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वक्त की नब्ज: घाटी का दर्द

पुलवामा के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट किया है कई बार कि पाकिस्तान से बातचीत का सिलसिला दोबारा तभी संभव होगा, जब पाकिस्तान सरकार अपने जिहादी गुटों पर लगाम लगाने का ईमानदारी से प्रयास करती दिखेगी। सवाल है कि क्या हम कश्मीर में शांति ला सकते हैं पाकिस्तान से बातचीत किए बगैर?

कश्मीर घाटी से इन दिनों जब भी कोई खबर आती है, अक्सर बुरी खबर होती है। (Express Photo by Shuaib Masoodi)

कश्मीर घाटी से इन दिनों जब भी कोई खबर आती है, अक्सर बुरी खबर होती है। पिछले हफ्ते ईद के दिन सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें नकाबपोश जिहादी आईएसआईएस के काले झंडे हाथों में लिए ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाते दिखे श्रीनगर की बड़ी मस्जिद के सामने। हर दूसरे दिन खबर मिलती है किसी मुठभेड़ की, जिसमें मारे जाते हैं भारत के दिलेर जवान एक ऐसे युद्ध में, जिसमें न युद्धभूमि है न असली दुश्मन। यह ऐसा युद्ध है, जिसमें न हार होती है किसी की, न जीत। हर ऐसी खबर के बाद ऐसा लगता है कि कश्मीर घाटी में चारों तरफ हिंसा की आग जल रही है और वहां जाने में खतरा है।

सो, पिछले हफ्ते जब मैं श्रीनगर गई, तो मुझे ऐसा लगा जैसे वही माहौल दिखेगा इस शहर में जो नब्बे के दशक में था, जब आतंकवाद की शुरुआत हुई थी कश्मीर को ‘आजादी’ दिलाने के नाम पर। वे दिन इतने बुरे थे कि कभी भी किसी वक्त श्रीनगर में हिंसा भड़क सकती थी। ये वही दिन थे जब कश्मीरी पंडितों को रातोंरात कश्मीर छोड़ कर भागना पड़ा था। ये वही दिन थे जब इस्लाम के नाम पर सिनेमाघर और शराब की दुकानें जबर्दस्ती बंद करवाते थे ‘आजादी’ के सिपाही। इन हादसों को मैंने अपनी आंखों से देखा था, क्योंकि श्रीनगर तकरीबन हर दूसरे हफ्ते जाया करती थी। कश्मीर पर किताब लिख रही थी और वहां जाए बिना काम नहीं बनता था, इसलिए कि उन दिनों टीवी के नाम पर सिर्फ दूरदर्शन था, जो हर हिंसक घटना को छिपाने की कोशिश करता था।
इस बार गई तो सोचा था कि वही माहौल मिलेगा श्रीनगर में। सो, हैरान हुई जब श्रीनगर में शांति का माहौल दिखा और लोगों में हिंसा को लेकर एक गहरी थकान। पुलवामा वाले हमले के बाद मुसाफिर इतने थोड़े गए हैं कश्मीर कि श्रीनगर के होटल और हाउसबोट तकरीबन खाली पड़े हैं इस मौसम में, जब पर्यटन पर निर्भर कश्मीरी अपनी आधी से ज्यादा सालाना कमाई करते हैं। दुख उनको लेकिन सिर्फ अपनी आर्थिक कठिनाइयों से नहीं है। दुख इस बात का भी है कि ऐसा लगने लगा है कि शांति कभी वापस लौट कर ही नहीं आएगी।

एक कारोबारी ने अपनी मायूसी इन शब्दों में व्यक्त की, ‘बहुत सालों बाद 2016 में मैंने अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए सोनमर्ग में कुछ जमीन खरीदी यह सोच कर कि वहां होटल या गेस्टहाउस बनाऊंगा। उस वक्त अमन-शांति का माहौल इतना बना हुआ था और सैलानी इतने आ रहे थे कि ऐसा लगा कि कश्मीर के अच्छे दिन दोबारा लौट कर आ गए हैं। फिर वह मुठभेड़ हुई, जिसमें बुरहान वानी को मार दिया गया और शांति ऐसी गायब हुई कि महीनों तक श्रीनगर की सड़कों पर पत्थरबाजी होती रही। अब जब फिर से आने लगे थे सैलानी, तो पुलवामा की घटना हो गई और आप देख रही हैं कि यह होटल तकरीबन खाली है और यही हाल है हर होटल का।’ कश्मीर की मायूसी देख कर मुझे दुख तो हुआ, लेकिन इस बात का ध्यान भी आया कि इस मायूसी का फायदा उठा कर प्रधानमंत्री मोदी नए सिरे से कोशिश शुरू कर सकते हैं कश्मीर घाटी में शांति बहाल करने की। ऐसा नहीं कि अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने कोशिश नहीं की थी, लेकिन उस समय नाकाम रहीं उनकी कोशिशें, क्योंकि राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती थीं, जिनको न राजनीतिक अक्ल थी और न प्रशासनिक समझ। सो, बुरहान वानी की हत्या के बाद जब पत्थरबाजों की भीड़ें श्रीनगर की सड़कों पर रोज निकलने लगीं अपना रोष जाहिर करने, महबूबा कुछ नहीं कर पार्इं और स्थिति बिगड़ती गई है पिछले तीन वर्षों में। सो, आज अगर राज्य का शासन एक ऐसे राज्यपाल के हाथों में है, जिनको राजनीतिक समझ है, बहुत अच्छा मौका है एक बार फिर शांति लाने की कोशिश करने का।

ऐसा अगर करना चाहते हैं प्रधानमंत्री, तो शायद अटल बिहारी वाजपेयी की कश्मीर नीति से प्रेरणा ले सकते हैं। अटलजी ने जो ‘कश्मीरियत, इंसानियत, जम्हूरियत’ को आधार बना कर अपनी नीति बनाई थी, वह आज भी कश्मीरी याद करते हैं और जितना सम्मान अटलजी के लिए मैंने देखा इस बार, शायद ही किसी दूसरे प्रधानमंत्री के लिए कभी देखा होगा। कश्मीर को हम अपनी अंदरूनी समस्या मानते हैं, लेकिन यह भी सच है कि पाकिस्तान से बात किए बिना इस समस्या का समाधान नामुमकिन है। पुलवामा के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट किया है कई बार कि पाकिस्तान से बातचीत का सिलसिला दुबारा तभी संभव होगा, जब पाकिस्तान सरकार अपने जिहादी गुटों पर लगाम लगाने का ईमानदारी से प्रयास करती दिखेगी। सवाल है कि क्या हम कश्मीर में शांति ला सकते हैं पाकिस्तान से बातचीत किए बगैर?

कश्मीर घाटी में बहुत सालों बाद माहौल बना है अमन-शांति की वापसी का। बहुत सालों बाद श्रीनगर में मुझे एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला इस बार, जिसने जिहादियों का समर्थन किया। मोदी पहली बार जब प्रधानमंत्री बने थे तो नए सिरे से कश्मीर से रिश्ता जोड़ सकते थे, लेकिन उस बार चूक गए, क्योंकि जिस बाढ़ राहत का वादा कर गए थे कश्मीर में पहुंच कर वह ‘पैकिज’ कभी आया नहीं। श्रीनगर में शायद ही कोई घर था जिसको बाढ़ से गंभीर नुकसान न हुआ हो और जिसको सरकारी राहत की सख्त जरूरत न हुई हो, लेकिन वह राहत कभी पहुंची नहीं और मोदी ने घाटी का दिल जीतने का एक बहुत अच्छा मौका गंवा दिया। आज फिर से मौका है नए सिरे से कश्मीर में शांति लाने की कोशिश करने का। उम्मीद है कि इस बार इस मौके को मोदी हाथ से नहीं निकलने देंगे।

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