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तीरंदाज: पुरुषार्थी का पुरुषार्थ

मान्यवर मुस्कराए- दाढ़ी कर्म का नहीं, बल्कि मन का पुरुषार्थ है। मन चंगा तो कठौती में गंगा। अर्थात कुछ करो या न करो, कठौती में पानी जरूर बनाए रहो। दाढ़ी पुरुषार्थ की कठौती का पानी है।

मनुष्य को अच्छे कर्म करने के लिए पुरुषार्थ दिखाना होता है।

हमारे एक मित्र पुरुषार्थ करने के लिए इस कदर उत्साहित हुए हैं कि उन्होंने दाढ़ी बढ़ा ली है। वे कहते हैं- दाढ़ी पुरुषार्थ करने की मेरी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित ही नहीं करती है, बल्कि मेरे पुरुषार्थ का मानक भी है। देखिए, उन्होंने कहा, मेरी दाढ़ी जितनी बढ़ती जा रही है, मेरा पुरुषार्थ उतना ही भीषण होता जा रहा है। मैंने जिस दिन आम दिनचर्या के हट कर पुरुषार्थ करने का फैसला किया था उस दिन से मैंने उस्तरे को त्याग दिया था।

लाल कपड़े में बांध कर उसे बहते पानी में प्रवाहित कर आया था। वह आपको बांस और बांसुरी वाली बात याद है न? बस, हमने भी अपने से कहा- न रहेगा उस्तरा और न कटेगी दाढ़ी। उसको जलसमाधि दे दी थी। चुल्लू भर पानी में खड़े होकर पुरुषार्थ के लिए कटिबद्ध हो गए थे। वैसे दाढ़ी रखने का शौक मुझे बचपन से था। तबसे ही मेरे मन में था कि घर की व्यस्था को बदलना चाहिए।

पिताजी से लेकर चाचा, ताऊ तक सब सफाचट थे। चॉकलेटी हीरो बने फिरते थे। जिंदगी भर वे अपने बाल संवारते रहे और गालों पर क्रीम लगते रहे थे। दाढ़ी वाले बाबाओं की अपनी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को भूल कर वे महत्त्वाकांक्षा विहीन चिकनों में परिवर्तित हो गए थे। अब, ऐसे लोग क्या पुरुषार्थ कर सकते थे? सत्तर साल से मैं अपने दब्बू परिवार को देख रहा था। कभी भी उन्होंने पड़ोसियों की दाढ़ी का जवाब दाढ़ी से नहीं दिया था। उनमें पुरुषार्थ करने की योग्यता नहीं थी।

हम अपनी चिकनी ठुड्डी को हथेली पर ठिकाए हुए उनकी बात सुन रहे थे। मान्यवर कह तो ठीक रहे थे। लंबी दाढ़ी वाले बाबाओं के देश में हम कब और कैसे दाढ़ी विहीन हो गए, यह वास्तव में चिंता का विषय था। आज भी हमारे बाबा लोग रोज टीवी पर अवतरित हो दाढ़ी पर हाथ फेर कर हमको हिदायतें देते हैं।

हम उनकी बात पूरी श्रद्धा से आत्मसात भी करते हैं, पर ऐसा क्यों है कि सत्संग में बैठने से पहले हम अपनी दाढ़ी मूड़ना नहीं भूलते हैं? मान्यवर का कथन सही था- पुरुषार्थ केवल दाढ़ी वाले कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, अद्भुत व्यक्ति दाढ़ी की ओट में पनपते हैं, जबकि मुर्र्दा किस्म के लोग अपना पूरा चेहरा ‘एक्सपोज’ करते हैं। समझदार लोग बालों के जंगल में अपने को छुपाए रखते हैं। बिना मुंह उघाड़े पुरुषार्थ करते हैं।

पर जब आप उस्तरा फेरते थे, तो क्या पुरुषार्थ नहीं करते थे, हमने पूछा। करते थे, उन्होंने अपनी नई वैसलीन लगी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए कहा, कभी-कभी। अनजाने में हो जाता था। लोग ऐसा बताते हैं कि हमसे ऐसे कई किस्से हुए हैं। लेकिन, हमें उसका ज्ञान नहीं था।

अज्ञान का कोहरा कोरोना काल में यकायक छंट गया, जब हमारे पास करने के लिए कुछ बचा नहीं था। मजबूर होकर हाथ पर हाथ धरे बैठे थे। और आप जानते ही हैं कि हाथ पर हाथ रखना एक यौगिक मुद्रा है। जैसे ही हम मुद्रा में आए कि पुरुषार्थ की इंद्रिय जाग्रत हो गई और हमने दाढ़ी बढ़ानी शुरू कर दी।

शुरुआत में गाल खुजलाते थे। दाढ़ी के बाल नुकीले तिनकों की तरह चुभते थे, पर पुरुषार्थ करना घोर तपस्या के बराबर है। हमने की और उसका फल यह है कि आज हम अपनी तीन इंची घनघोर सफेद वैसलीन लगी दाढ़ी पर जब हाथ फेरते हैं तो हमें असीम सुख की अनुभूति होती है। उनका सुख सुन कर हमारा मन हुआ कि हम उनकी वैसलीन युक्त दाढ़ी को खींच कर देखें कि उस पर हाथ कितना फिसलता है, पर हम टाल गए। करोना काल की उत्पत्ति से उचित दूरी बनाए रखना ही ठीक था।

मान्यवर बोले, देखो भाई, बचपन से ही मुझे खेती करने का बहुत शौक था। पता नहीं कहां-कहां मैं हल, कुदाल, फावड़ा और खुरपी की खोज में भटकता रहा। कई दरवाजों पर जाकर मैंने मिन्नतें की, पर किसी ने किसानी करने के औजार नहीं दिए। उनकी जगह चम्मच, कलछी, छुरी-कांटा थमा दिया।

मैं किसान तो नहीं बन पाया, पर चम्मचों से जरूर जुड़ गया। अपनी चम्मच से मैंने बड़े-बड़े पतीले बजा डाले थे और न जाने कितनी घी से भरी कड़ाहियां खाली कर दी थी। पर भाई, मेरे लिए यह सब बेकार था। मैं फटी धोती वाला किसान बनना चाहता था, धरती मां के समक्ष अपना पुरुषार्थ प्रदर्शित करना चाहता था, पर वक्त के थपेड़ों ने मुझे सूट-पैंट पहना दिया था।

हम सन्नाटे में उनकी दिल की लगी सुन रहे थे। वैसे भी मान्यवर जब बोल रहे हों, तो मित्रों को चुप ही रहना चाहिए। उंगली हिलाते हुए वे बोले, इन कठनाई के दिनों में भी मैंने हार नहीं मानी। जब कोरोना आपदा आई और हम कुछ नहीं कर पाए, तो हमने अपनी किसानी करने की हसरत पूरी कर ली। इस धरती पुत्र ने अपने चेहरे को समर्पित कर दिया। उस पर दाढ़ी उगानी शुरू कर दी। और आज देखो, फसल आपके सामने लहलहा रही है। हमारी दाढ़ी हमारा पुरुषार्थ है।
मतलब?

बहुत सरल मतलब है भाई, मान्यवर मुस्कराए- दाढ़ी कर्म का नहीं, बल्कि मन का पुरुषार्थ है। मन चंगा तो कठौती में गंगा। अर्थात कुछ करो या न करो, कठौती में पानी जरूर बनाए रहो। दाढ़ी पुरुषार्थ की कठौती का पानी है। इमेज का पानी है। इमेज से पुरुषार्थ टपकना चाहिए। धीर, गंभीर और चिंतनमय दिखना मन का पुरुषार्थ है। कर्म करने का कष्ट कौन करे, जब मन की करने से प्रबल पुरुषार्थ की अनुभूति हो जाती है। इसलिए मेरे भाई, दाढ़ी बढ़ाओ, अपना खेत लगाओ। मंडी में इस फसल के अच्छे दाम मिल रहे हैं।

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