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वक़्त की नब्ज़ : सियासत में विरासत

परिवारवाद की बीमारी अब भारतीय जनता पार्टी में भी फैलने लगी है। क्या प्रधानमंत्री कम से कम इतना नहीं कर सकते कि अपने साथियों से पूछें कि वे अपने रिश्तेदारों को क्यों लाना चाहते हैं राजनीति में।
Author नई दिल्ली | January 29, 2017 03:58 am
मुलायम सिंह यादव और यूपी के पूर्व सीएम अख‍िलेश यादव (पीटीआई फाइल फोटो)

हमारे लोकतंत्र में देखते-देखते ऐसा परिवर्तन आया है कि कहना मुश्किल हो गया है कि लोकतांत्रिक प्रणाली कहां खत्म होती है और सामंतशाही कहां शुरू। पंजाब में लड़ाई हो रही है बादल परिवार और एक असली महाराजा के बीच, तो उत्तर प्रदेश में हमने हाल में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और भीष्म पितामह मुलायम सिंह के बीच संग्राम देखा, जिसमें यादव परिवार दो हिस्सों में बंट गया था। अब लड़ाई खत्म हो गई है और समाजवादी युवराज और कांग्रेसी युवराज ने फैसला किया है चुनावी मैदान में इकट्ठा उतरने का। और हम राजनीतिक पंडित ऐसे लोकतांत्रिक तमाशों के इतने आदी हैं कि स्वीकार कर लेते हैं हर नए तमाशे को, जैसे ये चीजें लोकतंत्र का हिस्सा हों।

सो, तमिलनाडु में दिवंगत मुख्यमंत्री की विरासत को लेकर जंग शुरू हो गई है उनकी दोस्त शशिकला और उनकी भतीजी के बीच, मानो आन्नाद्रमुक में कोई और रजनेता ही न हो। जब विरासत का मसला खत्म हो जाएगा, तो नए नेता की लड़ाई होगी एक ऐसे राजनीतिक परिवार से, जिसने अपनी अंदरूनी लड़ाई खत्म करके वारिस चुन लिया है पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि का। इधर बिहार में मुख्यमंत्री ने इस पिछड़े, गरीब प्रदेश को लालू परिवार के हवाले कर दिया है और खुद ढूंढ़ने निकले हैं राष्ट्रीय स्तर पर एक नई भूमिका। सवाल है कि इस किस्म के सामंतवाद को हम लोकतंत्र क्यों कहते हैं? सवाल यह भी है कि इतने राजनीतिक वारिस क्यों पैदा हो गए हैं कि हर बड़ा राजनेता अपने चुनाव क्षेत्र को तभी छोड़ने को तैयार होता है जब उसको अपने ही परिवार से कोई वारिस मिल जाता है।

इन सवालों के जवाब ढूंढ़ना आसान है, लेकिन परिवारवाद इतना फैल चुका है हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली में कि हमने सवाल पूछना ही बंद कर दिया है। थोड़ा-सा विश्लेषण करते तो मालूम जल्दी पड़ता कि परिवारवाद का कारण सिर्फ यह है कि जितनी जल्दी गरीब से धनवान बन सकते हैं राजनीति में आने से, वह किसी अन्य क्षेत्र में मुमकिन ही नहीं है। धन इकट्ठा होने लगता है अक्सर राजनीति में किसी वारिस के कदम रखते ही। अपने पिताजी या माताजी का नाम लेकर जब जाता है उद्योग जगत में चुनाव प्रचार के लिए चंदा मांगने, तो ऐसा कोई उद्योगपति नहीं होगा जो उसको खाली हाथ अपने दफ्तर से निकालेगा। जितना बड़ा नाम, उतना बड़ा चंदा मिलता है। अक्सर जरूरत से ज्यादा पैसा इकट्ठा हो जाता है, सो अगर चुनाव हार भी जाए तो थोड़ी-बहुत दौलत जमा रह जाती है। चुनाव अगर जीत जाते हैं वारिस साहब तो फिर पैसे बनाने के इतने रास्ते खुल जाते हैं कि अचानक उनकी जिंदगी बदल जाती है।

उत्तर प्रदेश के यादव परिवार में लड़ाई पर ध्यान दिया होगा, तो आपने देखे होंगे वे विदेशी गाड़ियों के लंबे काफिले, ऊंची दीवारों के अंदर आलीशान कोठियां, वह रहन-सहन रईसों का, जो समाजवादी पार्टी के सदस्यों का होना नहीं चाहिए। हम राजनीतिक पंडितों को पूछने चाहिए थे कई सवाल, लेकिन हममें से किसी ने एक भी सवाल नहीं उठाया। कुछ इसलिए कि हम बड़े राजनेताओं की शक्ति से डरते हैं और कुछ इसलिए भी कि हमको आदत हो गई है लोकतांत्रिक सामंतवाद की। सो, जब किसी राजनेता की बेटी की शादी में हमको दिखते हैं ऐसे गहने दुल्हन पर सजे हुए, जो पुराने जमाने की राजकुमारियां पहना करती थीं, हम तब भी चुप रहते हैं, क्योंकि हमको चुप रहने की आदत हो गई है।

यह सारा काला धन होता है, लेकिन यह बात छिपी रह जाती है आम जनता से, क्योंकि आयकर विभाग के अधिकारियों को मालूम है कि राजनेताओं के घरों पर छापे तभी पड़ते हैं जब आदेश ऊपर से आता है। प्रधानमंत्री नोटबंदी के बाद अपने हर भाषण में कहते हैं कि उनका मकसद है भारत से भ्रष्टाचार और काला धन मिटाना, सो उम्मीद है कि इस कोशिश में वे उन राजनीतिक परिवारों की तहकीकात कराएं, जिनके पास अपनी आय से कहीं ज्यादा दौलत साफ दिखती है।
नरेंद्र मोदी ने 2014 वाले आम चुनाव में अपनी पार्टी के लोगों को स्पष्ट शब्दों में समझा दिया था कि उनको परिवारवाद बिल्कुल पसंद नहीं है, लेकिन इसके बावजूद उनको एक-दो वारिसों को टिकट देने पड़े थे। अब उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में हाल यह है कि केंद्रीय गृहमंत्री के पुत्र को भी टिकट मिला है और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के पोते को भी। कैराना के सांसद हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को भी टिकट मिला है। कहने का मतलब यह कि परिवारवाद की बीमारी अब भारतीय जनता पार्टी में भी फैलने लगी है। क्या प्रधानमंत्री कम से कम इतना नहीं कर सकते कि अपने साथियों से पूछें कि वे अपने रिश्तेदारों को क्यों लाना चाहते हैं राजनीति में।

जवाब अक्सर यह मिलता है कि सिर्फ इसलिए कि वे जीतने के काबिल हैं। लेकिन यह महज बहाना है, क्योंकि दुनिया जानती है कि जब कोई महारथी राजनेता किसी को जिताना चाहता है किसी हलके से तो आसानी से किसी को भी जिता सकता है। रिश्तेदारों को राजनीति में लाने की असली वजह कुछ और है और वह यह कि राजनीति जनता की सेवा न रह कर एक कारोबार बन गई है और इस कारोबार में जितना आसान है पैसा बनाना किसी और कारोबार में नहीं है। प्रधानमंत्री अगर वास्तव में काला धन मिटाना चाहते हैं भारत से तो उनको कभी न कभी परिवारवाद के खिलाफ लड़ाई लड़नी पड़ेगी, क्योंकि यह ऐसा व्यवसाय है, जिसमें जितना भी धन पाया जाता है, बिल्कुल काला होता है।

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  1. Sidheswar Misra
    Jan 29, 2017 at 4:26 am
    परिवार वाद भारतीय संस्कृति की विरासद हैं जिस भी झेत्र में देखे अख़बार का मालिक अनपढ़ हो मुख्य संपादक बन जाता हैं .
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