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दूसरी नजर: टूटे वादे, कंगाल राज्य

केंद्र सरकार लाभांश के रूप में आरबीआइ से मुनाफा वसूलने की हकदार है और हाल में एक मौके पर ऐसा हुआ भी था कि केंद्रीय बैंक जितना लाभांश देना चाह रहा था, उससे कहीं ज्यादा सरकार ने उसकी बाहें मरोड़ते हुए लाभांश घोषित करवा लिया था। जबकि आरबीआइ के मुनाफे पर राज्यों का कोई हक नहीं है।

केंद्र और राज्य सरकारों के बीच कई वर्षों के विचार-विमर्श के बाद जीएसटी समझौता तैयार हुआ था।

करों के लिए जीएसटी एक बहुत कष्टदायी संघर्ष बन चुका है। महामारी से तबाह अर्थव्यवस्था में, जो पहले से तेजी से नीचे जा रही थी, केंद्र सरकार को बड़प्पन दिखाना चाहिए था, और ऐसा नहीं होने से उसके इरादों का पर्दाफाश हो गया।

राज्यों की मदद जरूरी
अगर मैं यह कहता हूं कि केंद्र सरकार को ही राज्य सरकारों की मदद करनी चाहिए थी, न कि राज्यों से उम्मीद करनी चाहिए, तो इसका कारण यह है कि दोनों की शक्तियां एकदम अलग हैं-
– केंद्र सरकार उधारी ले सकती है, क्योंकि यह उसके अधिकार में है, राज्य सरकारें उधारी सिर्फ तभी ले सकती हैं जब केंद्र सरकार से उन्हें इसके लिए पूर्व अनुमति मिल गई हो,
– संप्रभु होने के कारण केंद्र सरकार अपनी उधारी के लिए ब्याज दर को न्यूनतम करवा सकती है, जबकि राज्य सरकारों को कर्ज ऊंची दरों पर मिलता है और राज्यों के बीच भी कर्ज की दरों में भिन्नता होती है,

– केंद्र सरकार लाभांश के रूप में आरबीआइ से मुनाफा वसूलने की हकदार है और हाल में एक मौके पर ऐसा हुआ भी था कि केंद्रीय बैंक जितना लाभांश देना चाह रहा था, उससे कहीं ज्यादा सरकार ने उसकी बाहें मरोड़ते हुए लाभांश घोषित करवा लिया था। जबकि आरबीआइ के मुनाफे पर राज्यों का कोई हक नहीं है, और
– केंद्र अपने घाटे का मौद्रीकरण कर सकता है, यानी आरबीआइ से नोट छाप कर केंद्र सरकार को देने को कह सकता है, जबकि राज्यों के पास ऐसा कोई संप्रभु अधिकार नहीं है।

इसलिए वित्तीय संकट के दौर में राज्यों को मदद की जरूरत होती है। 2020-21 में हर राज्य सरकार की अपनी जीडीपी की तीन फीसद की उधारी सीमा पूरी होने की संभावना है। राज्यों ने और ज्यादा गुंजाइश की गुजारिश की और उन्हें महज आधा फीसद मिला, जिसे ज्यादातर राज्य सरकारें- संभवत सभी- इसका उपयोग कर लेंगी। इस सीमा के बाद शर्तों के साथ राज्यों पर उधारी का जो बोझ बढ़ेगा, उसकी भरपाई के लिए कोई भी राज्य सरकार तैयार नहीं है, खासतौर से इस वित्तीय वर्ष में।

भरोसे पर आधारित समझौता
केंद्र और राज्य सरकारों के बीच कई वर्षों के विचार-विमर्श के बाद जीएसटी समझौता तैयार हुआ था। यह समझौता भरोसे पर आधारित था। यह एक कानूनी पत्र है और कानून में भावना है। राज्यों को एक परिषद के अधीन कर दिया गया (केंद्र सरकार को इससे छूट मिली हुई है) जिसे वस्तुओं पर वैट (मूल्य वर्धित कर) और प्रवेश कर जैसे कई अन्य कर लगाने का अधिकार है, यानी कामेधनु, जिससे राज्यों की तिजोरी भरती। बदले में केंद्र सरकार ने उनसे वादा किया था कि जीएसटी राजस्व तेजी से बढ़ेगा, क्योंकि बिक्री कर की जगह वैट लगा दिया गया था, और यदि पहले पांच साल में राजस्व वृद्धि में सालाना चौदह फीसद की गिरावट आती है तो इस कमी की पूरी भरपाई केंद्र सरकार करेगी।

राज्यों को भरपाई की यह बाध्यता कानून में लिखी हुई है। मुआवजे के लिए राजस्व जुटाने का जरिया जीएसटी मुआवजा कोष है। वित्त मंत्री और उनके अधिकारियों ने इस बिंदु को बड़े आराम से नजरअंदाज कर दिया कि यह उपाय बाध्यता की मदद के लिए था, न कि मजबूरी का उपाय था।

कोष में वृद्धि या कमी किसी भी साल में या पांच साल पूरे होने पर हो सकती है। अगर पांचवें साल के आखिर में इस कोष में अतिरिक्त पैसा होगा तो इसका पचास फीसद केंद्र सरकार को हस्तांतरित कर दिया जाएगा। और अगर इसमें कमी होगी तो क्या किया जाए? जीएसटी परिषद में इस पर लंबी चर्चा चली, खासतौर से सातवीं, आठवीं और दसवीं बैठक में। 18 फरवरी, 2017 को दसवीं बैठक खत्म हुई और बैठक की कार्यवाही के अनुच्छेद 6.3 में यह कहा गया था-

6.3- तेलंगाना के माननीय मंत्री ने कहा कि मुआवजा कानून में यह व्यवस्था होनी चाहिए कि यदि मुआवजा कोष में पैसा कम पड़ता है, तो इसकी उगाही अन्य स्रोतों से की जानी चाहिए। सचिव ने स्पष्ट किया कि मुआवजा कानून के मसविदे की धारा 8(1) में यह व्यवस्था की गई है कि पांच साल की अवधि या परिषद की ओर से की गई अनुशंसा पर निर्धारित अवधि के लिए उपकर का संग्रह किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह इस बात को निर्दिष्ट करता है कि मुआवजे के लिए केंद्र सरकार दूसरे जरियों से राजस्व जुटा सकती है और तब यह पांच साल से आगे तक लगातार जारी रखते हुए राजस्व संग्रह किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि मुआवजे के भुगतान के लिए बाजार से उधारी की संभावना सहित अन्य फैसले परिषद की आठवीं बैठक (जो 3 और 4 जनवरी, 2017 को हुई थी) का हिस्सा थे और इन्हें कानून में शामिल करने की जरूरत नहीं है। परिषद इस सुझाव पर सहमत हो गई थी।

स्पष्ट फैसला
इसमें कोई संदेह नहीं कि फैसला क्या था। मुआवजे के भुगतान के लिए बाजार से उधारी की संभावना सहित केंद्र सरकार मुआवजे के लिए दूसरे उपायों से संसाधन जुटा सकती है। किसी भी तरह की लफ्फाजी या कुतर्कों से तथ्य को नहीं बदला जा सकता।

केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को उधार लेने के ‘दो विकल्प’ एक तरह का धोखा है। मौजूदा वित्त वर्ष के लिए हर राज्य के राजस्व बजट में एक छेद है। उधारी इस छेद को भर देगी, लेकिन यह राज्य के पूंजी खाते में कर्ज के रूप में दर्ज होगा, और राज्य को इसका ब्याज भी भरना होगा और कर्ज भी लौटाना होगा। अगर राज्य उधार नहीं लेते हैं और केंद्र मुआवजे से इस छेद की भरपाई नहीं करेगा, तो छेद बना ही रहेगा और हार कर राज्य चालू साल में अपने पूंजीगत खर्च में या कल्याण योजनाओं के खर्च में कटौती करेंगे, जो कि दोनों ही वांछनीय नहीं हैं। ‘दोनों विकल्पों’ को खारिज करने और केंद्र से भरपाई के लिए पैसा मांग कर राज्यों ने सही किया है। क्या केंद्र इस जिम्मेदारी को उठाएगा या फिर राज्यों को उनकी हालत पर छोड़ देगा?

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