यों से अपेक्षा की गई कि वे इसके अनुरूप अपने राज्य की पुलिस व्यवस्था में सुधार करें। कुछ राज्यों द्वारा विशेष उपबंध किए भी गए हैं, जिसमें चेन्नई ने कानून-व्यवस्था और अपराध नियंत्रण के कार्यों को अलग-अलग किया है। केरल में कार्य के घंटे सुनिश्चित किए गए हैं। अब एक पुलिसकर्मी को आठ घंटे अनिवार्य ड्यूटी करनी है और आपातकालीन स्थिति में ही उसे बारह घंटे तक ड्यूटी करनी होगी। यहां सामुदायिक पुलिसिंग पर भी कार्य हो रहा है। उत्तर प्रदेश की सरकार ने भी पुलिस व्यवस्था में सुधार के दावे किए हैं।

अगला महत्त्वपूर्ण बिंदु है अपराधों की प्राथमिकी न दर्ज करने की प्रवृत्ति। किसी थाने, जिले और फिर राज्य में अपराधों के अंकड़े न बिगड़ें, इसके लिए हर जतन किए जाते हैं, जो ठीक नहीं है। अपराधों का विवरण बिना उसमें किसी जोड़-घटाव के लिखा जाना चाहिए, ताकि गिरफ्तारी और दोष सिद्धि के अंतराल को कम किया जा सके।

आज यह भी आवश्यकता महसूस की जा रही है कि पुलिस विभाग में सिपाही के पद के लिए भी योग्यता को पुन: निर्धारित किया जाए। उनके वेतन का पुनर्गठन किया जाए, उनकी आवासीय सुविधाएं बढ़ाई जाएं, कार्यस्थल पर एक स्वस्थ और समृद्ध व्यवस्था दी जाए। महिला पुलिस की संख्या बढ़ाई जाए और उन्हें कार्यस्थल पर एक स्वस्थ वातावरण उपलब्ध कराया जाए, ताकि वे किसी तरह के उत्पीड़न की शिकार न हों। पेट्रोलिंग हेतु वाहनों की संख्या बढ़ाई जाए। सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं।

पुलिस थानों को अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस किया जाए। ‘मेडिकोलीगल सलाहकार समितियों’ का गठन किया जाए। पुलिस प्रशिक्षण केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए और समय-समय पर इन्हें शिक्षित-प्रशिक्षित किया जाए ताकि ये हर चुनौती का डट कर सामना कर सकें और जनता की अपेक्षाएं पूरी हों। पुलिस में सामाजिकता, नैतिकता, संवेदनशीलता और रचनाधर्मिता का विकास हो। पुलिस स्वयं एक रोल मॉडल बने और जनमानस स्वत: उसको अंगीकार करे।

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