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बाखबर: हुजूर आहिस्ता आहिस्ता

पिछले तीन दिन की सबसे बड़ी चैनल चिंता यह रही कि इकतीस मई के बाद क्या होगा? यानी ‘लॉकडाउन’ हटेगा कि बढ़ेगा? तीन दिन से हर चैनल पर यही सवाल धुने जाते हैं और फिर भी कोई नहीं बता पाता कि क्या होगा?

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कोरोना कोरोना’ करते-करते चैनल थक गए दिखते हैं। लगे हाथ, कई चैनल हमारी मानसिक थेरेपी कराने में लगे हैं कि तनावमुक्त रहना है तो योग करें, बच्चों से खेलें, लेकिन जिनको खेलता दिखाते हैं वे आम घरों के बच्चे नहीं होते!
एक अंग्रेजी एंकर हमारे मनोरंजन की खातिर एक से एक बेसुरे गवैयों और बजैयों को गाते-बजाते दिखाता रहता है, साथ ही अपने संगीत ज्ञान का प्रदर्शन भी करता रहता है!‘मनोरंजन’ करना है तो करो, लेकिन ‘मनोभंजन’ तो न करो, भैये!

एक दिन प्रियंका ने ‘ब्याज स्तुति’ की शैली में पीएम से ‘विनती’ की कि बेरोजगार प्रवासी मजदूर वर्ग का कुछ खयाल करें। एक गरीब औरत स्टेशन पर मर जाती है, उसका बच्चा उसे आवाज देता रहता है… आपसे विनती है कि कुछ करें…
शाम तक दो अंग्रेजी एंकर इस ‘लिबरल लॉबी’ की ‘ड्रामेबाजी’ को जम कर कूटते रहते हैं और चीन से पंगे के इन दिनों में इनको चीन का पक्षधर बताते रहते हैं!

कांग्रेस इन दिनों इसी तरह कुट-कुट कर खबर बनाती है!
बीते ग्यारह दिनों से संक्रमण छलांगें मार रहा है। संसद की एनेक्सी के दो तल बंद करने पड़े हैं। फिर भी कुछ एंकर तसल्ली देते रहते हैं कि संक्रमण के बढ़ते मामलों ने हमें दुनिया के नौवें नंबर पर भले पहुंचा दिया हो, लेकिन मरने वालों का आंकड़ा दुनिया में सबसे कम है!

‘दिल के बहलाने को गालिब ये खयाल अच्छा है’!
अम्फान तूफान आया तो सारे चैनल ओड़ीशा से लेकर बंगाल तक तैनात हो गए और मिनट-दर-मिनट बताते रहे कि तूफान की रफ्तार दो सौ किलोमीटर होगी कि डेढ़ सौ किलोमीटर होगी। बहरहाल, बंगाल सबसे अधिक तबाह हुआ। पीएम ने ममता के साथ हवाई दौरा किया। इस बार कोई पंगा होते न दिखा!
एक एंकर ने अपना माथा ठोका : एक ओर कोरोना का कहर, दूसरी ओर अम्फान की मार… एक ही साथ दोहरी मार! हे ईश्वर! ये क्या हो रहा है?

इस सप्ताह भी निर्मला सीतारामण के पैकेज पर सेठ लोग चर्चारत दिखे। एक अंग्रेजी चैनल पर बड़े सेठों ने देर तक विचार किया और अंत में एंकर से कहा कि सरकार ने जो दिया है वह ‘टू लिटिल टू लेट’ है। यानी ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ है।
लगता है कि जब तक सेठों की झोली नहीं भरती, तब तक आपको ‘टू लिटिल टू लेट’ ही सुनना पड़ेगा मैडम जी!

अंतरराज्यीय उड़ानें शुरू हुईं तो रिपोेर्टर एयरपोर्टों के सौंदर्य-वर्णन में कुर्बान होते रहे और बताते रहे कि देखिए, ये एयरपोर्ट कितना तो सेनिटाइज्ड है और देखो कितने कायदे से ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ हो रही है, लेकिन जब बिना बताए उड़ानें रद्द कर दी गर्इं, तो चैनलों को अपने सौंदर्यवर्णन पर लगाम लगानी पड़ी!

फिर एक दिन राहुल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कह दिया कि ‘लॉकडाउन’ एकदम फेल है और सरकार के पास कोई रोडमैप नहीं है! जवाब में पार्टी की तोपें दगने लगीं और एंकर गोले बरसाने लगे कि अगर ‘लॉकडाउन’ न करते तो अब तक सत्तर हजार मर गए होते। राहुल की ऐसी ‘आलोचना’ कोरोना के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करती है!

ठुकाई खाकर भी राहुल आजकल एक न एक कंकरी मारते रहते हैं जैसे कि फिर बोल गए कि चीन के मामले में सरकार स्थिति साफ करे?
इसे कहते हैं ‘आ बैल मुझे मार’!
अपने बीमार पिता को साइकिल पर बिठा कर बारह सौ किलोमीटर दूर ले आने वाली ज्योति कुमारी की कहानी ने जहां इवांका ट्रंप को उसकी तारीफ में ट्वीट करने को उत्तेजित किया और तेजस्वी यादव को उसे पांच लाख रुपए देने को प्रेरित किया, वहीं कुछ सत्तासीन नेताओं को ‘फोटो आॅप’ का अवसर दिया। वे ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ की ऐसी की तैसी करते हुए सदल-बल उसके घर गए, लेकिन इनमें से कोई नेता उस छोटे बच्चे को गोद में उठाने नहीं दौड़ा, जिसकी मां मुजफ्फरपुर स्टेशन पर मरी पड़ी थी और उसका छोटा-सा बच्चा उसे जिंदा समझ कर उसका कंबल खींच कर उसे पुकार रहा था! हाय!

एक महीना हो गया, तब भी प्रवासी मजदूरों का ट्रेनों, बसों के लिए मारे-मारे फिरना और मजबूर होकर पैदल चल देना थमता नहीं दिखता। इनको देख कर अगर किसी का दिल पसीजा, तो अभिनेता सोनू सूद का। उन्होंने अपने दम पर दर्जनों बसें चला कर हजारों मजदूरों को उनके घर भेजा! एक चैनल पर उन्होंने बताया कि अब उन्होंने इनके लिए एक ‘हेल्प लाइन’ भी शुरू कर दी है, जिस पर दिन-रात फोन आते रहते हैं और वे उनको घर भेजने के लिए और बसें आयोजित करते रहते हैं। सोनू सूद ने अपनी उदारता से बड़े-बड़े अभिनेताओं को हीन कर दिया!

सोनू सूद जिंदाबाद!
एक रोज, कुछ भूखे मजदूर एक ठेलेवाले के आम लूट कर ले गए! अगले रोज ठेलेवाले ने बताया कि उसके नुकसान की भरपाई करने के लिए लोगों ने उसे आठ लाख रुपए ‘आन लाइन’ भेज दिए। वह बहुत खुश है।
चैनल ने लूट की कहानी को इस तरह दिखाया, मानो कहता हो कि जैसे इसके लुटे वैसे सबके लुटें!
पिछले तीन दिन की सबसे बड़ी चैनल चिंता यह रही कि इकतीस मई के बाद क्या होगा? यानी ‘लॉकडाउन’ हटेगा कि बढ़ेगा? तीन दिन से हर चैनल पर यही सवाल धुने जाते हैं और फिर भी कोई नहीं बता पाता कि क्या होगा?
कुछ कहते हैं कि ‘खुल जा सिम सिम’, तो दूसरे कहते हैं कि ‘हुजूर आहिस्ता! आहिस्ता’!!

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