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तीरंदाज- हमें गांव जाना है

‘बाउजी, हमें गांव वापस जाना है। हमको गांव भिजवा दीजिए। यहां हम जी नहीं पा रहे हैं। इतने साल हो गए हैं, पर अब भी सब अजीब लगता है। पिस रहे हैं यहां, अपना कोई नहीं है यहां...।’
प्रतीकात्मक तस्वीर

उजी’, वह हड़बड़ाती हुई कमरे में दाखिल हुई और इधर-उधर हैरान आंखें दौड़ाने लगी- ‘ये गाना कौन गा रहा है?’
‘टीवी पर आ रहा है।’ हमने कहा।
उसके हाथ से झाड़ू अनायास छूट गई और वह टीवी की तरफ मुखातिब हो गई। हौले-हौले साथ में गाने भी लगी।
‘हमारे गांव का है।’ उसने जल्दी से बताया और उसके होंठ फिर सुर में चलने लगे।
‘कौन गा रहा है? कहां?’ उसने एक पल मुड़ कर सवाल किया और धुन में फिर मस्त हो गई।
‘गणतंत्र दिवस की परेड में हो रहा है।’ हमने बताया।
‘किसमें बाउजी?’ उसने मासूमियत से सवाल किया, पर उसकी निगाहें स्क्रीन पर टिकी थीं। साथ में गुनगुना भी रही थी।
गाना खत्म हो गया। झांकी आगे बढ़ गई।
‘हमारे इलाके का है गाना, बाउजी… बहुत गाया है… किशन भगवान का जब जन्मदिन होता था, तो हम सब गांव की लड़कियां मिल कर खूब झांकी सजाते थे… वही गाते थे… एक बार हमको राधा भी बनाया था…।’ कहते हुए वह शर्मा गई। ‘हमारे गांव में बड़ी बावली लड़कियां हैं… सोचिए हमको ही राधाजी बना दिया था…।’
‘तुम बुंदेलखंड की हो?’
‘और का! वहीं पैदा हुए, वहीं शादी हुई… ये तो अब आठ साल से नोएडा में ठोकरें खा रहे हैं… घर-घर झाड़ू-पोंछा लगा रहे हैं, जबकि हमारा अपना घर धूल खा रहा है।’ वह उदास हो गई।
‘तो फिर क्यों आई यहां?’
‘और क्या करते? मर्द वेल्डर बन गया, क्योंकि खेत सूख गए थे… महीने के हजार-दो हजार ही कमा पता था… इतने में कहां काम चलता है भला… उसके जानने वाले गांव छोड़ कर जा रहे थे… वह भी चला आया नोएडा… सुना था, बहुत काम मिलता है यहां…।’
‘फिर?’
‘फिर क्या बाउजी, आप देख ही रहे हैं। उसको कभी-कभी काम मिल जाता है, बाकी हम झाड़ू-पोंछा करते हैं। गांव में होते तो घर बैठे होते… बच्चों को देखते।’
वह फिर टीवी की तरफ मुखातिब हो गई।
‘ये दिल्ली में हो रहा है क्या?’
‘हां।’
‘कौन-सा कार्यक्रम है?’
‘बताया तो, गणतंत्र दिवस।’
उसने न समझते हुए भी सिर हिला दिया और फिर एक पल बाद अचानक चहक कर बोली, ‘आज ही के दिन वह किताब लिखी गई थी न? छब्बीस तारीख को?’
‘किताब नहीं…’ हमने शुरू किया, पर उसने बीच में ही काट दिया।
‘हां, हमें सब मालूम है, स्कूल में मास्टरजी ने बताया था कि आज के दिन किताब लिखी गई थी… हम लोग स्कूल जाते थे, झंडा लगता था और मास्टरजी कहते थे कि छब्बीस जनवरी को किताब लिखी गई थी… लड्डू भी बांटे जाते थे।…’ उसकी आंखें चमकने लगीं।
हमने सिर हिला दिया।

‘पर एक किताब लिखने पर इतनी खुशी करने की क्या जरूरत है? हमारे मास्टरजी ने भी एक किताब लिखी थी… कहते थे तुम लोगों के लिए लिखी है… आठवीं पास करने के लिए जरूरी है… पर पढ़ता कौन है?’ उसने खिलखिला कर कहा, ‘हम तो बिना पढ़े ही पास हो गए थे।’
हम मुस्कराए, पर उसने तपाक से सवाल दाग दिया, ‘आपने यह किताब पढ़ी है?’
‘हां, पढ़ी है।’
‘कैसी है? मजे की है?’
‘मजे की नहीं है… इस किताब से देश चलता है।’ हमने पूरी गंभीरता से कहा।
‘अच्छा,’ उसने झाड़ू फिर उठा ली, ‘मास्टरजी तो फिर ठीक ही कहते थे… इसी किताब से टीप-टीप कर ये लोग देश चलाते हैं… पर किताब पढ़ने के बाद कोई परीक्षा भी होती है?
हमको उसके भोलेपन पर हंसी आ गई।
‘बाउजी, आप हंस रहे हो, पर आप ही बताओ किताब पढ़ने का फायदा तभी है न जब परीक्षा पास करनी पड़े? वर्ना किताब पढ़ने की जरूरत क्या है? और अगर परीक्षा नहीं लेनी है, तो फिर लिखी ही क्यों थी?’
‘यह किताब वह वाली नहीं है पगली। यह देश का संविधान है, जिसमें देश किस तरह चलेगा, लिखा है। हम सब इसी के हिसाब से काम करते हैं।’
उसने मूंड़ हिला दिया और टीवी फिर देखने लगी।
‘बाउजी, ये पुलिस वाले यहां इतनी चमकीली वर्दी क्यों पहने हैं… सिर पर मोर वाली पगड़ी बांधे हैं… हमारा दरोगा तो थाने में बनियान पहन कर बैठता है… हां, मोटरसाइकिल पर जब निकलता है तो सिर पर गमछा जरूर बांध लेता है… बहुत बिगड़ैल है।’
‘यह परेड वाली ड्रेस है। तुम्हारे यहां गर्मी बहुत होती है शायद, इसीलिए वह थाने में बनियान पहनता होगा।’
‘जाने दीजिए उसको बाउजी, कहा न बहुत बिगड़ैल है… डकैत भी उसके आगे कुछ नहीं है। हम जात वाले साथ न रहें तो लूट ले, किसी को भी बंद कर दे या फिर बहन-बच्ची को शाम को थाने बुला ले… किताब में ऐसा करना लिखा है क्या?’
‘नहीं। उसमें सबको बराबरी का हक दिया गया है, सबको न्याय दिलवाने की व्यवस्था की गई है।’
हमारी बात सुनते ही उसकी हंसी छूट गई। पल्ले के कोने से मुंह ढक कर कुछ देर हंसती रही। फिर गंभीर हो गई।
‘बाउजी, हमें गांव वापस जाना है। हमको गांव भिजवा दीजिए। यहां हम जी नहीं पा रहे हैं। इतने साल हो गए हैं, पर अब भी सब अजीब लगता है। पिस रहे हैं यहां, अपना कोई नहीं है यहां…।’

‘पर गांव में भी तो समस्या है, कम से कम यहां कुछ कमा तो रही हो।’
‘क्या कमा रहे हैं… सब खर्च हो जाता है… पंद्रह हजार हम लोग मिल कर बना लेते हैं, पर उधार पर ही चलते हैं। गांव में पांच हजार से भी काम चल जाएगा… कुछ बच भी जाएगा… जमीन भी है… वहीं भिजवा दीजिए… बस पांच हजार चाहिए…।’ उसका गला रूंध गया।
परेड देखने से हमारा मन हट गया। पता नहीं क्यों उसकी घर जाने वाली बात से जुड़ाव महसूस होने लगा।
‘बाउजी, किताब में गांव जाने वाली बात पर कुछ नहीं लिखा है क्या?’
हम सोच में पड़ गए। लिखा तो बहुत कुछ है, पर उसको क्या बताते? उजड़े हुए को गांव का कौन-सा रास्ता बताते?

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