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तीरंदाज: पलने वाले, पालने वाले

हम सबको किसी न किसी तरीके की देखरेख चाहिए और अगर नहीं चाहिए, तो भी हमारा सामाजिक अनुकूलन इस प्रकार का है कि हमारी सोच इसकी परिधि में ही घूमने पर मजबूर है। ऐसी स्थिति में हम सब कभी किसी को पालते हैं या फिर कोई हमें पाल लेता है। अक्सर दोनों- पलना और पालना- साथ-साथ चलते हैं और इसीलिए व्यक्ति सदा आश्रित भी है और स्वतंत्र भी।

प्रतीकात्मक फोटो (Source: Agency)

बहुत से लोगों की फितरत ऐसी होती है कि वे पालने से बाज नहीं आते हैं। कोई जानवर पालने का शौक फरमाता है, तो कोई अपने आसपास के लोगों को पालने में माहिर होता है। पर इन सबके आलावा हम अपने अंदर भी कुछ न कुछ जरूर पालते रहते हैं- जैसे कोई खुशफहमी या गलतफहमी। हम इन्हें किसी कोने में दबाए रखते हैं। किसी लख्ते-जिगर की तरह इन्हें बड़े लाड़ से दाना-पानी देते रहते हैं, उनको दुलारते रहते हैं। पालना हमारा शौक भी है और मजबूरी भी। पूर्व इतिहास काल में आदमी कुछ नहीं पालता था। सुबह उठ कर शिकार पर निकल जाता था और दिन भर पशु-पक्षियों का पीछा करके एकाध को मार गिराता था। उसी से उसकी रोटी चल जाती थी। उसके पास खेत और खलिहान भी नहीं थे। वह जंगल में रहता था और मेहनत करके या तो किसी जानवर को मार लाता था या फिर कुछ वनस्पतियां उखाड़ लेता था।

हमें यह अभी ठीक से पता नहीं है कि कुछ जानवर खुद चल कर पलने आए थे या फिर मनुष्य ने उन्हें बहला-फुसला कर अपने से जोड़ लिया था। कहा जाता है कि कुछ जानवरों की प्रवृत्ति होती है कि वे मनुष्य के पास स्वाभाविक रूप से चले आते हैं। कुत्ता इसका अच्छा उदहारण है। जरा-सा प्यार मिला नहीं कि वह अपने आप ही पल जाता है और एक बार पल गया तो फिर उसको जितना भी दुत्कारो वह दुम हिलाता हुआ पीछे चलता रहेगा। उसे इसीलिए सबसे वफादार जानवर कहा जाता है। पर हर पशु-पक्षी कुत्ते जैसा नहीं है। ज्यादातर जानवर स्वच्छंद प्रवृत्ति के हैं और बहुत मजबूरी में ही अपने को पालने देते हैं।

मुर्गियां जरूर पल जाती हैं, पर वे भी सिर्फ एक हद तक। उनको बाड़े में रखा जाता है, क्योंकि मौका मिलते ही उनके भागने का अंदेशा रहता है। तोता-मैना भी लोग पालते हैं, पर मनुष्य जाति को वे ज्यादा नहीं झेल पाते हैं। इसी तरह लगभग हर जीव का प्राकृतिक रुझान पलने के विपरीत है। वह जब फंस जाता है तो किसी तरह अपनी जिंदगी का वक्त मनुष्य के इशारों पर नाच कर, करतब दिखा कर या फिर मिट्ठू-मिट्ठू करके गुजार देता है। सर्कस के घोड़े, शेर, हाथी, भालू, दरियाई घोड़े आदि ऐसे ही जीव हैं। बेचारे फंसे हुए हैं और रिंग मास्टर के कोड़ों के सामने मजबूर हैं। करतब दिखाना उनकी लाचारी है। पर मनुष्य एक विशिष्ट प्राणी है। उसे पालने का शौक उस दिन उपजा था, जिस दिन भोजन प्राप्त करने के आसान तरीके का विचार उसके दिमाग में कौंधा था। कमजोर और कम फुर्तीले पशु-पक्षी, जैसे मुर्गियां, भेड़-बकरियां, गाय-भैंस आदि को उसने घेरा और बाड़े में सहेज लिया था। खाने के बाद परिवहन और ढुलाई की जरूरत को भी उसने हाथी, घोड़ा-गधा-खच्चर जैसे जानवरों से पूरा कर लिया था। अपनी सुख-सुविधा के लिए प्रकृति में उपलब्ध अन्य जीवों को जोतना मनुष्य जाति की बेहतरीन सोच और जुगाड़-परस्ती के नायाब नमूने हैं।

वास्तव में मनुष्य को पालने का चस्का ऐसा लगा कि उसने उसको अपने पर भी लागू कर दिया। वह सलीके से बच्चे पालने लगा, रिश्ते पालने लगा, समाज में खुद पलने लगा और धर्म पालन जैसी दुरूह परिकल्पना के बाड़े की सुपुर्दगी में उसने खुद को निछावर कर दिया। वैसे जो पलता है, वह पालने वाले पर आश्रित होता है। पालने वाला पलने वाले की देखरेख करता है और उसकी एवज में उसका पूरा दोहन करता है। मनुष्य सिर्फ जानवर के साथ ऐसा नहीं करता, बल्कि अपनी जाति के साथ भी ऐसा करता है।

हम सबको किसी न किसी तरीके की देखरेख चाहिए और अगर नहीं चाहिए, तो भी हमारा सामाजिक अनुकूलन इस प्रकार का है कि हमारी सोच इसकी परिधि में ही घूमने पर मजबूर है। ऐसी स्थिति में हम सब कभी किसी को पालते हैं या फिर कोई हमें पाल लेता है। अक्सर दोनों- पलना और पालना- साथ-साथ चलते हैं और इसीलिए व्यक्ति सदा आश्रित भी है और स्वतंत्र भी। बोलचाल की भाषा में यह स्थिति साफ नजर आती है। हम दिल में मोहब्बत पालते हैं, पर शादी को निभाते हैं, दुख पालते हैं, पर सुख महसूस करते हैं। दोस्ती और दुश्मनी भी पाली जाती है, ठीक उसी तरह जैसे बच्चे पाले जाते हैं। ईश्वर पालनहार है, जैसे कि पृथ्वी और प्रकृति पालनहार है। यह सब हमें पालते हैं, क्योंकि हम इन पर आश्रित हैं। सुख क्षणिक है, इसलिए हम उसे नहीं पालते हैं।

दुख को हम पालते हैं, क्योंकि वह हमारे साथ लंबे समय तक चलता है। दुख हमारा आश्रय है, वैसे ही जैसे कि पहला इश्क जिंदगी भर रह-रह कर टीस मारता है। इश्क को इसीलिए पाला जाता है। पलते-पलते वह निभ भी जाता है। वैसे पालने में मनुष्य अपनी हेकड़ी समझता है। हम सतत प्रयास करते रहते हैं कि हम अपना प्रभाव लगातार बढ़ाते रहें, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग हम पर आश्रित हो जाएं। दूसरे शब्दों में, हमारे पालतुओं की संख्या में लगातार वृद्धि होती रहे। अपना प्रभाव रच कर हम इसमें अपनी अकड़ समझते हैं कि कोई भी काम कराना है तो उसके लिए हमारे पास आना होगा। दूसरों को अपने बाड़े में बंद करके, यानी अपने पर आश्रित करके, हम अपने मर्म में बसे अहंकार को पालते हैं, अपने को राजा-महाराजा या जननायक कहलाने के लिए उत्सुक हो जाते हैं।

पर हर पालक भी किसी का पला हुआ होता है। असल में पलना और पालना एक वृत्तीय प्रक्रिया है, जिसका आदि और अंत दोनों एक बिंदु पर है- जहां से शुरू होता है वहीं पर वह तुरंत खत्म हो जाता है। यह सब जानते हैं, पर कोई नहीं जानता है! जाने-बूझे अनजाने से हम खुशफहमी पालते रहते हैं और पले हुए होने के बावजूद पालक होने का दावा करने से नहीं चूकते हैं। गलतफहमियां जिंदगी भर चलती हैं, हम उन पर बार-बार आश्रित हो जाते हैं और इसीलिए कहा जाता है कि भई, गलतफहमी क्यों पाल रहे हो?

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