जिसे भुलाया नहीं जा सकता

हर देश के इतिहास में कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं, जिनको भुलाया नहीं जाना चाहिए। मुंबई पर 26/11 वाला जिहादी हमला ऐसी ही घटना है।

26/11 को मुम्‍बई पर हुआ था हमला। फाइल फोटो।

हर देश के इतिहास में कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं, जिनको भुलाया नहीं जाना चाहिए। मुंबई पर 26/11 वाला जिहादी हमला ऐसी ही घटना है। पाकिस्तान ने करवाया था इसको अपने उन जिहादियों से, जिनको पाकिस्तानी सेना की खुफिया संस्था आइएसआइ ने पाला-पोसा है, सिर्फ इसलिए कि भारत में आतंकवाद फैलाने के लिए वे काम आ सकें अघोषित युद्ध की तरह। अफसोस कि भारत की भूमि पर इस सबसे बड़े आतंकवादी हमले को हम उस बड़े पैमाने पर कभी याद नहीं करते हैं, जिस तरह अमेरिका हर साल 9/11 वाले हमले को याद करता है। उस हमले में हर मरने वाले का नाम हर साल याद किया जाता है उस जगह, जहां उसकी मौत हुई थी। हर साल अमेरिका के राष्ट्रपति अन्य राजनेताओं के साथ शामिल होते हैं उस स्मृति-सभा में, जो वाशिंगटन में होती है।

मुंबई में इंडियन एक्सप्रेस अखबार शोकसभा करता है, जिसमें इस महानगर की बड़ी-बड़ी हस्तियों को बुलाया जाता है, लेकिन भारत सरकार की तरफ से ऐसी कोई शोकसभा न मुंबई में कभी हुई है और न देश की राजधानी में। प्रधानमंत्री बदल गए हैं, सरकारें बदल गई हैं, लेकिन जिस दिन को पूरे देश को याद करना चाहिए एक शोक दिवस के तौर पर, उसको अभी तक इस तरह हम याद नहीं करते हैं। जब प्रधानमंत्री कांग्रेस पार्टी के थे, तो समझना आसान था कि ऐसा क्यों नहीं करते थे हम।

इसलिए कि जब हमला हुआ, तो ऐसा लगा जैसे कि भारत में शासक हैं ही नहीं और देश को चला रही हो अनाड़ियों की टोली, जिनको अहसास नहीं था कि जिहादी हमला नहीं किया था पाकिस्तान ने, बल्कि भारत पर युद्ध किया था इतनी कायरता से कि न रणभूमि थी न युद्ध का ऐलान। इसका जवाब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इतनी कायरता से दिया था कि आज तक कलंक लगा हुआ है कांग्रेस पार्टी के माथे पर। लेकिन पिछले सात सालों से देश की बागडोर है एक ऐसे प्रधानमंत्री के हाथों में, जो गर्व से कहते हैं कि उनका सीना ‘छप्पन इंच’ का है। सो, क्यों नहीं हम मनाते हैं 26/11 को उस व्यापक तौर पर जैसे अमेरिका में 9/11 को हर साल मनाया जाता है?

इसे याद करना जरूरी है, क्योंकि अभी तक हमने पाकिस्तान की धरती से उन लोगों को ढूंढ़ कर दंडित नहीं किया है, जिन्होंने 26/11 वाले हमले को अंजाम दिया था। लश्कर-ए-तैयबा के आका अभी तक जिंदा हैं और सुरक्षित भी। न उनको दंडित किया है पाकिस्तान ने अभी तक और न ही कोई ठोस कानूनी प्रक्रिया चली है, जिससे हमको विश्वास हो कि कभी न कभी उनको दंडित किया जाएगा, दूर भविष्य में ही सही। हाफिज साईद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवादी घोषित किया गया है, लेकिन इसके बावजूद वह इतने आराम से अपना जीवन गुजार रहा है पाकिस्तान में कि खुल कर बड़ी-बड़ी सभाएं बुला कर ऐसे भाषण देता है ये दरिंदा, जिनमें भारत पर दोबारा ऐसा हमले करने के लिए नौजवानों को उकसाया जाता है।

इससे साबित होता है कि पाकिस्तान में चाहे प्रधानमंत्री बदल जाएं, चाहे सेनाध्यक्ष बदल जाएं, जिहादी आतंकवादियों को पाला पोसा जाएगा सिर्फ इस इरादे से कि भारत पर हमला इसी तरह के होंगे, क्योंकि युद्धभूमि में भारत को हराना असंभव साबित हुआ है कई बार। तो क्या ऐसा नहीं होना चाहिए था अभी तक कि हम इस कायर युद्ध का सामना करने के लिए तैयार हो गए होते अपनी युद्ध नीति बदल कर? पुलवामा के बाद मोदी सरकार ने ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ किया तो था, लेकिन क्या एक ऐसी स्ट्राइक से जिहादी आतंकवाद को रोका जा सकता है? अभी तक ऐसा क्यों नहीं हुआ है कि जिस तरह पाकिस्तान हमारी भूमि पर अपने आतंकवादी भेज रहा है, हम इसका जवाब अपनी खुफिया संस्थाओं द्वारा पाकिस्तान के अंदर घुस कर दे सकने की काबलियत रखते हों? अगर अभी तक हमने इस तरह के युद्ध की तैयारी नहीं की है, तो क्या पूछना जरूरी नहीं है कि क्यों नहीं की है?

मेरे जैसे लोग जो मुंबई में रहते हैं, हमारे लिए 26/11 को भुलाना मुश्किल है, क्योंकि रोज गुजरना होता है उन जगहों से, जहां अजमल कसाब और उसके साथियों ने बेगुनाह, निहत्थे लोगों को ऐसे मारा था जैसे जानवरों को शिकार पर मारा जाता है। लेकिन इसलिए कि मुंबई के बाहर हम 26/11 को याद करने की कोशिश तक नहीं करते हैं, हमने वे कदम नहीं उठाए हैं, जो उठाए जाने चाहिए थे उस हमले के बाद। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रोज टीवी पर दिखते हैं पाकिस्तान को गालियां देते हुए, लेकिन न सिर्फ यह काफी नहीं है, बेवकूफी भी है, क्योंकि ऐसा करके हम भारत की शान को कम करके पाकिस्तान के घटिया स्तर पर ले आते हैं। कुछ और नहीं।

इस साल सोनिया गांधी की कांग्रेस पार्टी के एक सदस्य ने ही याद दिलाया है कि जो ठहराव कांग्रेस सरकार ने 26/11 के बाद दिखाया था, उससे कमजोरी दिखी थी, ठहराव नहीं। बिलकुल सही कहा है मनीष तिवारी ने। हमने इस हमले में पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तानी सरकार की भूमिका साबित करने में इतने विफल रहे हैं कि पाकिस्तान के राजनेता और जरनैल अभी तक सीना तान के कहते हैं विश्व की सभाओं में कि इस हमले के पीछे ऐसी संस्थाएं थीं, जो पाकिस्तान के अंदर भी आतंक फैलाती हैं। इमरान खान ने तो बल्कि कई बार कहा है कि पाकिस्तान जितना पीड़ित रहा है जिहादी आतंकवाद से, उतना पीड़ित कोई दूसरा देश नहीं रहा है। इस झूठ को कहने में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री सफल सिर्फ इसलिए रहे हैं, क्योंकि भारत के शासकों ने 26/11 को भुलाने में अपनी चुप्पी से मदद की है। भारत आज भी कमजोरी दिखा रहा है ठहराव नहीं।

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