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तीरंदाज: ला बैल जिसे मैं मारूं

आज न्यूज टेलीविजन संयम खो चुका है। वह समाज को कुरेदने का यंत्र बन चुका है। हर चैनल पर ‘एंग्री यंग एंकर’ गुत्थमगुत्था करने के लिए आतुर बैठे हंै। उनका अंदाज पुराना आ बैल मुझे मार वाला नहीं, बल्कि कोई बैल लाओ जिसे मैं मारूं वाला है।

मीडिया ने सनसनीखेज खबरें परोसने और टीआरपी के चक्कर में लोगों का जायका बिगाड़ दिया है।

मैं टेलीविजन बिल्कुल नहीं देखता हूं, पर फिर भी उसने मेरा शिकार कर लिया है। मैं सोशल मीडिया पर कभी-कभी जाता हूं, पर जब भी जाता हूं, वह मुझे परेशान करके ही छोड़ता है। पिछले तीन साल से मैंने न्यूज चैनेलों की वजह से टीवी रिचार्ज नहीं कराया है। मैं शोर से दूर रहना चाहता हूं। खबरों में इस पार्टी या उस पार्टी की तरफ झुकाव से मुझे कोई विशेष आपत्ति नहीं है।

हर चैनल या अखबार की संपादकीय नीति होती है और ऐसा होना मैं वाजिब बात मनाता हूं। वैसे भी सार्वजनिक मंच पर हर पक्ष को अपनी विचारधारा और नीति रखने का लोकतांत्रिक अधिकार है। भारतीय संविधान के अंतर्गत इस अधिकार से बहस की कोई गुंजाइश नहीं है। पर अभद्र चीख-चिल्लाहट और बेढब टिप्प्पणी मीडिया या किसी और मंच का संवैधानिक अधिकार नहीं हो सकता है। मैंने, और मेरे जैसे बहुत से लोगों ने, इसीलिए अपने को न्यूज चैनल्स से अलग कर लिया है।

पर शोर रुका नहीं है। वह अब टीवी से निकल कर घर, दफ्तर, पारवारिक कार्यक्रमों आदि में मुझे घेर रहा है। हर तरफ न्यूज चैनेलों का एजेंडा चल रहा है। किसी से भी चंद मिनटों की बातचीत में वह प्रस्तुत हो जाता है और आप उन्हीं न्यूज चैनेलों की चपेट में आ जाते हैं, जिनसे आप भागे हैं। वास्तव में चैनलों का एजेंडा अब हमारी जिंदगी का एजेंडा बन गया है। हर सुबह हम चैनल से उसे ग्रहण करते हैं और फिर सुबह से देर रात तक चलाते हैं। एजेंडे की तार्किकता और सत्यता से हमारा कोई लेना-देना नहीं है। बस एक फितूर है, जो हमें उलझाए हुए है।

टेलीविजन बेहद प्रभावशाली माध्यम है। टीवी पर जब कोई बोलता है, तो लगता है जैसे हमसे सीधे बात कर रहा है। सार्वजनिक होते हुए भी यह एक बहुत निजी संवाद है। इस सातों दिन चौबीसों घंटे होने वाले संवाद में अक्सर हमारी अपनी पहचान और सोच टीवी पटल पर चल रहे व्यक्ति में विलप्त हो जाती है। हम उसका प्रतिबिंब बन जाते हैं और उसी की तरह बोलने, झगड़ने और समझने लगते हैं।

मुझे याद है कि छात्र जीवन के दौरान मैं और न जाने कितने मेरे साथी जब अमिताभ बच्चन की फिल्म देख कर आते थे, तो एक अरसे तक एंग्री यंगमैन हो जाते थे। हमारे बात करने के तरीके से लेकर सोच तक बदल जाती थी। छोटी-सी बात को लेकर हम अमिताभ की तरह आक्रामक हो जाते थे। पर यह प्रभाव सीमित था, क्योंकि अगले हफ्ते हम लोग रोमांटिक राजेश खन्ना हो जाते थे। टेलीविजन भी हमको इसी तरीके से प्रभावित करता है, पर जब तक, सिनेमा की तरह, उसमें विविधता उपलब्ध रहती है, तब तक हमारा और समाज का संतुलन बना रहता है।

आज न्यूज टेलीविजन संयम खो चुका है। वह समाज को कुरेदने का यंत्र बन चुका है। हर चैनल पर ‘एंग्री यंग एंकर’ गुत्थमगुत्था करने के लिए आतुर बैठे हैं। उनका अंदाज पुराना आ बैल मुझे मार वाला नहीं, बल्कि कोई बैल लाओ जिसे मैं मारूं वाला है। हर रोज उनके लिए एक बैल तय कर दिया जाता है और वे उसे अगले दिन सुबह से शाम तक पटक-पटक के मारते हैं। यह अलग बात है कि न्यूज टेलीविजन में बैल असली नहीं, बल्कि फूस वाला होता है। एंकर बेधड़क उस पर टूट, पेट फाड़ कर अतड़ियां निकाल लेता है।

नाटक की असलियत सब जानते हैं, पर प्रभावित होने से नहीं बच पाते हैं। घरों में आपस में चल रहे डिबेट इस बात का प्रमाण हैं कि टेलीविजन बंद हो जाने के बाद भी हमारे मन और दिमाग में चलता रहता है। हम न्यूज चैनल हो गए हैं, जिनका हमारे द्वारा प्रसारण शांत, गंभीर, स्नेहपूर्ण और तार्किक मानवीय संबंधों को अपनी ललकार में दबोच चुका है।

न्यूज चैनल के बढ़ते प्रभाव के कई कारण हैं। पिछले दशक तक टेलीविजन मूलत: मनोरंजन का साधन था। पर इस दशक के शरुआती सालों से यह एक राजनीतिक हथकंडा बन गया।राजनीतिक उद्देश्यों ने लोक सरोकार की खबरों को गायब करके उसके स्थान पर प्रोपगंडा और उद्वेलन को प्रतिष्ठित कर दिया। चाहे शाहीनबाग वाला मामला हो, कोरोना और तब्लीगी जमात का, चीन, पाकिस्तान या फिर सुशांत सिंह राजपूत की मौत का, न्यूज चैनलों ने मुद्दे उठाने के बजाय उत्तेजना फैलाई है।

हर बार उन्होंने हमारे सामाजिक, आर्थिक, राष्ट्रीय या राजनीतिक व्यवस्था को कुरेदा है, जिससे एक बड़ा वर्ग बिलबिला उठा है। यह वर्ग वह है, जो न्यूज चैनलों पर चल रही बहसों से सबसे ज्यादा जुड़ा हुआ है। यह वह वर्ग भी है, जिसको लगता है कि उसके निजी पूर्वाग्रह और संकीर्ण अनुभव वास्तव में देश और उसके मानस की वास्तविकता है। न्यूज चैनल इस असत्य वास्तविकता का पूरे बल से प्रचार करके जहां एक तरफ हमारे समय के सच को नकार रहा है, वहीं दूसरी तरफ कुंठित पूर्वाग्रहों के असत्य को सत्य के रूप में प्रतिष्ठ भी कर रहा है।

न्यूज चैनलों के समर्पित दर्शक अपने पूर्वाग्रहों के सार्वजनिक अनुमोदन की वजह से हठी होते जा रहे हैं। उन्हें एंकर के चिल्लाने में अपना स्वर सुनाई पड़ता है। एंकर उनके गुस्से को मुखरित करके उन्हें एक अजीब-सी संतुष्टि देता है।
वास्तव में न्यूज चैनल वर्तमान समय का एक राजनीतिक हादसा है। राजनीति चैनेलों के जरिए भावोत्तेजक सामग्री प्रसारित कर रही है। यह एक तरह का हांका है, जो हमें झुंडों में बांध रहा है।

विडंबना यह है कि हांके में आने के बाद हम खुद औरों के लिए हांका लगाने में जुट गए हैं। हमारी नाराजगी यह हो गई है कि दूसरा व्यक्ति भी हमारी तरह लामबंद क्यों नहीं है। चैनल ऐसे छूटे लोगों से नाराज होकर उन पर चिल्लाते हैं। हम भी चिल्लाने लगे हैं- अपने घरवालों, दोस्तों और सहयोगियों पर। चैनलों द्वारा प्रवाहित भावनाओं की बाढ़ ने हमें इस तरहे घेर लिया है कि हम अपनी सुध-बुध खो बैठे हैं। जल्द ही यह हमें भी ले डूबेगी।

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