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तीरंदाज: झूठ का बोलबाला

यह सच है कि झूठ की हमें लत लग गई है। हमारे प्राकृतिक पूर्वाग्रहों की वजह से यह ललक पैदा हुई थी और उसको स्वयं पूरा करते-करते हमारी मांग बढ़ती गई और झूठ के बड़े उत्पादक विधिवत तरीके से मांग को पूरा करने के लिए बाजार में सक्रिय हो गए।

सच की दमक क्षीण होती जा रही है और झूठ का प्रकाश सर्वत्र विद्यमान होता जा रहा है।

सच की दमक क्षीण होती जा रही है और झूठ का प्रकाश सर्वत्र विद्यमान होता जा रहा है। वैसे सच का बोलबाला, झूठ का मुंह काला वाली बात हम सबकी जुबान पर चढ़ी है। दादी की कहानियों से लेकर दैनिक संदर्भों तक हम मानते थे कि भूत और झूठ के पैर नहीं होते हैं और दोनों ही सच की रोशनी के सामने ठहर नहीं पाते हैं। पर पिछले डेढ़ दशक से हम अनायास ही झूठ के साथ होते जा रहे हैं। सच का चेहरा हमारे लिए धूमिल हो गया है और झूठ दमकने लगा है। उसकी चमक हमें पसंद आने लगी है।

विश्व भर में, खासकर अमेरिका और यूरोप में, कई अध्ययन हुए हैं, जिनसे यह पता चला है कि हमारी पहली पसंद झूठ बनती जा रही है। वास्तव में हालात इतनी तेजी से बदले हैं कि अगर आज हमारे सामने सच और झूठ दोनों एक साथ रखे जाएं तो हम अमूमन झूठ का ही चुनाव करेंगे। ऐसा बड़ा बदलाव होने के कई कारण हैं, जिनके बारे में हम आगे चर्चा करेंगे, पर यह बदलाव लाने में फर्जी खबरों ने अप्रत्याशित भूमिका निभाई है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि सोशल मीडिया की उत्पत्ति और उस पर चलने वाली भ्रामक सूचनाओं (फेक न्यूज) की वजह से समाज की सोच में मूलभूत परिवर्तन आ गया है। अध्यययनकर्ताओं के अनुसार सोशल मीडिया ने निजी भ्रमों को इकठ्ठा और संगठित कर के सामाजिक वैधता प्रधान कर दी है। दूसरे शब्दों में, अज्ञान या मूढ़ता संगठित हो कर सामुदायिक ज्ञान की तरह प्रकट हो गई है। इस सामूहिक ‘ज्ञान’ से शाश्वत सत्य भी हार चुका है। वह इसके शोर में डूब गया है।

फेक न्यूज के कई प्रकार होते हैं। शोध संस्थान ‘फर्स्ट ड्राफ्ट’ के अनुसार फेक न्यूज सात प्रकार की होती हं। पहला प्रकार व्यंग है, जिसका उद्देश्य वास्तविक हानि पहुंचाना नहीं, बल्कि टांग खींचना होता है। दूसरा प्रकार ‘मिसलीडिंग कंटेंट’ (भ्रामक सामग्री) है, जिसमें जानबूझ कर ऐसी भ्रामक सूचना डाली जाती है, जिससे कोई व्यक्ति या मुद्दा उलझाया जा सके। इसके बाद है ‘इम्पोस्टर कंटेंट’ यानी पररूप धारण करके सूचना प्रसारित करना। फेक न्यूज का एक और प्रचलित रूप ‘फैब्रिकेटेड कंटेंट’ (जाली सामग्री) है, जिसमें पूर्णत: फर्जी जानकारी होती है और उसका उद्देश्य हानि पहुंचना होता है। ‘फाल्स कनेक्शन’ (गलत जोड़), ‘फाल्स कॉन्टेक्स्ट’ (गलत संदर्भ) और ‘मैनिपुलटेड कंटेंट’ (चालाकी से प्रस्तुत सामग्री) फेक न्यूज के अन्य प्रकार हैं, जो अब हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गए हैं।

फर्स्ट ड्राफ्ट के अनुसार ये सातों तरह की फर्जी खबरें इंग्लैंड के आम चुनाव में खूब चली थीं और आज भी हर मुद्दे पर इन्हीं का बोलबाला है। अमेरिका की स्थिति इंग्लैंड से बदतर है, क्योंकि वहां के राष्ट्रपति स्वयं रोजाना मीडिया को फेक न्यूज मीडिया के नाम से पुकारते रहते हैं। हालात इतने नाजुक हो गए हैं कि राजनीतिक संवाद में भ्रामक सामग्री का प्रसार फ्रीडम आॅफ एक्सप्रेशन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, के नाम पर होने लगा है। वास्तव में फेक न्यूज मीडिया ने पारंपरिक मुख्यधारा मीडिया को दरकिनार कर दिया है और अपने को सत्यता और शुद्धता का प्रमाण-पत्र दे रहा है।

झूठ का बोलबाला इसीलिए हो गया है, क्योंकि जनता ने स्वयं सच से सिंहासन खाली करा कर असत्य को उसकी जगह स्थापित किया है। इस सत्ता परिवर्तन में सोशल मीडिया- फेसबुक, ट्विटर, वाट्स एप्प अदि- की विशेष भूमिका रही है। सोशल मीडिया ने यह भूमिका तब तक अनजाने में निभाई है, जब तक उसका अपनी शक्ति से परिचय नहीं हुआ था। उसके बाद वह अपने कारोबार को बड़ा करने की फिराक में जानबूझ कर शामिल हो गया था। परिणाम यह हुआ कि वैश्विक स्तर पर झूठ प्रचार की सुनामी आ गई है, जिसने हमारे सार्वभौमिक मूल्य तबाह हो गए।

पर ऐसा तभी संभव था, जब सोशल मीडिया हमारे अंदर सुप्त पड़े भाव को सक्रिय करने में सक्षम होता। ‘बिहेवियर साइंटिस्ट्स’ के अनुसार हम चार प्रकार के पूर्वाग्रहों से प्राकृतिक रूप से प्रेरित हैं- ‘कन्फर्मेशन बायस’ (पुष्टि पूर्वाग्रह), ‘फेमिलारिटी बायस’ (पूर्वपरिचय पूर्वाग्रह), ‘सेलेक्टिव एक्सपोजर’ (चयनात्मक पूर्वाग्रह) और ‘डिजायरबिलिटी बायस’ (इच्छात्मक पूर्वाग्रह)। शोधकर्ताओं का कहना है कि हम उन सूचनाओं या तथ्यों को सर्वप्रथम और तुरंत स्वीकार करते हैं, जो हमारे पूर्वाग्रहों के अनुसार होते हैं। सोशल मीडिया के आने से यह व्यक्तिगत पूर्वाग्रह संगठित होकर वायरल हो गए और इसका फायदा दुर्भावना से प्रेरित कंटेंट लेखकों और न्यूज फैक्टरियों ने उठाना शुरू कर दिया। आम लोग अपने-अपने पूर्वाग्रह की वजह से इस फर्जीवाड़े में शामिल होते चले गए और आज ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है कि ऊपर इंगित सातों प्रकार की झूठी सामग्री का धलड़ल्ले से और गर्व से उपभोग होने लगा है।

मजे की बात यह है कि हम सब जानते हैं कि फर्जी खबरों की फैक्टरियां हमें दूषित सामग्री उपलब्ध करा रही हैं, पर हम अपने पूर्वाग्रहों की हेकड़ी में ऐसे लिप्त हो चुके हैं कि सत्य का साथ करने का मतलब हमारे लिए अपने को झुठला देना हो गया है। हम अकड़ की वजह से आत्मनिरीक्षण से बचे रहना चाहते हैं और सच के ह्रास में सहभागिता करके उसका अनायास विस्तार करते चले जा रहे हैं। एक अध्ययन के अनुसार जब झूठे तथ्यों को लोगों के सामने सही तथ्यों से नाकारा गया, तब भी वह किंतु परंतु करते हुए फर्जी खबर को ही सच मानते रहे।

यह सच है कि झूठ की हमें लत लग गई है। हमारे प्राकृतिक पूर्वाग्रहों की वजह से यह ललक पैदा हुई थी और उसको स्वयं पूरा करते-करते हमारी मांग बढ़ती गई और झूठ के बड़े उत्पादक विधिवत तरीके से मांग को पूरा करने के लिए बाजार में सक्रिय हो गए। वे हमारी मोहताजी का किस तरह दिशा और दशा भ्रम उत्पन्न करने के लिए कर रहे हैं, हमें अभी नहीं मालूम है। पर इतना साफ है कि हमारी परंपरागत सोच और विवेक में जरूर बदलाव दिखाई देने लगे हैं। कई शोध-पत्रों के अनुसार हमारी सामूहिक अनुभूति में भी दीर्घकालिक परिवर्तन आने लगे हैं।

झूठ का बाजार शायद हमें हमेशा के लिए बदल रहा है और जिन्हें हम अमूल्य कहते थे, वे हमारे वास्तविक मूल्य होते जा रहे हैं। निर्धन को सताना बलिष्ठता का प्रतीक बन गया है, लोकतांत्रिक व्यवस्था पर तानाशाही की धुन सवार हो गई है, व्यक्ति पूजा मूर्ति पूजा का स्थान पा गई है, स्वयं हित जनहित समान हो गया है, हम और आप अब मैं और मेरा हो गए हैं और परस्पर निर्भरता, आत्मनिर्भरता में सिमट आई है। यह आज की दुनिया हो गई है। कल की कैसी होगी और हमारा परस्पर व्यवहार किन सत्यों पर टिका होगा, यह आने वाला कल ही बताएगा। हमारी आज की लचर सोच कल की सच्चाई से सामना करने के लायक नहीं है।

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