ताज़ा खबर
 

दूसरी नजर: पीछे जाते हम

हम ऐसी अजीबोगरीब दुनिया में रह रहे हैं, जिसमें साम्यवादी चीन का राष्ट्रपति खुल कर मुक्त व्यापार और वैश्वीकरण की बात करता है और पूंजीवादी अमेरिका का राष्ट्रपति उपहासपूर्ण ढंग से व्यापार समझौतों, डब्ल्यूटीओ, जलवायु संकट और पेरिस समझौते की बात करता है! क्या दुनिया उलट-पुलट हो रही है?

Agitationकृषि कानून के विरोध में किसान लामबंद। फाइल फोटो।

कुछ दिन पहले मुख्य आर्थिक सलाहकार ने बताया था कि साल 2020-21 में भारत का चालू खाता अधिशेष रिकार्ड स्तर तक जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2020) में हमारे पास 19.8 अरब अमेरिकी डॉलर का अधिशेष था और अगर आगामी तिमाहियों में इसी तरह का रुख देखने को नहीं मिलता है, तब भी हमारे पास संभवत: चालू खाते में अधिशेष बना रहेगा।

सीईए ने इसे सुस्त रफ्तार का नतीजा बताया था। इसका अर्थ यह है कि मांग एकदम खत्म हो चुकी है और सरकार के तथाकथित प्रोत्साहन पैकेज (आर्थिक और खराब लक्ष्य) मांग को फिर से पैदा करने में नाकाम रहे हैं, कम से कम अब तक तो। यहां मांग की मात्रा का अच्छा उदाहरण देखें, बिजली मंत्री के मुताबिक 2021-22 में ताप बिजली घरों का प्लांट लोड फैक्टर सिर्फ 56.5 फीसद तक रहने की संभावना है। सुस्ती के बावजूद खुदरा महंगाई 7.61 फीसद तक पहुंच गई है और खाद्य महंगाई 11.07 फीसद तक जा पहुंची, जो गरीबों पर क्रूरता भरा बोझ है।

रोजगार की चुनौती
कृषि की तस्वीर अच्छी है। 2020 में रबी की बंपर पैदावार हुई, चौदह करोड़ अस्सी लाख टन खाद्यान्न हुआ और 2020 में खरीफ की चौदह करोड़ चालीस टन पैदावार का अनुमान है। इस साल ट्रैक्टरों की बिक्री में नौ फीसद बढ़ोतरी का अनुमान है। एफएमसीजी कंपनियों के मुताबिक शहरी मांग के मुकाबले ग्रामीण मांग अच्छी है। फिर भी ग्रामीण मजदूरी में वृद्धि ठंडी पड़ी है।

इसलिए यह मिलीजुली तस्वीर बनती है, हरी से कहीं ज्यादा धुंधली, लेकिन इनसे हमारे वृहद आर्थिक अनुमान गड़बड़ाने नहीं चाहिए। कुल मिला कर देखें तो संपूर्ण अर्थव्यवस्था बुरी स्थिति में है, नीति निर्माण में भ्रम की स्थिति है, और अर्थव्यवस्था के फिर से पटरी पर लौटने के दावे अतिशयोक्ति भरे हैं।असल मानदंड नौकरियां और मजदूरी या आमद हैं।

सीएमआइई के अनुसार (चूंकि अब सरकारी आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं) बेरोजगारी की मौजूदा दर 6.68 फीसद है। श्रम भागीदारी दर जो इस 0.41 फीसद है, के साथ महिला श्रमिक भागीदारी की दर पच्चीस फीसद रह गई है। सौ कामगारों में महिलाओं की संख्या सिर्फ ग्यारह है, लेकिन इन ग्यारह महिलाओं में से भी चार का रोजगार छिन गया। सितंबर 2019 और सितंबर 2020 के बीच करीब एक करोड़ दस लाख से एक करोड़ बीस लाख लोग श्रमबल से बाहर हो गए थे।

झुकाव अमीरों की ओर
अर्थव्यवस्था में सुस्ती भी उतनी ही खराब होती है जितनी कि ज्यादा तेजी। जब अर्थव्यवस्था में ज्यादा ही तेजी आने लगती है तो महंगाई बढ़ती है, मांग कम करने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी करते हैं, कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने के लिए उत्साहित किया जाता है, और अगर बाजार ठीक से काम कर रहे हों और सही कदम उठाए गए हों, तो मांग और आपूर्ति के बीच फिर से संतुलन कायम किया जा सकता है। जब अर्थव्यवस्था में नरमी होती है तो हम क्या करें? यह भारत के लिए नई चुनौती है और यह भी कि मौजूदा सरकार इससे निपट पाने में सक्षम नहीं है। इसका कारण यह है कि सरकार का झुकाव गरीबों के बजाय अमीरों के उद्धार की तरफ है।

अगर मैं एक उदाहरण दूं, कारपोरेट क्षेत्र को कर कटौती के रूप में एक लाख पैंतालीस हजार करोड़ रुपए का तोहफा दे दिया गया। यह पैसा गरीबों को मुफ्त राशन या नगदी हस्तातंरण के रूप में दिया जाना चाहिए था। कंपनियों ने इसका फायदा नगदी की जमाखोरी कर उठाया। उन्होंने इस पैसे को निवेश नहीं किया। अगर गरीबों को यह पैसा मिलता तो वे भूखे नहीं मरते, जो वे पिछले तीन महीने से हफ्तों में कई दिन भूखे रह रहे हैं। वे खाना, दूध, दवाइयां और दूसरी जरूरी चीजें और सेवाएं खरीदते और कुल मिला कर मांग बढ़ती।

चालू खाते का अधिशेष इसलिए है क्योंकि निर्यात आयात से आगे निकल गया है, हालांकि दोनों ही पूर्व के स्तरों से कम हैं। कम व्यापार का नतीजा है कि चालू खाते में अधिशेष बढ़ा है और बढ़ता रुपया अर्थव्यवस्था के लिए घातक हो सकता है। इसका पहला बुरा असर रोजगार पर होगा। नहीं नजर आने वाला वृहद आर्थिक प्रभाव यह पड़ेगा कि भारत की बची-खुची पूंजी भी बाहर निवेश कर दी जाएगी। किसी विकासशील देश की कल्पना कीजिए, जिसे वाकई पूंजी की जरूरत है, और वह दूसरे देशों को अपनी पूंजी का निर्यात कर रहा है और वहां निवेश कर रहा है! यह सब देख कर अमेरिकी कारोबार हंस रहे होंगे।

आत्मनिर्भरता या मनमानी
मैं गंभीरता से उम्मीद करता हूं कि आत्मनिर्भरता का प्रचार करने वालों के इरादे ऐसे नतीजों के नहीं रहे। यदि आत्मनिर्भरता का तात्पर्य एक हद तक आत्मनिर्भर होना है तो हमें इसका स्वागत करना चाहिए। लेकिन नीति और व्यवहार में यदि आत्मनिर्भर का अर्थ संरक्षणवाद, मुक्त व्यापार-विरोधी, उच्च शुल्क, मनमानी, लाइसेंस राज और नियंत्रण की वापसी, स्वेच्छाचारी और भेदभाव वाले कानून हैं तो निश्चित ही यह रास्ता हादसे की ओर ले जाएगा। मुझे पूरी पूरी उम्मीद है कि मोदी ट्रंप से आगे नहीं निकलेंगे।

हम ऐसी अजीबोगरीब दुनिया में रह रहे हैं, जिसमें साम्यवादी चीन का राष्ट्रपति खुल कर मुक्त व्यापार और वैश्वीकरण की बात करता है और पूंजीवादी अमेरिका का राष्ट्रपति उपहासपूर्ण ढंग से व्यापार समझौतों, डब्ल्यूटीओ, जलवायु संकट और पेरिस समझौते की बात करता है! क्या दुनिया उलट-पुलट हो रही है?

अर्थशास्त्री प्रोफेसर राज कृष्णा ने विकास की हिंदू दर को लेकर जो कहा था, उससे बाहर निकलने में भारत को तीस साल लग गए। हालांकि मेरा मानना है कि पूर्व के हिंदू राजाओं जैसे चोल शासक या मौर्य शासक दूरद्रष्टा थे, व्यापक सोचने वाले थे, और भारत की अर्थव्यवस्था को उन्होंने वैसे ही विस्तार दिया जैसे चीन, इंडोनेशिया और रोम ने दिया था। वे सच्चे मायनों में वैश्विक थे और दुनिया की जीडीपी में भारत की हिस्सेदारी को पच्चीस फीसद तक ले गए थे।

उन शासनों के दौरान, जब हमारे पास प्रशिक्षित अर्थशास्त्री नहीं थे, भारत ने मुक्त व्यापार शुरू कर नए बाजारों पर कब्जा कर लिया था और अपने यहां कई देशों की दौलत जमा कर दी थी। मैं यह सोच कर कांप उठता हूं कि हम अपनी उस समृद्ध विरासत को उलट दे रहे हैं और ऐसी नीतियों को अपना रहे हैं जो हमें कम वृद्धि के युग में धकेल देंगी। आक्सफर्ड के अर्थशास्त्र ने हमें चेतावनी दी है कि अगले पांच साल में भारत को साढ़े चार फीसद की वृद्धि दर देखनी पड़ सकती है। यह खतरे की घंटी है।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 तीरंदाज: रहेंगे कहां!
2 दूसरी नजर: सुधार किसलिए, विकास या गौरवगान के लिए?
3 बाखबर: टीका बाजार
यह पढ़ा क्या?
X