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तीरंदाज: तंगी में शाहखर्ची

नोटबंदी से मैं खुश हूं। खर्चा कर-कर के परेशान हो गया था। नोट आते थे और बंद मुट्ठी की रेत की तरह फिसल जाते थे।

मुंबई के थाने में अपराध शाखा की पुलिस 1 करोड़ 40 हज़ार के जब्त ऩए नोटों के साथ। (PTI Photo/14 Dec, 2016)

नोटबंदी से मैं खुश हूं। खर्चा कर-कर के परेशान हो गया था। नोट आते थे और बंद मुट्ठी की रेत की तरह फिसल जाते थे। बहुत पैसे आए और परेशान करके गए। न कमाने की हद थी, न खर्च करने की। नोट बंद हुए, बैंक ने अंकुश लगाया और सब कुछ ठीक वैसा ही हो गया जैसा पहले था। अच्छा लगा।
अस्सी के दशक की शुरुआत ही हुई थी कि नौकरी लग गई। साल, दो साल में मैं बारह सौ रुपए कमाने लगा। नया-नया जोश था, सो शादी भी कर ली। रोज सुबह बेगम साहिबा दस रुपए देती थीं। उसमें स्कूटर में पेट्रोल भी डलवाना होता था, दिन भर चाय- पानी करनी होती थी और शाम का इंतजाम भी करना पड़ता था। पेट्रोल हर दूसरे दिन डलवाते थे, बचत थोड़ा पैदल चल कर आसानी से हो जाती थी, चाय कम कर दी थी और दोस्त पैसे मिला कर शाम का कुछ सस्ता इंतजाम कर लेते थे। अक्सर बेगम देर रात थंप्स-अप पीने की इच्छा जाता देती थीं। फिर हम दोनों ढूंढ़-ढांढ़ कर एक-आध चवन्नी निकाल लेते थे और उसमें इधर-उधर रखे हुए दस-पांच पैसे मिला कर ठंडा पी लेते थे। पता नहीं क्यों, पर कभी भी हमें पैसे की तंगी महसूस नहीं हुई। हां, कुछ खर्चे रोक कर कुछ और जरूरी खर्चे किए जाते थे, पर कभी भी ऐसा नहीं लगा कि नोटों की कमी की वजह से हमारा कोई काम रुका हो या इस मजबूरी की वजह से मन दुखी हुआ हो।

जब बारह सौ पाते थे तो मां ने अच्छे दिन की कामना करते हुए कहा था कि तनख्वाह दो हजार हो जाए तो सारे मोहल्ले में लड््डू बंटवा दूंगी। भगवान ने शायद उनके मन की खास बात सुन ली और अलगे पांच साल में हमारी तरक्की सात-आठ गुना हो गई। नब्बे के दशक की शुरुआत होते-होते हम उन गिने-चुने लोगों में शामिल हो गए, जिन्हें दस हजारी कह कर पुकारा जाता था। दस हजारी यानी दस हजार रुपए पाने वालों का एक्सक्लूसिव क्लब, जो स्कूटर से मारुती 800 पर चलाने लगा, ताज मानसिंह होटल की कॉफी शॉप में बैठने लगा, फ्लैट खरीद कर इएमआइ देने लगा और के्रडिट कार्ड से खरीद-फरोख्त में लिप्त था। बहुत अच्छे दिन थे- दिल-हाथ खोल कर खर्चा किया था। उस समय से आज तक लगभग पच्चीस साल हो गए हैं, जिसमें सिर्फ कमाया और खर्च किया। एक की जगह दो और फिर तीन मकान खरीदे- रहने के लिए नहीं, सिर्फ इसलिए कि पैसे हैं और खर्च करने हैं। एक की जगह छह-आठ कमीजें खरीद लीं, क्योंकि दिल आ गया। गाड़ियां खरीद डालीं, क्योंकि किसी ने कहा, यार वो वाला मॉडल बहुत उम्दा है। बच्चों को वह सब ले डाला, जिसकी उन्होंने कभी खवाइश भी नहीं की थी और न जरूरत थी। पापा का मूड आया और खरीद लिया लाड़ में। बच्चों ने एक बार देखा और फिर डाल दिया कोने में। खर्चा करने में ही बस खुशी थी। उपयोगिता से उसका कोई लेना-देना नहीं रह गया था। वास्तव में हम बिना कुछ सोचे अपनी गहरी जेबों के अंधकार में उतरते जा रहे थे। रोज कुआं और गहरा करते जा रहे थे, दलदल में कागज के कमल खिला कर मस्त थे।

नोटबंदी अचानक टिड््डी दल की तरह आई और कागजी फसल को बर्बाद कर गई। हम सब हतप्रभ रह गए। जैसे काटो तो खून नहीं। नोट गायब। जीवन समाप्त। पैसा हवा में उछालने की आदत पड़ गई थी, उस शाम हवा में खाली हाथ उछाल रहे थे। बड़ा अजीब लग रहा था। बड़ा गुस्सा आ रहा था। टीवी कह रहा था की जल्दी सब सामान्य हो जाएगा, यह सिर्फ कुछ दिन की परेशानी है। पर बिना नोट के मन खिन्न हो गया था। हम एक जीवन-शैली के दास हो गए थे और यकायक उससे रिहाई सन्न कर गई थी। लगभग चालीस दिन हो गए है। बैंक वाला झउवा भर कर नोट अब भी नहीं दे रहा है। सोनार की तरह तोल-तोल कर करेंसी बांटता है। पर इस दौरान नोटों के लिए बिलबिलाहट खत्म-सी हो गई है। घर में लड़के की शादी भी निपट गई। नोट नहीं थे, पर मजा पूरा आया। सभी अरमान पूरे किए, बस फर्क इतना था कि पानी की तरह पैसा नहीं बहाया। बहुत अरसे के बाद, शायद एक उम्र बीत जाने के बाद, फिर से अहसास हुआ कि कम भी बहुत होता है। मजे की बात यह है कि नई खरीदारी रुक जाने की वजह से हमने जब अपने घर का सामान खंगाला तो बहुत से ऐसे सूट, साड़ी और ज्वेलरी मिली, जिसको हमने कभी पहना ही नहीं था। किसी उचंग में खरीदा था और फिर यों ही कहीं डाल दिया था। नोटबंदी का शुक्रिया कि सुकारत लगा। चवन्नी की जगह दस दस के नोट ढंूढ़ कर सब्जी खरीदने से फिर से पैसे का मूल्य समझ में आया है।

नोटबंदी देश की अर्थव्यवस्था पर क्या असर डालेगी, जानकर लोग ज्यादा जानते हैं। मैं सिर्फ व्यक्ति विशेष की बात कर रहा हूं। शायद इन चालीस दिनों में उपभोक्तावाद की शून्यता एक नया अनुभव दे गई है। कुछ दिनों पहले ज्यादा भी कम था। आज कम भी इतना कम नहीं है। आने वाले समय में जब सब सामान्य हो जाएगा तो क्या यह अनुभव हमारे खर्चीले स्वभाव पर असर छोड़ेगा? क्या नोटबंदी अति उपभोगवादी प्रवृत्ति से हमें सिर्फ उपभोगवादी मानसिकता तक ही रोक पाएगी? नोटबंदी का अर्थव्यवस्था से साथ-साथ सामाजिक व्यवस्था और व्यक्ति विशेष के आर्थिक आचरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा? क्या हम नोटबंदी के शॉक से ज्यादा स्थिर हो जाएंगे या फिर बिखर जाएंगे? हर व्यवस्था, चाहे आर्थिक हो या सामाजिक, भरोसे पर चलती है। जब तक साहब का इकबाल बुलंद है, माहौल दुरुस्त है, व्यवस्था दुरुस्त है। इसके बिना सब किया-धरा पानी में मिल जाता है।

इन चालीस दिनों में एक आम आदमी की मानसिकता में कही न कही परिवर्तन जरूर आया है। मैं खुश हूं, क्योंकि थोड़ा ज्यादा से थोड़ा कम का अहसास मुझे सुखद लगा। पर हर वर्ग में ऐसा नहीं हुआ होगा। किस वर्ग में क्या हुआ और फिर पूरी सामाजिक संरचना में इसका क्या प्रभाव रहा, इसका अंदाजा लगाना उतना ही जरूरी है जितना कि अर्थव्यवस्था पर असर की गणना करना जरूरी है। व्यक्ति ही अर्थ करता है और फिर उससे व्यवस्था बनती है। हमें व्यक्ति को पढ़ना तुरंत शुरू कर देना चाहिए। यहीं से हमें नोटबंदी के असर के असली सुराग मिलेंगे।

 

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