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तीरंदाज- है और होने के बीच

ब्राह्मण होने से कोई हिंदू नहीं हो जाता, भाई साहब। हां, मैं ब्राह्मण परिवार में पैदा जरूर हुआ था, इसलिए नाम के साथ चतुर्वेदी लगाता हूं।

इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

मैं हिंदू बनना चाहता हूं, कैसे बनंू?
हमने उसकी तरफ गौर से देखा। तुम तो ब्राह्मण हो, फिर हिंदू कैसे नहीं हो?
बस नहीं हूं। बनना चाहता हूं।
कैसे नहीं हो? बिल्कुल हो। अगर ब्राह्मण हिंदू नहीं है तो फिर और कौन है?
ब्राह्मण होने से कोई हिंदू नहीं हो जाता, भाई साहब। हां, मैं ब्राह्मण परिवार में पैदा जरूर हुआ था, इसलिए नाम के साथ चतुर्वेदी लगाता हूं। लोग पंडितजी-पंडितजी कह कर पुकारते भी हैं, पर मेरे भीतर से हिंदू वाली भावना नहीं निकलती है। उस भावना को निकालना चाहता हूं। हिंदू बनना चाहता हूं।
तुम्हें क्या हो गया है? कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हो, हमने असमंजस से पूछा।
मैं बहक नहीं रहा हूं, पूरे होशोहवास में आपसे राय मांग रहा हूं, उसने बड़ी गंभीरता से कहा।
अच्छा बताओ, समस्या क्या है?
बताया तो, मैं चतुर्वेदी हूं, पर कोई हिंदू मानने को तैयार ही नहीं है।
कौन नहीं मानता है?
अरे आसपास वाले। कहते हैं तुझमें हिंदू वाले लच्छन नहीं हैं।
हमें हंसी आ गई।
ठीक कहते हैं लोग। तुम सुधर जाओ।
कैसे सुधरा जाए, समझ में नहीं आता है। आप ही कुछ सुधार-बिंदु बताइए।
पहले तो तू अपना हुलिया सुधार। हमने बेबाक राय दी।
कैसे? ठीक तो लग रहा हूं मैं। बढ़िया कोट-पैंट पहना हुआ है। क्या कमी है हमारे पहनावे में?
इनको उतार दो। धोती पहन लो और उस पर कुर्ता डाल लो।
धोती कभी नहीं पहनी, भाई साहब। हमेशा से पैंट-कमीज ही पहनी है। पहनेंगे तो अजीब लगेगा सबको, खासकर घरवालों को। उनकी आदत पड़ गई है न हमको ठीक कपड़े पहने देखने की।
हमने बीच में ही उसे टोक दिया, क्या मतलब है तुम्हारा ठीक कपड़े से? क्या धोती ठीक नहीं है?
नहीं, नहीं मेरा यह मतलब नहीं था।… उसने सफाई देने की कोशिश की।
तो क्या मतलब था? हमने फिर टोका।
हम कहना ये चाह रहे थे कि…
तुम चाह कुछ भी रहे हो, पर कह क्या रहे हो? यही कह रहे हो न कि धोती ठीक नहीं है?
नहीं, नहीं भइया, धोती ठीक है। बहुत अच्छी पोशाक है, पर हमारी आदत नहीं है न उसको पहने की इसलिए कहा था।
हिंदू बनना है तो अपनी आदतें ठीक करो। हिंदुओं वाले कपड़े पहनो। यह क्या म्लेच्छों का वस्त्र-धर्म अपना रखा है तुमने? अपनी पुरातन रीत पर चलना सीखो। हिंदू बनने के लिए पहले हिंदू जैसा दिखना सीखो।
उसने हामी में सिर हिलाया। हमको उसे और धकेलने का मौका मिल गया था।
और हां, कुछ पूजा-पाठ करते हो?
करते हैं, भाई साहब। जब भी मन बनता है तो सुबह नहा-धोकर दुर्गा पाठ कर लेते हैं। पिताजी ने सिखाया था बचपन में। हां, रोज नहीं करते हैं।
हमने भृकुटी सिकोड़ी।
पर भाई साहब, हम मंगल का व्रत हर हफ्ते रखते हैं। उसने जल्दी से स्पष्ट किया।
हमने उसे फिर नजर भर कर देखा। वह कांप-सा गया।
मत्था खाली क्यों रखते हो? ब्राह्मण हो, पर तिलक नहीं लगाते हो।
तिलक… वह अचकचाया।
हां भाई, तिलक। और अंगोछा कहां है? गला उघाड़ कर घूमते रहोगे क्या? टाई लगाना मंजूर है, पर अपने अंगोछे से परहेज है क्या?
नहीं परहेज किसी से नहीं है, पर अपना रहन-सहन ऐसा है कि इसका कभी खयाल ही नहीं आया था।
इसीलिए तो बता रहा हूं। अब खयाल करो वरना हिंदू बनने से खैर मांगो। कब तक तुम इन्नोसेंट बने घूमते रहोगे? और नमस्ते करते हो या फिर राम-राम?
हम लोग तो हाय-बाय ही करते हैं, उसने खिसिया कर कहा, इसी सलाम-दुआ का चलन है।
हाय-बाय और सलाम-दुआ, यह कैसे शब्द तुमने सीख लिए हैं? फेंको इनको। हमारे यहां अभिवादन करने और कुशल-मंगल पूछने का तरीका अलग है। राम-राम कहो, और अगर ज्यादा हिंदू बनना है तो जय श्रीराम बोलो। यह सब क्या है- हाय और सलाम-दुआ?
उसने सिर झुका कर शर्मिंदगी दर्शा दी। हमें अच्छा लगा।
और राष्ट्र से प्रेम करते हो?
उसने तुरंत सिर उठाया और चौड़े से कहा, क्यों नहीं करते हैं। आपको शक कैसे हो गया कि हममें देश प्रेम नहीं है?
मुझे शक नहीं यकीन है कि तुम नहीं करते हो, हमने हल्का-सा गुर्राया।
ऐसा आपको क्यों लगा भाई साहब?
क्योंकि कभी भी हमने तुम्हें नारे लगाते हुए नहीं देखा है। तुम्हारे घर की छत पर कपड़े सुखाने के लिए बांस के ठुथ लगे हैं, झंडा नहीं लगा है।
झंडा नहीं लगा है भाई साहब, पर हम मानते बहुत हैं।
मानने से क्या होता है? सब दिल में ही रखोगे या फिर कुछ दिखाओगे भी? हिंदू बनना है तो छाती फाड़ कर दिखानी होगी, ऐसे चुपाचुप काम नहीं चलेगा! गर्भ से निकलो, गर्व पर आ जाओ, समझे?
जी भाई साहब, वह मिमिआया। हमें अच्छा लगा, पर अभी एक धक्का और देना बाकी था।
और दोस्ती-वोस्ती कहां-कहां पाल रखी है, हमने सख्त अंदाज में पूछा।
हर जगह है, सबसे है। आप तो जानते हैं हम कान्वेंट स्कूल में आपके जूनियर थे। क्या क्रिसमस और क्या ईद, होली या दिवाली, सब अपने दोस्तों के साथ ही मनाई है।
दोस्ती का दायरा कम करो। होली-दिवाली तक ही ठीक है, इससे ज्यादा उछल-कूद मत करो। जानते नहीं जमाना कितना खराब है? बौड़म हो क्या?
यह आप क्या कह रहे हैं?
ठीक ही तो कह रहे हैं। ऐसा नहीं करोगे तो हिंदू कैसे बनोगे? सकपका क्यों रहे हो?
भाई साहब, इस किस्म के हिंदू हम कैसे बन जाएं? आप तो हमारा हुलिया ही बदल दे रहे हैं। आपने जो बताया है अगर वह हम कर लेंगे तो अपने को पहचान भी नहीं पाएंगे।
पहली बार उसने हमसे नजरें मिलाई थी। अब हम सकपका गए। पर हमने अपने को संभालते हुए पलटवार किया- हम क्या बता रहे थे, तुमने ही तो पूछा था हिंदू बनना चाहता हूं, कैसे बनंू?
हां पूछा जरूर था, पर आपने तो हमे अखबार में छपी फोटो वाला हिंदू बना दिया। हम वैसे नहीं हैं।
तो फिर तुम हिंदू हो कहां? हमने चिढ़ाया। लोग ठीक ही तो कहते हैं, तुममें हिंदुओं वाले लच्छन नहीं हैं।
आपने दुरुस्त कहा भाई साहब। वो लच्छन हमें नहीं दिखाने हैं। हमें अखबार वाला हिंदू नहीं बनना है। मुन्सीपैल्टी का चुनाव भी नहीं लड़ना है। मासूम-सी जिंदगी जीना है। हिंदू न बन पाए तो क्या हुआ, चतुर्वेदी तो हम जन्मजात हैं। उसी में हम खुश हैं, सुखी हैं। अब हम घर चलते हैं, पड़ोसी दावत पर हमारा इंतजार कर रहे होंगे।

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