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वक्त की नब्ज- बीते दिन, नई बातें

साल का आखिरी दिन है आज, सो हिसाब करने का वक्त है। हिसाब करना अगर हमारे लिए जरूरी है, तो प्रधानमंत्री के लिए और भी ज्यादा।
Author December 31, 2017 05:30 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

साल का आखिरी दिन है आज, सो हिसाब करने का वक्त है। हिसाब करना अगर हमारे लिए जरूरी है, तो प्रधानमंत्री के लिए और भी ज्यादा। नरेंद्र मोदी अगला आम चुनाव फिर से परिवर्तन और विकास के नारे पर जीतना चाहते हैं, तो बहुत जरूरी है कि वे अपने मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के साथ बैठ कर हिसाब करने में लग जाएं। चुनावी हलचल और हार-जीत में उलझ कर भूल जाते हैं हमारे राजनेता कि उनका असली काम है इस देश के आम नागरिकों को बेहतरीन आम सेवाएं उपलब्ध कराना और इस देश की सीमाओं को सुरक्षित रखना।
जहां तक बात है सीमाओं की सुरक्षा की, तो मोदी सरकार ने 2017 में दिखाया कि न पाकिस्तान से डरते हैं न चीन से। पाकिस्तान ने जब हमारे चार जवान बेरहमी से मारे और उनकी लाशों की बेअदबी की, तो एक बार फिर भारतीय सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक करके बदला लिया पिछले हफ्ते। और जब चीन के सैनिक भूटान के डोकलाम क्षेत्र में घुस कर सड़कें बनाने लगे, तो हमने डट कर जवाब दिया उन्हें। सो, जहांतक देश की सुरक्षा की बात है, मोदी खरे उतरे हैं। विदेश नीति में भी उन्होंने हिम्मत करके ऐसे परिवर्तन लाने की कोशिश की 2017 में, जिससे साबित हुआ कि हमारी विदेश नीति का आधार होगा भारत का हित। कांग्रेस प्रधानमंत्रियों ने कई बार विचारधारा को बनाया था विदेश नीति का आधार।

रही बात देश की अंदरूनी सुरक्षा की, तो यहां कहना लाजमी है कि मोदी के दौर में जो मुसलमानों पर हमले किए हैं गोरक्षकों और हिंदुत्ववादियों ने, वे किसी भी तरह देश के हित में नहीं हैं। ऐसे हमले 2017 में बढ़ गए थे और ज्यादातर उन राज्यों में हुए, जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं, सो उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री अपने साथियों को रोकेंगे, अपनी मन की बात में कुछ कहेंगे। लेकिन सिर्फ दो बार बोले हैं प्रधानमंत्री गोरक्षकों के खिलाफ और दोनों बार तब जब दलितों पर हमले हुए थे। मुसलमानों पर जब भी हमले हुए हैं, उन्होंने कुछ नहीं कहा। तब भी नहीं, जब 2017 के आखिरी दिनों में इफराजुल नाम के एक गरीब मुसलिम मजदूर को राजस्थान में जिंदा जला दिया गया और उसकी दर्दनाक मौत का विडिओ इंटरनेट पर अपलोड किया हत्यारे ने, यह कह कर कि वह ऐसा कर रहा है लव जिहाद को रोकने के लिए। ऐसी हत्याओं का नतीजा है कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक मुसलमानों में खौफ और गुस्सा दिखने लगा है, जो किसी हाल में देश के हित में नहीं है।

राहुल गांधी ने कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष बनने के बाद अपने पहले भाषण में कहा कि भारत एक ऐसा देश बन गया है, जहां आपकी हत्या इस आधार पर की जा सकती है कि आप क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं और किस भगवान को पूजते हैं। सांप्रदायिक हिंसा कांग्रेस के जमाने में भी होती थी, लेकिन दंगा-फसाद के रूप में। सो, दंगा खत्म होते ही दोनों कौमें शांत हो जाती थीं। पिछले साल जिस किस्म की हत्याएं गोरक्षकों और हिंदुत्ववादियों ने की हैं मुसलमानों पर वे ऐसी थीं, जो देश के वातावरण में शोलों की तरह सुलगती रही हैं। सो, एक तरफ मुसलिम बुद्धिजीवी पूछने लगे हैं कि क्या मुसलमानों को भारत में रहने का अधिकार है या नहीं और दूसरी तरफ हैं असदुद्दीन ओवैसी जैसे मुसलिम राजनेता, जो कौम को भड़का रहे हैं जहरीले भाषण देकर।ऐसा नहीं कि 2017 में सिर्फ बुरी चीजें हुर्इं। कुछ अच्छी खबरें भी आर्इं। स्वच्छ भारत अभियान इतना कामयाब रहा कि देहातों में खुले में शौच करने वालों की संख्या आधी से भी कम हो गई है। कई राज्यों में पूरे के पूरे जिले अब ऐसे हैं, जहां खुले में शौच करने वाला एक भी व्यक्ति नहीं दिखता है। यह बहुत बड़ी उपलब्धि है और गंगाजी की सफाई अब प्रधानमंत्री को उन्हीं अधिकारियों को सौंपनी चाहिए, जिन्होंने स्वच्छ भारत अभियान को इतना सफल बनाया है। साथ में भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में स्कूलों और अस्पतालों पर खास ध्यान देना चाहिए प्रधानमंत्री को, क्योंकि अगर इन चीजों में मतदाता परिवर्तन देखने लगेंगे, तो तकरीबन तय है कि मोदी 2019 में फिर से जीतेंगे।

इससे भी जरूरी है कि अर्थव्यवस्था में ऐसी ऊर्जा पैदा करें मोदी कि बेरोजगारी का समाधान मिल सके। हाल में हुए गुजरात के चुनावों में जब भी नौजवान मतदाताओं से पूछा गया कि उनकी सबसे बड़ी समस्या क्या है, तो ऐसे शायद ही कोई रहा होगा, जिसने बेरोजगारी न कहा हो। मोदी ने नोटबंदी की काले धन की खोज में और जीएसटी लाए इस उम्मीद से कि देश भर में एक ही टैक्स हो, लेकिन इन कदमों के बावजूद या शायद इनकी वजह से, वह ऊर्जा नहीं पैदा हुई है अभी तक अर्थव्यवस्था में, जिससे रोजगार के नए अवसर पैदा होने लगें।
आने वाले साल में उम्मीद यह भी है कि मोदी अपने मुख्यमंत्रियों को संदेश भेजें कि उनके शासन के तरीकों में संवेदनशीलता बढ़े। अभी तक ये लोग बिल्कुल उसी तरह शासन चला रहे हैं जैसे कांग्रेस के मुख्यमंत्री चालाया करते थे। सो, झारखंड में जब नन्ही संतोषी की मौत भूख से हुई, सरकारी अधिकारियों ने इस बात को दबाने की कोशिश की बिल्कुल वैसे जैसे कांग्रेस की सरकारें करती आई हैं पिछले सत्तर वर्षों में। इनकी संवेदनहीनता का मुख्य कारण था कि पिछले लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस को सिर्फ चौवालीस सीटें मिलीं। निजी तौर पर मोदी अब भी बहुत लोकप्रिय हैं हाल में हुए सर्वेक्षणों के मुताबिक, लेकिन अगली बार पूरे बहुमत से तभी जीत पाएंगे जब उनके मुख्यमंत्री भी लोकप्रिय रहते हैं। खैर, इसकी बातें अगले साल के अंतिम दिनों में होंगी। अभी के लिए नव वर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाएं।

 

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