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तीरंदाजः ठांय ठांय दर्शन

वास्तव में, ठांय ठांय राजनीति शास्त्र का महामंत्र है। यह चारों तरफ फैले बियाबान की सांय सांय को शांत करता है। इसका जाप करने से राजनीतिक कल्याण निश्चित है।

शायद भोले बचपन की तर्ज पर दिलेर पुलिस कर्मियों ने भी पिस्तौल जाम होने के बाद होनहार तरीके से ठांय ठांय की आवाज निकाल कर उन बदमाशों को डराने की कोशिश की थी, जिनको असली गोली चलने की आवाज का कोई इल्म नहीं था।

कभी ऐसा वक्त भी आ जाता है कि धरातल पर तो सांय सांय होती है, पर राजनीति में सिर्फ ठांय ठांय गूंजती है। उत्तर प्रदेश पुलिस के जुबान-बहादुरों ने ऐसे हालात को बखूबी चरितार्थ कर दिखाया है। हाल में वायरल हुए एक विडियो में हमने देखा कि किस तरह से दो पुलिसिया जांबाज बदमाशों के पीछे लगे हुए थे और उन्हें उन्होंने मुठभेड़ में उलझा लिया था। पर अचानक हमारे शूरवीर अफसर की पिस्तौल जाम हो गई थी और वे फायर करने के काबिल नहीं रहे थे। पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। पिस्तौल नहीं चली, तो उन्होंने अपनी जुबान चला दी थी। ठांय ठांय की आवाज निकालते हुए वे वीरता से जुटे रहे और साथ ही अपने सहकर्मियों को निर्देश देते रहे कि बदमाशों को घेर लो- ठांय ठांय।

विडियो बहुत ही रोचक है, शायद उतना ही जितना कि विडियो का हीरो रोचक है। उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग ने तो उनकी सूझ-बूझ को अंतर्मन से सराहा है। हवा बांध कर गिरफ्त बनाना कोई हंसी-ठट्ठा नहीं है। यह ठीक उसी तरह गंभीर बात है, जिस तरह बचपन में हम लोग अंधेरी गली में जब जाने से डरते थे, तो उसमें छिपे हुए भूत को भगाने के लिए सीटी बजाना शुरू कर देते थे और अंधेरे से भरा फासला दौड़ कर पार कर लेते थे। इस भाव को दर्शाता एक फिल्मी गाना भी बहुत लोकप्रिय हुआ था- डर लगे तो गाना गा। सच में सीटी बजाना या गाना गाना भूत भागने के लिए बहुत ही कारगर उपाय हमेशा साबित हुए हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस की ठांय ठांय की तरह।

शायद भोले बचपन की तर्ज पर दिलेर पुलिस कर्मियों ने भी पिस्तौल जाम होने के बाद होनहार तरीके से ठांय ठांय की आवाज निकाल कर उन बदमाशों को डराने की कोशिश की थी, जिनको असली गोली चलने की आवाज का कोई इल्म नहीं था। वे मासूम मुंह से निकाली ठांय ठांय को असली फायरिंग समझ कर सिर पर पैर रख कर भाग गए थे। ठीक भूत जैसे। पुलिसिया पराक्रम का इससे बड़ा दृष्टांत और भला क्या हो सकता है? वास्तव में यह शूरवीरता का ही नहीं, बल्कि परिपक्व राजनीतिक सिद्धांत का उदाहरण है। अगर फिर सोचें तो यह आज का राजनीतिक दर्शन शास्त्र है। यह वह शास्त्र है, जिसमें नाम बड़े पर दर्शन छोटे वाली बात कुछ अपढ़ लोग जरूर करते हैं, पर ज्ञानियों का मानना है कि बदमाशों की तरह हम और आप भी इतने बौड़म हैं कि मुंह से निकाली नकली आवाज हमारे असल को बदल सकती है, हमें हांक सकती है। हम इस स्वर के मायाजाल में फौरन से पेश्तर फंस जाते हैं और भेड़-बकरियों की तरह हलाल होने चल पड़ते हैं।

पर क्योंकि सबसे पहले शब्द था, शब्द से ही ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई थी इसलिए शब्द ज्ञान से ज्यादा जरूरी उसकी क्रिया मानी जाती है। शब्दों से कुछ ठोस उत्पन्न हो न हो, पर शोर जरूर उत्पन्न होता है और उससे अंदर बसे भूत भाग जाते हैं। शोर भूत भगाने का कारगर तरीका है- चाहे वह बचपन की अंधेरी गली में मंडराते काल्पनिक भूत हो या फिर उम्रदार हो जाने के बाद सियासी सियाह क्रियाकलापों से उत्पन्न डरावने साए हों। वैसे विफलता की गहन छाया साफ उजाले में भी भूत दिखा देती है। अपने सामने उठते सियासी बवंडर को देख कर आदमी डर जाता है और उसको भागने के लिए शब्दों की फूंक मारने लगता है। विज्ञान जानता है कि फूंकों से आंधी हवा नहीं हो जाती है, पर लोग ज्ञान बघारने से बाज नहीं आते हैं। हो-हल्ला करके वे आई बला को टालने में लग जाते हैं यानी अपने बियाबान में ठांय ठांय करके बहादुरी का सबब पेश करते हैं। वे रात के सुनसान में छिपने के बजाय या हथियार ठीक करने की कोशिश से परहेज करते हुए रोशनी करके नाटकीय तरीके से ठांय ठांय का शब्द घोष करते हैं और उसका विडियो बना कर अपनी सफलता का जयघोष भी कर देते हैं।

राजनीतिक दर्शन शायद पुलिसिया कार्रवाई से प्रेरित है। यह कार्रवाई अनंत काल से चली आ रही है और राजनीति उस पर तभी से गौर फरमा रही है, पर उसको अपने दर्शन का हिस्सा उसने हाल-फिलहाल ही बनाया है। दर्शन लंबे समय के विमर्श के बाद कोई सिद्धांत प्रतिपादित करता है, उसकी कार्रवाई पुलिस कार्रवाई की तरह आनन-फानन नहीं होती है। दार्शनिक पहले किसी स्थिति का संज्ञान लेते हैं, फिर उस पर गहन चर्चा करते हैं, सिद्धांत के स्थायी होने पर विचार करते हैं और बाद में कहीं जाकर नया फलसफा बांचते हैं। ऐसे में जाहिर है कि वक्त तो लगना ही था, पर आखिर में ज्ञान उपज आया और ठांय ठांय राजनीतिक दर्शन शास्त्र के अठारहवें अध्याय के तौर पर महिमा मंडित हो गई।

राजनीति वास्तव में अंधेरे से ढका गन्ने का खेत है। इसमें वर्दीधारी बदमाश होकर गुम हो जाते हैं और बदमाश अपने को वर्दीधारी होने का ऐलान अंधेरे का लाभ और गन्ने की कद्दावर आड़ लेकर बखूबी करते हैं। ऐसी स्थिति में कारगर कार्रवाई से ज्यादा जरूरी जुबानी कार्रवाई हो जाती है। दूसरे शब्दों में, हथियार चले न चले, पर मुंह हमेशा चलते रहना चाहिए। ठांय ठांय का बारूद अविरल बरसते रहना चाहिए। वस्तुत: लोक कल्याण जीभ की नोक पर टिका होता है। इस नोक को आप जितना ज्यादा आंदोलित करेंगे, उतना ज्यादा देश और समाज का कल्याण होगा।

वर्तमान की राजीनीति का अठारहवां अध्याय, जिसको सर्वज्ञ ने स्वयं प्रतिपादित किया है, इस सत्य को गन्ने के खेत की उपयोगिता से जोड़ता है। आप रात में गन्ने की टहनी पकड़ कर अपना विडियो बना लीजिए, आप आभासी रूप में वायरल हो जाएंगे। हर घर में आपकी हर-हर होने लगेगी। राजनीति का स्वर्ग हर-हर में उपस्थित है, न कि कर-कर में। कर्ता नर्क की गर्त में गिर जाता है, जबकि ठांय ठांय का ठाठ इंद्रसभा से भी ज्यादा सजीला होता है। विश्वास न हो तो आभासी वास्तविकता में गोता लगा कर देख ले कि वायरल विडियो ही असल में अंतिम सत्य है। प्रभावी कार्रवाई मिथ्या है। बस ठांय ठांय चिल्लाते रहिए और फिर देखिए कि न हींग लगेगी न फिटकरी, पर रंग पूरा चोखा आएगा। हर हर-हर के आगे हार-हार मान जाएगी। हर विफलता सफलता में तब्दील हो जाएगी। वास्तव में, ठांय ठांय राजनीति शास्त्र का महामंत्र है। यह चारों तरफ फैले बियाबान की सांय सांय को शांत करता है। इसका जाप करने से राजनीतिक कल्याण निश्चित है।

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