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वक्त की नब्ज- बेकाबू होता कश्मीर

अयूब पंडित की हत्या साबित करती है कि अभी तक जो मोदी सरकार की कश्मीर में रणनीति रही है वह विफल हो गई है।

अपने एक साथी को अंतिम विदाई देते जम्मू-कश्मीर के पुलिस कर्मी।

रमजान के महीने का आखिरी शुक्रवार था। श्रीनगर के जामा मस्जिद में खास इबादत का वक्त था, सो मुमकिन है कि मोहमद अयूब पंडित भी इस इबादत में शामिल होने के लिए ही मस्जिद के अंदर गए थे, बिना सोचे कि मस्जिद में उनको किसी किस्म का खतरा हो सकता था। कौन जानता है क्या था उनके मन में। अब हम इतना ही जानते हैं कि मस्जिद के अंदर कुछ ऐसे लोग थे जिनको उनकी शक्ल देखते ही उन पर शक होने लगा, परिचय देने को कहा, जब दे नहीं पाए तो बाहर घसीट कर उनको ले गए ये लोग और लाठियों से मारने लगे। अपनी हिफाजत करने की कोशिश करते हुए जब अयूब ने अपनी पिस्टल निकाली तो उनके हत्यारों का आक्रोश इतना बढ़ गया कि उनको नंगा करके उनको जान से मार डाला।

सुरक्षाकर्मी पहले भी मारे गए हैं कश्मीर घाटी में, लेकिन इस तरह नहीं। इससे साबित होता है कि सरकार के हाथ से कश्मीर घाटी के कुछ जिले तकरीबन निकल चुके हैं । वहां शासन उनके हाथों में है अब, जो अपने आपको मुजाहिद समझते हैं और बिना किसी संकोच के कहते हैं कि उनका मकसद है कश्मीर में शरीयत लाना। बुरहान वानी और उनके साथी कई बार कह चुके हैं वीडियो पर कि वे कश्मीरी, जो पुलिस या भारतीय सेना में भर्ती होते हैं उनको दुश्मन माना जाएगा और उनकी हत्या जायज मानी जाएगी। सो 2016 में 87 सुरक्षाकर्मियों ने कश्मीर घाटी में अपनी जानें गंवार्इं, मुठभेड़ों में या जिहादी आतंकवादियों की गोलियों से।

अयूब पंडित की हत्या साबित करती है कि अभी तक जो मोदी सरकार की कश्मीर में रणनीति रही है वह विफल हो गई है। जब नरेंद्र मोदी ने मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ हाथ मिला कर श्रीनगर में एक ऐसी सरकार बनाई थी, जिसमें भारतीय जनता पार्टी पहली बार हिस्सा ले रही थी तो इन दोनों राजनेताओं ने बहादुरी दिखाई थी और इस बहादुरी की जितनी तारीफ की जाए कम होगी। यह साझी सरकार सफल अगर होती तो संभव है कश्मीर में अमन-शांति के आसार अब तक दिखने लग गए होते। मुफ्ती साहब पिछले वर्ष जनवरी के महीने में गुजर न गए होते तो हो सकता है कि कश्मीर घाटी की शक्ल आज कुछ और होती। उनके देहांत के बाद सारी रणनीति बिखरने लग गई। पहले तो उनकी बेटी, और वारिस, कई महीनों तक फैसला नहीं कर पार्इं कि वह अपने पिता की जगह लेना चाहती हैं या नहीं। जब आखिर में गद्दी पर बैठीं महबूबा मुफ्ती तो कुछ महीने काम ठीक चला लेकिन बुरहान वानी की हत्या के बाद स्थिति बिगड़ती ही गई।

मुख्यमंत्री न शासन संभाल पा रही हैं, न जिहादी आतंकवाद को रोक पाई हैं और न ही लोगों के दिलों में जगह बना पाई हैं। सो विनम्रता से अर्ज करती हूं कि कश्मीर को वापस शांति के पथ पर लाने के लिए नई रणनीति बहुत जरूरी हो गई है जिसका पहला कदम होना चाहिए महबूबा सरकार को बर्खास्त करना। ऐसा नहीं होता है तो जुलाई आठ तक तक हालात और भी बिगड़ सकते हैं क्योंकि उस दिन बुरहान वानी की याद में उनके साथी अशांति फैलाने के लिए कुछ नई साजिशें रच रहे होंगे अभी से।
नई रणनीति का दूसरा कदम होना चाहिए घाटी के उन पांच जिलों को अलग नजरों से देखना, जहां जिहादी आतंकवादियों का अब हर तरह से कब्जा है। यहां पर जिहादियों और उनके समथर्कों के साथ जितनी सख्ती हो, कम होगी, मानवाधिकार वाले चाहे कुछ भी कहें। इन जिलों को अगर सेना के हवाले करना हो तो इसके बारे में भी सोचना चाहिए क्योंकि इन जिलों में वे लोग शासन चला रहे हैं जिनका मकसद है कश्मीर घाटी का पूरी तरह से इस्लामीकरण। खुल कर वानी और उनके साथी कह चुके हैं कि उनकी लड़ाई इस्लाम के लिए है, कश्मीर में शरीयत कायम करने के लिए है। सो यह लोग भारत के दुश्मन हैं और इनके साथ वैसा ही बर्ताव होना चाहिए जो देश के दुश्मनों के साथ होता है।

कश्मीर घाटी के बाकी जिलों में और जम्मू और लद्दाख में जरूरत है विकास की गाड़ी को हवाई जहाज की रफ्तार पर चलाने की। यहां हर तरह से निवेशकों और पर्यटकों को आकर्षित करने का काम होना चाहिए। दिल्ली में नीति बनानेवाले अक्सर भूल जाते हैं कि जम्मू और लद्दाख भी हैं इस राज्य में, जिनका इस अशांति के कारण बुरा हाल हो गया है पिछले दो दशकों में। इन क्षेत्रों में केंद्र सरकार की पूरी मदद होनी चाहिए विकास के कार्यों में तेजी लाने के लिए। जब भी कश्मीर घाटी में कोई नई घटना होती है केंद्र सरकार का ध्यान कुछ दिनों के लिए उधर आकर्षित हो जाता है और फिर थोड़ी सी शांति आ जाती है और कश्मीर की समस्या को भूल जाते हैं। दूसरी गलती जो हमारे राजनेता बार-बार करते आए हैं तो वह यह कि जब भी कुछ होता है दोष पाकिस्तान पर लगा देते हैं बिना किसी सबूत के। फिर घूमते हैं विदेशों में इस मांग को लेकर कि पाकिस्तान को एक आतंकवादी देश घोषित कर दिया जाए। अगर ऐसा हो भी जाता है तो क्या हासिल होगा? क्या पाकिस्तान सुधर जाएगा ऐसी घोषणा के बाद? सबसे बड़ा सवाल यह है कि ऐसा होने से क्या कश्मीर में अमन-शांति आ जाएगी? बिल्कुल नहीं। कश्मीर समस्या का समाधान तब ढूंढ़ पाएंगे हम जब स्वीकार करेंगे कि इस समस्या के दो पहलू हैं। एक अंतरराष्ट्रीय, जिसमें पाकिस्तान के बिना हल ढूंढ़ना मुश्किल है। लेकिन एक पहलू अंदरूनी है, जिसका हल हमको देश के अंदर ढूंढ़ना होगा।

 

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