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चर्चा: किसान आंदोलनों की दिशा, किसान की नियति और व्यवस्था का प्रश्न

किसानों और किसानी की दुर्दशा को लेकर बराबर चर्चा होती रहती है। जब-तब कुछ संगठन किसानों को एकजुट कर उनकी मांगें उठाने का भी प्रयास करते हैं। किसान आंदोलनों का इतिहास पुराना है। पर हकीकत यह है कि आज तक किसान आंदोलनों के दबाव में किसानों के हक में कोई उल्लेखनीय फैसला सामने नहीं आ पाया। हर साल सरकारें किसानों और किसानी की दशा सुधारने का वादा करते हुए बजटीय प्रावधान करती हैं, पर ये प्रावधान खेती के घाटे का धंधा बन जाने की हकीकत को बदल नहीं पा रहे। यही वजह है कि बहुत सारे किसान वैकल्पिक रोजगार की तलाश में निकलने लगे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में किसान आंदोलन आज कहां खड़े हैं और उनके सामने क्या चुनौतियां हैं, इस बार की चर्चा इसी पर। - संपादक

Author February 18, 2018 2:48 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

मणींद्र नाथ ठाकुर

अब यह भी एक जुमला-सा लगने लगा है कि ‘भारत कृषि प्रधान देश है’ और ‘सरकार किसानों के हित में बहुत कुछ करने को तैयार है’। सरकार किसी भी पार्टी की हो, किसानों की नियति आत्महत्या ही बनी हुई है। देश में किसानों के बड़े-बड़े आंदोलन हुए, उनमें से निकले नेता राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हो गए, नए राजनीतिक खानदानों का उत्थान भी हो गया, लेकिन किसानों की हालत यथावत बनी रही। ऐसा क्यों हो रहा है। सच तो यह है कि जब वैश्वीकरण के दौर में किसानों को कहा जा रहा था कि अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में माल बेच कर मुनाफा कमाना संभव हो पाएगा, तब यथार्थ में उनका बाजार और सिमटता जा रहा था। अस्सी के दशक में जब मैं गांव जाता था तो कई मध्यम दर्जे के किसान भी पूछते थे कि तुम्हारी आमदनी कितनी है? और फिर संतोष की सांस लेकर कहते थे कि इतने पैसे के लिए शहर में क्यों नौकरी करते हो। अब जब गांव जाना होता है, तो ऐसे बहुत से लोग कहते हैं कि उन्हें कोई छोटी-मोटी नौकरी दिला दूं। यह बदलाव क्या कहता है? यह बात हम उस देश में कर रहे हैं, जहां एक मध्यवर्गीय वकील, विदेश में पढ़ने के बावजूद भारत भ्रमण करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि बिना किसानों को आंदोलन में शामिल किए भारत से अंग्रेजों को भागना संभव नहीं है। गांधी, जिनका मानना था कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है और यहां कोई भी सामाजिक परिवर्तन बिना उनके सहयोग से संभव नहीं है। नील की खेती के विरोध में उनके आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नए मुकाम पर ला दिया। लाखों किसानों ने गांधी पर विश्वास कर आंदोलन में सपरिवार हिस्सा लिया।

मगर स्वतंत्रता के बाद क्या हुआ? गांधी जिस सभ्यता के विरोध में खड़े थे, भारतीय समाज उधर ही मुड़ गया। एक शहरी सभ्यता कायम हुई, जो पश्चिमी जगत के विकास का मॉडल था। इस नए मॉडल में गांव की जगह शहर को विकास का मापदंड माना गया। अहिस्ता-आहिस्ता गंगा उल्टी बहने लगी। जो कुछ किसान पैदा करते थे उसकी कीमत या तो स्थिर रह गई या फिर कम होने लगी और जो कुछ शहर में पैदा होता था, उसकी कीमत बढ़ने लगी। फिर कृषि यंत्रों, खाद, पानी, दवाइयां सब कुछ शहर से गांव जाने लगे, खेती महंगी होने लगी। पारंपरिक खेती खत्म हो गई। हरित क्रांति से पहले तो फायदा हुआ, फिर पारंपरिक खेती खत्म हो जाने से किसानों का फायदा घटने लगा। बिजली, पानी, खाद, बीज सब बेचने वाले किसानों से मुनाफा कमाने लगे। उदारीकरण के पहले तक तो सरकार ने सब्सिडी देकर किसी तरह उनका मुनाफा बनाए रखा, लेकिन उसके बाद यह असंभव होने लगा। किसानों की हालत खराब होने लगी। उदारीकारण के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने ग्रामीण क्षेत्रों को बाजार बना दिया। उत्पादों का गांव तक पहुंचने का नया दौर चल गया। उनके बचे-खुचे मुनाफे को भी दुह कर शहर लाया जाने लगा।

इन अलग-अलग दौरों में किसान आंदोलन अलग-अलग तरह के चले। एक समय में किसानों की मांग भूमि सुधार थी, तो दूसरे समय में पानी और बिजली। फिर मांग कर्ज माफी तक आई। हर दौर में इन मांगों को खारिज किया गया। उनकी समस्याओं का कोई ठोस उपाय नहीं निकाला गया। गौर से देखें तो पंजाब आंदोलन की जड़ में भी किसानों की समस्या थी। अगर आनंदपुर साहेब प्रस्ताव को पढ़ें तो स्पष्ट हो जाएगा कि इसमें मांगें हरित क्रांति से उपजी समस्याओं से निपटने की थीं। लेकिन राज्य ने उसे आतंकवाद में परिणत कर दिया। पंजाब आंदोलन के बाद भी वहां के किसानों को कुछ नहीं मिला। विकास के इस मॉडल से परेशान इस समाज के लोग पलायन करने लगे या तो आत्महत्या करने लगे या फिर नशे की लत में फंस गए। और इन सबसे बचे तो आधुनिक बाबाओं के चक्कर लगाने लगे। महाराष्ट्र और विदर्भ के किसान तो कर्ज तले इतने दब गए कि उनके पास आत्महत्या के अलावा कोई उपाय नहीं बचा। आंदोलन इन इलाकों में भी हुए, लेकिन उसका निष्कर्ष कुछ नहीं निकला।

सरकारें जिसकी भी हों, किसानों की मांगे स्थिर हैं, कर्जमाफी, मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, फसल की सही कीमत और बाजार की सही व्यवस्था। पर राज्य की ऐसी क्या लाचारी है कि किसानों को कुछ भी देना संभव नहीं हो पा रहा? भले बड़े उद्योगपतियों को कम से कम ब्याज दर पर कर्ज मिल जाए, घाटे में जाने पर उनके लिए अनेक उपाय हो जाएं, हजारों करोड़ नहीं लौटाने पर उसे एनपीए घोषित कर दिया जाए, लेकिन किसानों को कुछ हजार नहीं देने पर उनकी कुर्की-जब्ती हो जाती है। इस तथाकथित कृषि प्रधान देश में किसानों की ऐसी हालत क्यों है कि उनके आंदोलनों का राजनीति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता? महेंद्र सिंह टिकैत की अगुआई में भारतीय किसान संघ ने दिल्ली के बोट क्लब पर लंबा धरना दिया था। शहरी लोग उन्हें कुछ इस तरह देखने जाते थे कि ये पिछली सदी के लोग हैं, सभ्यता को धता बताते हुए हस्तिनापुर की छाती पर डेरा जमाए बैठे हुक्का पी रहे रहे हैं। यह उनकी जगह नहीं है और इस भारत को सभ्य मनाने के लिए इस जमात से मुक्त होना पड़ेगा। सत्ता, अर्थव्यवस्था सब कुछ का केंद्र शहर है और किसान गांव में रहते हैं, जहां से भारत की आत्मा विदा ले चुकी है। अब ऐसी स्थिति में उनका कोई भी आंदोलन कानून-व्यवथा का सवाल मात्र बन कर रह जाता है। उसमें व्यवस्था परिवर्तन का माद्दा बचा है या नहीं, कहना कठिन है। हां इतना जरूर है कि वोटों के बाजार में उनका बहाव कुछ कम नहीं है। इसलिए इन आंदोलनों से कुछ नेता निकल कर इस शहरी क्लब में शामिल हो जाते हैं। अब बात बिल्कुल उल्टी हो गई है। गांधी शहरी क्लब से देहाती पंचायत में गए थे, ये नेता देहाती पंचायत से शहरी क्लब में शामिल हो जाते हैं। फिर बिना किसी खास फायदे के आंदोलन खत्म हो जाते हैं। बजट में घोषणा हो जाती है कि हजारों करोड़ किसानों के विकास लिए किया गया है। लेकिन जब बैंकों की इतनी बड़ी व्यवस्था हेराफेरी को समझ नहीं पाती है तो बेचारे किसान इस अर्थव्यवस्था को क्या समझ पाएंगे! अंत में उनके ऊपर बैंकों का कर्ज कुछ और चढ़ जाता है। फिर कर्ज माफी का आंदोलन शुरू होता है और चुनाव के करीब उसकी घोषणा भी हो जाती है। फिर खबर आती है कि किसी को उनके लिए दो रुपए का चेक मिला, तो किसी को तीन रुपए का। यह खेल निरंतर चलता रहता है।

हाल के दिनों में किसानों के दो आंदोलन आपेक्षाकृत सफल हुए हैं। एक तो बंगाल में टाटा के जमीन अधिग्रहण के खिलाफ सिंगूर में और दूसरा नोएडा से लगे उत्तर प्रदेश के भट्टा-पारसौल में शहरीकरण के लिए जमीन अधिग्रहण के विरोध में। ये व्यवस्था परिवर्तन के आंदोलन नहीं थे। कर्जमाफी, मुफ्त बिजली आदि के लिए आंदोलन भी व्यवस्था परिवर्तन के आंदोलन नहीं होते थे, लेकिन कम से कम उनमें एक व्यापक मांग होती थी। ये नए आंदोलन तो केवल सीमित दायरे के रहते हैं। इनकी कोई व्यापक मांग नहीं होती है। अधिग्रहण के नियमों में कुछ सुधार कर इन्हें शांत करना भी संभव हो सकता है। पर अगर गांधी के आंदोलन को आगे बढ़ाना है तो फिर किसान आंदोलनों को व्यवस्था परिवर्तन का आंदोलन बनना होगा। शहरों को कितना भी खूबसूरत बना लें, इनमें मानवीय मूल्यों की स्थापना नहीं की सकती। ऐसे में क्या कुछ बुद्धिजीवी इस बात पर भी चिंतन करना शुरू कर सकते हैं कि ग्रामीण सभ्यता में सुधार कर उसे आने वाले कल के लिए उचित व्यवस्था में परिणत किया जा सकता है कि नहीं, जहां गंधी के मूल्यों का समाज बन सके!

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