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तीरंदाज: अर्थ अनर्थ

हम चुप थे। वास्तव में, उन सज्जन पुरुष के तर्क हमारे हलक में जबरन घुस जुबान बाहर खींच लाए थे और उसमें गांठ मार दी थी। हमने मुंह चलाने की कोशिश की थी, पर गांठ आड़े आ रही थी।

china productsसीमा पर तनाव के बाद भारत में चीन को लेकर लगातार बढ़ रही नफरत।

मतलब से आपका मतलब क्या है? ‘भई, कोई खास मतलब नहीं है। हम सिर्फ यह जानना चाह रहे थे कि आप जो कह रहे हैं उसका अर्थ क्या है?’ ‘अर्थ? अरे, हम जो कह रहे हैं, सो कह रहे हैं! उसको ग्रहण करिए। ये अर्थ वर्थ के चक्कर में आप कहां पड़ रहे हैं?’
हमने अपना धीरज नहीं गंवाया। अर्थ तलाशने की कोशिश जारी रखी। सामने बैठे सज्जन से पुन: आग्रह किया- ह्यआप बुरा मत मानिए। आपने जो कहा वह हमारी समझ में नहीं आया। अगर आप समझा दें तो अच्छा रहेगा। याद है, स्कूल में कबीर, तुलसी की रचनाएं जब पढ़ाई जाती थीं तो मास्टर साहब कहते थे- कवि के कहने का अर्थ है…”

उन्होंने टांग से टांग उतारी और दोनों के बीच का फासला भरपूर खोल दिया। दाढ़ी खुजाते हुए तुनक के बोले, ह्यहम कबीर हैं? तुलसी हैं, जो हमारी बात को समझाया जाए? हम कह रहे हैं, आप सुनिए। वैसे स्वयं समझदार होने की आपकी कोई जिम्मेदारी है कि नहीं? कब तक सन साठ के स्कूल में बैठे रहेंगे मास्टर जी के इंतजार में? आपकी जवाबदेही भी है। आप उससे क्यों मुंह चुराते रहते हैं?ह्ण
उनके प्रहार से हम कुछ लड़खड़ा गए। संभलते हुए हमने निवेदन किया, ‘भैया, आपने कुछ बोला तो हमने पूछ लिया…’

‘हमसे आप खूब पूछते हैं! अर्नब से कभी पूछा है? उसकी तो हर बात आपको तुरंत समझ में आ जाती है! नौ बजे नहीं कि आप उससे जा के सट जाते हैं! हमने देखा नहीं है क्या आपको खूब सिर हिलाते, जब वो चालू होता है। उसकी बात आपको इतनी समझ में आती है कि आपका चेहरा चमकने लगता है। मुस्कराते हैं वो अलग से। कभी उससे पूछा, मतलब क्या है तुम्हारी बात का? जब उससे नहीं पूछ सकते आप तो हमसे क्यों अर्थात-निथार्थ कर रहे हैं आप?’
‘हम तो अर्नब देखते ही नहीं…’

‘पर थाली जरूर बजाते हैं, नौ बजे नौ मिनट के लिए अपनी बत्ती जरूर गुल करते हैं! मतलब पूछ के की थी? ये कोरोना-सरोना जो चल रहा है उसका क्या मतलब है? पता किया? और चीन? चलिए, चीन को जाने दीजिए। उसका मतलब समझने के लिए आपको संस्कृत पढ़नी पड़ेगी। वो कोई हिंदी-अवधी वाले तुलसी-कबीर नहीं हैं कि आप टटोल कर कुछ पा जाएंगे! संस्कृत में तो सिर्फ हमारे नेता सिद्धहस्त हैं, उन्होंने चीनी संस्कृत समझ ली है।’

‘मैं आपका मतलब नहीं समझा। चीनी संस्कृत?’
‘फिर वही मतलब! अरे भई, आप हमसे ही पूछते रहेंगे हमेशा? उनसे पूछा? ऊपर-ऊपर क्या हुआ था? क्या बात हुई थी? ऊपर वालों की भाषा का अर्थ अलग है- लाखों करोड़ों में है। अंग्रेजी में मिलियन-बिलियन में है। चीनी संस्कृत में हमें पता नहीं कितना है। और अगर आप पूछते भी तो मामला कितना पेचीदा हो जाता- उनको पहले चीनी संस्कृत को भारतीय संस्कृत में उतारना पड़ता, फिर उसकी ठेठ सरकारी हिंदी बनती, उसके बाद आपको बताने के लिए उसकी सरल हिंदी बनवाई जाती और रिंकुवा के पापा के लिए भोजपुरी करनी पड़ती। अब आप बताइए कि संस्कृत में एक छोटा-सा हलंत लगाने से मतलब बदल जाते हैं, पर आपके लिए शासन और सासन एक ही है। है न जटिल समस्या? तो क्या करिएगा जान कर? आपको मतलब भारत माता की जय नारा लगाने से था, सो जब कहा गया, आपने लगा दिया। नेताजी के संस्कृत ज्ञान को मान लिया था न? फायदा हुआ न?’

हम चुप थे। वास्तव में, उन सज्जन पुरुष के तर्क हमारे हलक में जबरन घुस जुबान बाहर खींच लाए थे और उसमें गांठ मार दी थी। हमने मुंह चलाने की कोशिश की थी, पर गांठ आड़े आ रही थी।
‘आप बोलने की तकलीफ मत करिए, हम आपकी बात समझ रहे हैं।’ उन्होंने लिहाज बरतते हुए कहा। ‘देखिए, हम सब समझदार हो गए हैं। आपको याद होगा राजा राम के समय एक धोबी को दो वाक्य बोलने पड़े थे और तब श्रीराम ने अपना राजधर्म निभाते हुए सीता मैया का त्याग कियाथा। उनके बाद गौरवशाली यदुवंश में भगवान श्रीकृष्णा ने जन्म लिया और जब द्र्रौपदी का चीरहरण हुआ तो मात्र कृष्ण स्मरण से उनकी लाज की रक्षा हुई थी।

आज, यानी इस कलियुग में, उसकी भी आवश्यकता नहीं है। भक्त का बोलना अप्रासंगिक हो गया है और सोच तुच्छ होकर लुप्त हो गई है। बिना सोचे सब कुछ हो रहा है। ऐसी विशिष्ट स्थिति में समझने के लिए कुछ है क्या?’
हम थकने लगे थे। जुबान की गांठ का बोझ शरीर को निचोड़े डाल रहा था।

उन्होंने सहानुभूति में हमारा कंधा सहलाया। उन्होंने कहा, ‘आप अगर महसूस करें तो आपको वास्तव में सुख का अनुभव होने लगेगा। हमारे जननायक हर दिन अठारह-अठारह घंटे अपलक सोच में डूबे रहते हैं। मालूम है क्यों? ताकि हम और आप साल-दर-साल अठारह घंटे हर रोज चैन से सो सकें। फिर वो हमारे मन का मंथन करके हमसे हमारी बात कर देते हैं, जिससे हमें जुबान हिलाने की जहमत न उठानी पड़े। अगर कुछ संशय उठते भी है तो उनको अर्नब और रवीश के बीच आउटसोर्स कर दिया गया है। वे आपस में निपट लेते हैं। और जहां तक हमारी रोजमर्रा की समस्याओं का सवाल है, जैसे नौकरियां, महंगाई, अर्थव्यवस्था, तो वो विज्ञापन के जरिए हल हो जाती हैं। इससे ज्यादा कर्मठ राजधर्म का निष्पादन और कौन कर सकता है?’

हमने उनकी व्याख्या सुन कर कंधे उचका दिए। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि और क्या प्रतिक्रिया दें।
सज्जन पुरुष मुस्कुराए। हमारी बंधी जुबान की लाचारी देख कर वे संतुष्ट थे। उन्होंने हमारी पीठ सहलाते हुए कहा, ‘अब शायद आप मतलब का मतलब समझ गए होंगे। अर्थ दो प्रकार के होते हैं। एक अर्थ चार पुरुषार्थों में से एक है- यानी धन अर्जन। इस अर्थ पर टिके रहेंगे तो आप माल कमाएंगे। आप ऐश करेंगे, अगर आप सवाल उठाने से परहेज करें तो। बस चुपचाप पुरुषार्थ करते रहिए। और जहां तक दूसरे अर्थ का सवाल है, तो जान लीजिए उसका अंत हो चुका है। आप व्यर्थ ही अर्थ तलाशने के चक्कर में अनर्थ फैला रहे हैं। वक्त रहते बाज आ जाइए। मतलब समझ गए न?’

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