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तीरंदाज: किसान की जगह

हमें मिलकर सोचना है कि हम निजी और सामूहिक स्तर पर क्या करें, जिससे किसान और किसानी को उचित प्रतिष्ठा मिले और उसके काम को वाजिब मूल्य भी। इस प्रकार की सोच लाने के लिए हमें किसान को अपनी पृष्ठभूमि से निकाल कर सामाजिक और आर्थिक व्यस्था का केंद्र बिंदु तुरंत बनाना है।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है। (पीटीआई फाइल फोटो)

भारत एक कृषि प्रधान देश है। यह वाक्य शायद हमने कक्षा तीन या चार में पहली बार लिखा था और फिर आज तक लिखते-लिखते अघा गए हैं। पर साल-दर-साल निबंध लिखने के बाद भी हमारी पीढ़ियां न तो ग्राम समाज, कृषि और किसान के प्रति संवेदनशील हो पाई हैं और न ही हमने यह जरूरत समझी है कि पता लगाएं कि हम भारत के नागरिक जिसका दिया हुआ खाते हैं, वह किसान कैसे हमें दो जून की रोटी मुहैया कराता है। हम इससे मतलब रखना गैरजरूरी समझते हैं कि अपना खून-पसीना बहाने के बाद किसान के पेट में भी कुछ जाता है या नहीं। हम अपने में मसरूफ रहे हैं। हमने दाल, चावल, गोभी, आलू या दूध की उपलब्धता को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान कर उन सब व्यवस्थाओं से नजर फेर ली है, जिनसे भोजन की पैदावार, वितरण और मूल्य ताल्लुक रखते हैं।

भारत में किसान और उसकी उपज की स्थिति का सांख्यिकी विवरण यहां देना जरूरी नहीं है। यह काम अर्थशास्त्री वर्षों से करते आ रहे हैं। अगर आपने विश्वविद्यालय स्तर पर अर्थशास्त्र पढ़ा है, तो मालूम होगा की एग्रीकल्चर इकोनॉमिक्स उसमें अलग से पर्चा होता है। पर अगर अर्थशास्त्र आपकी रुचि का विषय नहीं है, तब भी अपने आसपास के ग्रामीण इलाकों के माहौल से जरूर परिचित होंगे। थोड़ा-सा शहर से बाहर निकलते ही लहलहाते खेत शुरू हो जाते हैं, जिनकी मुंडेरों पर खड़े होकर हम फोटो खिंचवाने को लालायित हो जाते हैं, पर उस खेत और उस किसान से अपने को जोड़ने की जरूरत नहीं समझते हैं। हमारे लिए किसान सामाजिक प्राथमिकताओं की पृष्ठभूमि में पड़ा हुआ चेहरा विहीन, दो टांग, दो हाथ वाली हाड़-मांस की अन्न उपजाने वाली मशीन है, जिसको न कभी अपनी बेटी की शादी करनी है और न ही कभी बीमार होना है। वास्तव में हमने किसान को अपनी सोच में पूरी तरह से मनुष्यत्व से वंचित करके रखा हुआ है। उसको बस परिप्रेक्ष्य के अंधेरे में कहीं दुबक कर हमारी भोजन की जरूरत को निरंतर पूरा करते रहना है। किसान की जो दर्दनाक स्थिति सालों से चली आ रही है और आज फिर उबाल पर है, उसके लिए अगर कोई विशेष रूप से जिम्मेदार है, तो वह हमारा समाज है और उसमें निजी रूप से हम सब हैं। सरकार और प्रशासन बहुत कुछ कर सकता है और करने के लिए उसने बहुत सारी योजनाएं लागू भी की हैं- जमींदारी उन्मूलन से लेकर भूमि सुधार नियम और न्यूनतम समर्थन मूल्य तक योजनाएं आई और गई हैं। जब-जब नई पहल आई थी, तो लगा था कि किसान के जीवन में खुशहाली अब आ जाएगी। वह बेबस गरीबी से निकल कर स्वावलंबी बन जाएगा। पर ऐसा अभी तक नहीं हुआ है। किसान के हालात बद से बदतर होते गए हैं और वह उस कगार पर आज भी खड़ा है, जहां पर उसके सामने खुदकुशी करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।

1950 और 1960 के दशकों के बीच सरकार ने कई साहसी कदम उठाए थे। जमींदारी व्यवस्था किसान उत्पीड़न का मुख्य कारण था। उसका उन्मूलन कर तो दिया गया, पर सामाजिक व्यस्था के नायकों को यह रास नहीं आया था। उन्होंने यथास्थिति बनाए रखने से लिए हर प्रकार के हथकंडे अपनाए थे और वे कितने सफल थे, इसका सबूत आज तक हो रही किसानों की आत्महत्याएं हैं। आजादी के बाद कृषि क्षेत्र की एक और बड़ी समस्या बेहद छोटे आकार के खेत थे, जिनमें सीमांत कृषकों का बाहुल्य था। ऐसी ग्रामीण अवस्था में यह संभव नहीं था कि छोटे किसान इतनी उपज कर लें, जिससे उनका जीवनयापन ठीक तरीके से हो सके। कृषि में पैमाने की अर्थव्यस्था को सुनिश्चित करने के लिए सहकारिता आंदोलन छेड़ा गया था। इसके साथ ही भूदान आंदोलन भी चलाया गया, जिससे जमीन की जोत को बढ़ा कर उसकी उपज को लाभांश दिलाने की दहलीज तक लाया जा सके। सहकारिता और भूदान आंदोलन दोनों क्रांतिकारी आदर्शवादी राजनीतिक सोच से निकले थे, जिनको सरकार ने वास्तविकता में लाने की पुरजोर कोशिश की थी। पर हम और आप और हमारे समाज ने फिर टंगड़ी मार दी थी। हम अपनी सामंती सोच के भंवर से बाहर नहीं निकल पाए थे। सामाजिक अड़ियलपन से निपटने के लिए नीतिगत फैसला टेक्नोलॉजी लाने का लिया गया था और हरित क्रांति की शुरुआत हुई थी। बेहतर बीज, सुचारु सिंचाई व्यस्था और फैक्ट्री खाद के जरिए देश में एक बड़ी खाद्य क्रांति आई थी। कृषि उत्पादन आयात करने की स्थिति से हम उबर कर निर्यात करने लगे थे। देश के एक बड़े हिस्से में किसानी करना लाभप्रद भी हो गया था। पर उसके बाद आगे की सोची ही नहीं गई। सीमांत किसानों की दुर्दशा उन्नत खेती के अध्याय के खत्म होते ही फिर शुरू हो गई थी।

न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद कृषि क्षेत्र में पल रहे गहरे संकट से निपटने के लिए दस्तूरी किस्म के सरकारी उपाय थे, जिनकी दीर्घकालीन गुणवक्ता पर शुरू से ही प्रश्नचिह्न लगा हुआ था। सरकारी मूल्य और खरीद को शातिर आढ़तियों और सेठों के आगे दासी बन कर कृषकों से विश्वासघात करने पर मजबूर करना पहले से ही तय था। हमारे समाज के प्रधानों और जुमला सिद्धहस्त राजनेताओं ने किसानों की गाढ़ी कमाई को बिचौलियों के हाथ बड़ी धूर्तता से बेच खाया था। आज स्थिति भयावह है। सरकार जो कुछ करे वो अपनी जगह है, पर उससे ज्यादा जरूरी सामाजिक पहल है। हमें मिलकर सोचना है कि हम निजी और सामूहिक स्तर पर क्या करें, जिससे किसान और किसानी को उचित प्रतिष्ठा मिले और उसके काम को वाजिब मूल्य भी। इस प्रकार की सोच लाने के लिए हमें किसान को अपनी पृष्ठभूमि से निकाल कर सामाजिक और आर्थिक व्यस्था का केंद्र बिंदु तुरंत बनाना है। ऐसा तभी हो पाएगा जब शहरी लोग, जो शैक्षिक और व्यावसायिक रूप से समृद्ध हैं, गांव लौटने के बारे में गंभीरता से सोचने लगेंगे। कुछ मजबूरियों के चलते जो पूरी तरह से ग्राम प्रवास नहीं कर सकते हैं, उनको अपनी जमीन को कुछ समय देने का वादा अपने से करना होगा। गांव से शहर बहुत हो चुका है। अब शहर को गांव को गले लगाना है- अपना सगा मानना है, न कि सौतेला, अभागा, तुच्छ रिश्तेदार। हमारे कृषि प्रधान देश में कृषक को प्रधानी और उसके श्रम का वाजिब मेहनताना तभी मिल पाएगा, जब हम बिचौलियों को हटा कर फसल को अपने से सीधा जोड़ लेंगे। यह बहुत मुश्किल काम नहीं है, हमें सिर्फ अपनी सामंती सोच को स्वाहा कर के देशव्यापी खुशहाली के यज्ञ में अपनी कुछ निजी सामग्री होम कर देनी है।

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