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वक्त की नब्ज- परदेसी मीडिया का पूर्वाग्रह

पहली बार नहीं है कि मैंने ऐसा अज्ञान विदेशी पत्रकारों में देखा है। कुछ वर्षों के लिए मैंने लंदन के संडे टाइम्स के लिए कॉरेस्पांडेंट का काम किया था अस्सी-नब्बे के दशक में। उस दौरान मैंने देखा कि उनको आधुनिक भारत की समस्याओं पर लेख नहीं चाहिए थे, उनको इस किस्म के लेख ज्यादा पसंद थे, जो भारत की दकियानूसी और पिछड़ापन दर्शाते थे।
Author November 19, 2017 05:01 am
छवि के बरक्स बनारस

पिछले सप्ताह न्यूयार्क टाइम्स में एक लेख छपा था, जिसे पढ़ कर कई भारतीयों का खून खौलने लगा। मेरा भी। इसलिए कि इतना बकवास लेख में मैंने पहली बार पढ़ा होगा। लेखक भारतीय मूल का था शायद, लेकिन इतना भी नहीं जानता था कि हर हर महादेव का मतलब यह नहीं है कि हम सब शिव हैं। यही एक गलती होती इस लेख में तो उस पर लिखने की जरूरत नहीं महसूस होती मुझे, लेकिन इतनी गलतियां थीं, इतना पूर्वाग्रह कि लिखने पर मजबूर हूं। सबसे अजीब बात यह थी कि लेखक का मकसद था भारतीय फैशन पर लिखना, सो बनारस गया बनारसी साड़ियों के बारे में जानकारी हासिल करने। वहां पहुंचने के बाद बुनकरों से मिला और उनकी गरीबी देख कर तय किया कि दोष सारा नरेंद्र मोदी का है, निजी तौर पर।  ऐसा क्यों? इसलिए की लेखक ने उनकी गुरबत का खूब विश्लेषण करने के बाद तय किया कि हिंदुत्व विचारधारा के कारण इन मुसलमान बुनकरों को गरीब रखा गया है जानबूझ कर ताकि हिंदू दुकानदार और कारोबारी अमीर हो सकें। लेखक के मुताबिक यह सब हो रहा है हिंदुत्व विचारधारा के फैलने से। जिन देसी डिजाइनरों से लेखक ने भेंट की, उन सब का कहना यही था की हिंदुत्ववादी विचारधारा के लोकप्रिय होने की वजह से हिंदू औरतें साड़ियां पहन रहीं हैं, पश्चिमी डिजाइनर लिबास ठुकरा कर। लेखक आगे यह भी लिखते हैं कि लिबास को राजनीतिक रंग देना भारतीय राजनेताओं की पुरानी आदत है, सो गांधीजी ने धोती पहनना शुरू किया इसकी वजह से और पंडित नेहरु ने बंद गला। लेकिन जितना लिबास का रजनीतिकरण मोदी के आने के बाद हुआ है, वह कभी पहले नहीं देखने को मिला है। लेखक के मुताबिक यह सब हो रहा है मोदी के मेक इन इंडिया अभियान के कारण।

इतनी थोड़ी जानकारी है इस लेखक को भारत के बारे में कि यह भी लिखते हैं कि साड़ी सिर्फ हिंदू औरतें पहनती हैं। वाह भई न्यूयॉर्क टाइम्स, कहां से ढूंढ़ निकाला ऐसे लेखक को! न्यूयार्क टाइम्स ने पहली बार ऐसे अहमक का भारत पर लेख छापा होता, तो शायद कोई बात न होती, लेकिन ऐसा नहीं है। सच तो यह है कि भारत की राजनीतिक तब्दीलियों के बारे में जब भी इस प्रसिद्ध अखबार में कुछ छपता है, तो अक्सर उसमें पूर्वाग्रह और बकवास होती है। निजी तौर पर मैंने पाया है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ये चीजें ज्यादा देखने को मिलती हैं।मोदी से नफरत न्यूयार्क टाइम्स के पत्रकारों को उनके प्रधानमंत्री बनने के पहले से थी। याद है मुझे कि 2014 के चुनाव अभियान के शुरू में जब मोदी बनारस गए थे नामांकन पत्र भरने, तो वहां मुझे मिले थे न्यूयार्क टाइम्स के कॉरेस्पांडेंट। उसने मुझे बताया कि वह हैरान हुआ बनारस में उस दिन जन सैलाब को देख कर, क्योंकि उसकी नजरों में मोदी राक्षस था। ऐसे बंदे के लिए क्यों आम लोगों में इतना प्यार है, जिसने इतने मुसलमान मरवाए थे गुजरात के अपने राज में। मैंने जब उसे समझाया कि ऐसे दंगे बहुत बार हो चुके हैं भारत के कई राज्यों में, तो उसने कहा कि हुए होंगे, लेकिन 1947 के बाद इस तरह का कत्ल-ए-आम पहली बार हुआ। इस पर मैंने याद दिलाया कि 1984 में दिल्ली में तीन हजार से ज्यादा सिख मारे गए थे, तो ऐसा लगा मुझे कि इस बात का उसे यकीन नहीं हुआ। फिर मैंने याद दिलाया कि कांग्रेस के राज में बहुत बड़े दंगे हुए थे भागलपुर, मुरादाबाद, मेरठ, मलियाना और अन्य कई शहरों में। इसका भी उसे यकीन नहीं हुआ। सो, उसने कहा, ‘आप ऐसा कह रही हैं सिर्फ इसलिए कि आप मोदी की समर्थक हैं।’

पहली बार नहीं है कि मैंने ऐसा अज्ञान विदेशी पत्रकारों में देखा है। कुछ वर्षों के लिए मैंने लंदन के संडे टाइम्स के लिए कॉरेस्पांडेंट का काम किया था अस्सी-नब्बे के दशक में। उस दौरान मैंने देखा कि उनको आधुनिक भारत की समस्याओं पर लेख नहीं चाहिए थे, उनको इस किस्म के लेख ज्यादा पसंद थे, जो भारत की दकियानूसी और पिछड़ापन दर्शाते थे। सो, बनारस के डोम राजा पर उनको मैं कभी भी लेख भेज सकती थी, लेकिन जब बाबरी मस्जिद गिरने से पहले मैंने अयोध्या जाने का सुझाव दिया उन्हें, तो मेरे संपादक ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ऐसी स्टोरी का उनके लिए कोई मतलब नहीं है। सबसे ज्यादा तकलीफ मुझे तब हुई जब 1989 के चुनाव आंदोलन शुरू होते ही मैंने उनसे कहा कि राजीव गांधी हार सकते हैं। इस पर मेरे अंग्रेज संपादक ने कहा, ‘कैसे हो सकता है कि इतना सुंदर, जवान आदमी ऐसे बंदे से हार जाए, जिसके सिर पर अजीब टोपी रहती है और चेहरे पर मोटी ऐनक।’
यह वह दौर था दोस्तो, जब भारतीय पत्रकार बहुत थोड़े पैसे कमाते थे, सो हम सब मजबूर होकर विदेशी अखबारों में स्ट्रिंगर का काम किया करते थे। आज भारतीय पत्रकार खूब पैसे काम सकते हैं भारत में और अगर खुशकिस्मती से थोड़ा-बहुत काम टीवी पर मिल जाए तो नसीब खुल जाती है। हाल बल्कि यह है आज कि विदेशों में रहने वाले भारतीय पत्रकार भी भारतीय अखबारों में लिखने की कोशिश करते हैं और भारतीय टीवी पर काम ढूंढ़ते फिरते हैं। सो, आज विदेशों में रह कर विदेशी अखबारों में भारत के बारे में बकवास लिखने की कोई वजह नहीं होनी चाहिए उनको। इसलिए समझना मुश्किल है कि इन लोगों को इतनी जगह क्यों मिलती है न्यूयार्क टाइम्स जैसे प्रसिद्ध अखबार में। ऐसे लेख पढ़ कर क्यों न मोदी सरकार को ऐसा लगे कि उनका विरोध करना विदेशी मीडिया को अच्छा लगता है?

 

 

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