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वक्त की नब्ज- खौफ का साया

दो दिन पहले हाफिज सईद को लाहौर की एक अदालत ने रिहा किया इस आधार पर कि उसके खिलाफ ठोस सबूत पेश नहीं हुए हैं कि 26/11 वाले हमले में निजी तौर पर उसकी अहम भूमिका थी।
Author November 26, 2017 05:27 am
26/11 मुंबई हमले में 166 लोग मारे गए थे।

फिर लौट कर आई है आज वह मनहूस बरसी और फिर वही सवाल हम पूछने पर मजबूर हैं, जो हम पूछते आए हैं 26 नवंबर, 2008 के बाद, जब भी यह बरसी लौट कर आई है। एक दशक गुजर जाने के बाद भी सवाल बहुत सारे हैं और जवाब बहुत थोड़े। पाकिस्तान के सैनिक शासक जानते हैं कि हम लाचार हैं, सो इस बरसी के दो दिन पहले हाफिज सईद को लाहौर की एक अदालत ने रिहा किया इस आधार पर कि उसके खिलाफ ठोस सबूत पेश नहीं हुए हैं कि 26/11 वाले हमले में निजी तौर पर उसकी अहम भूमिका थी।

हाफिज सईद को अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कर दिया है और उसके सिर पर चौंसठ करोड़ रुपए का इनाम रखा है, लेकिन इसकी कोई परवाह नहीं है पाकिस्तान के शासकों को, इसलिए कि वे जानते हैं कि अमेरिका उतना ही लाचार है, जितना भारत। दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश की लाचारी का कारण वही है, जो भारत की लाचारी का कारण है। अमेरिका बहुत पहले जान गया था कि पाकिस्तान के जरनैल जिहादी आतंकवादियों को पालते हैं, प्रशिक्षित करते हैं, लेकिन अमेरिका यह भी जानता है कि इस परमाणु देश के साथ अगर बातचीत का सिलसिला टूट जाता है, तो संभव है कि इसकी बागडोर मौलवियों और जिहादी किस्म के जरनैलों के हाथों में फिसल जाएगी, जिनको परमाणु युद्ध शुरू करने में कोई संकोच नहीं होगा। पिछले नौ वर्षों में न पाकिस्तान का चरित्र बदला है और न ही भारत के साथ उसके जरनैलों की नफरत कम हुई है। हाल में पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने एक पाकिस्तानी पत्रकार को इंटरव्यू दिया था दुबई से, जिसमें उन्होंने खुल कर स्वीकार किया कि हाफिज साईद और उसामा बिन लादेन जैसे लोग उनकी नजरों में आतंकवादी नहीं ‘हीरो’ हुआ करते थे। मुशर्रफ ने यह भी माना है बहुत बार कि पाकिस्तान को हमेशा भारत से खतरा रहेगा, सो भारत हमेशा के लिए दुश्मन रहेगा। यानी पाकिस्तान से अगर आज भी भारत के शासकों को कोई उम्मीद है, तो यह उम्मीद बेकार है। हम अपने तौर पर सिर्फ इतना कर सकते हैं कि भारत की सीमाएं और भारत की सुरक्षा को इतना मजबूत कर डालें कि पाकिस्तान के जिहादी इन सीमाओं को पार न कर सकें। ऐसा करना आसान नहीं है, लेकिन हमको तकलीफ इस बात से होनी चाहिए कि 26/11 वाले हादसे के बाद हमारे शासकों ने तकरीबन कुछ नहीं किया है।

सोनिया-मनमोहन सरकार इतनी कमजोर थी कि जब भी पाकिस्तान से पेश आई 26/11 वाली घटना के बाद, जब हमारे प्रधानमंत्री पहली बार मिले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से शर्म अल-शेख के एक सम्मेलन में, तो उन्होंने स्वीकार किया कि बलूचिस्तन में आतंकवाद भारत फैला रहा है। मुंबई पर हमले के बाद गृहमंत्री हमको नया मिला जरूर था, जिसने बातें बहुत बड़ी-बड़ी कीं, लेकिन जमीनी तौर पर हम मुंबईवासी जानते हैं कि दोबारा अगर इस महानगर पर उस किस्म का हमला होता है, तो वही हाल होने वाला है, जो 2008 में हुआ था। मैं मुंबई में रहती हूं ओबेरॉय होटल के बिलकुल बगल में, सो किसी न किसी वजह से इस होटल में काफी आना-जाना रहता है। जब भी जाती हूं तो याद करती हूं उन पैंतीस बेगुनाह लोगों को, जिनको फहदुल्लाह नाम के राक्षस ने अठारहवीं मंजिल पर दीवार के संग टिका कर मार डाला था। इसका पूरा वर्णन एक तुर्की दंपति ने टीवी पर जब किया, तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि फहदुल्लाह ने जब उनको फातेहा पढ़ते देखा तो उनकी जान बक्श दी थी, यह कह कर कि आप मेरे मुसलिम भाई हैं, सो आपको नहीं मारूंगा। ओबेरॉय होटल में जब भी जाती हूं, मुझे यह भी याद आता है कि सुरक्षा का हाल उतना ही कमजोर है, जो 2008 में था। हथियारबंद आतंकवादी अगर दोबारा होटल में दाखिल होना चाहें, तो आसानी से हो सकते हैं। जिस रेलवे स्टेशन पर अजमल कसाब ने इतने लोग मारे थे, वहां भी सुरक्षा का इंतजाम उतना ही ढीला है। यानी हम उस हमले के बाद कुछ नहीं सीखे हैं, ऐसा लगता है।

मुंबई में जो हुआ, वह उस जिहादी हिंसा की एक कड़ी है, जिसके तहत पेरिस, लंदन, न्यूयॉर्क, मैड्रिड और अन्य पश्चिमी महानगरों में पिछले कुछ वर्षों में हमने बार-बार उदाहरण देखे हैं। भारत के अंदर जिहादी संस्थाएं बन चुकी हैं और कुछ मुट्ठी भर भारतीय मुसलमान आइएसआइएस में भी शामिल हुए हैं। जाहिर है कि उस देश में जहां दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मुसलिम आबादी रहती है, ऐसा होना ही था। हमारी समस्या यह है कि अभी तक भारत सरकार के किसी भी गृहमंत्री ने दिखाया नहीं है कि इन जिहादी संस्थाओं और इस जिहादी विचारधारा का मुकाबला कैसे हो सकता है। ऐसा नहीं है कि हर जिहादी हमले को रोका जा सकता है, लेकिन हमने उतना भी नहीं किया है, जितना यूरोप और अमेरिका ने किया है।हमारी समस्या यह भी है कि जितना खतरा भारत को है पाकिस्तान के परमाणु हथियारों से, वह किसी दूसरे देश को नहीं है। नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने थे, तो बहुत उम्मीद थी कि उनकी पाकिस्तान नीति में शक्ति भी होगी, चतुराई भी और बातचीत के लिए कुछ स्पष्ट शर्तें भी। मगर ऐसा अभी तक देखने को नहीं मिला है। मोदी की पाकिस्तान नीति वही रही है, जो कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों की हुआ करती थी। सो, कभी नवाज शरीफ से बात करने निकल जाते हैं लाहौर, तो कभी कड़े शब्दों में धमकी देते हैं कि बातचीत तब तक नहीं होगी, जब तक पाकिस्तान जिहादी आतंकवादी संस्थाओं का सर्वनाश नहीं करता है। बहुत अफसोस के साथ और काफी खौफ के साथ हमको स्वीकार करना होगा कि 26/11 की इस नौंवी बरसी पर हम आज वहीं हैं जहां 2008 में थे।

 

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  1. Ankit nishad Ankit nishad
    Nov 26, 2017 at 2:45 pm
    9115052867
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