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वक्त की नब्जः झूठ के सहारे

गलतियां और भी गिनवाई जा सकती हैं मोदी के दौर की, लेकिन इनके बारे में न वामपंथी राजनेता कभी बोलते हैं और न ही अरुंधति राय जैसे वामपंथी बुद्धिजीवी। क्योंकि वे जानते हैं अच्छी तरह कि ये चीजें मोदी को विरासत में मिली हैं उस ‘सेक्युलर’ दौर से, जिसकी वे तारीफें करते नहीं थकते हैं।

Author June 10, 2018 4:41 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो सोर्स- पीटीआई)

जब भी नरेंद्र मोदी के दौर में परिवर्तन के अभाव से मायूस होने लगती हूं, कोई न कोई वामपंथी बुद्धिजीवी याद दिलाता है मुझे कि मोदी क्यों आज भी लोकप्रिय हैं। इस बार याद दिलाया प्रसिद्ध लेखिका अरुंधति राय ने। इस लेखिका की आदत है भारत के बारे में झूठ बोलने की, लेकिन इस बार बीबीसी पर इतने झूठ बोले कि हैरान कर दिया मुझे। इन झूठों का विश्लेषण करना इसलिए जरूरी समझती हूं मैं, क्योंकि ये वही झूठ हैं, जो वामपंथी राजनेता और बुद्धिजीवी मोदी के बारे में बोलते फिर रहे हैं इन दिनों। अरुंधति राय से जब बीबीसी पर पूछा गया मोदी के कार्यकाल के बारे में तो उनका पहला झूठ यह था कि हिंसा इतनी बढ़ गई है मुसलमानों के खिलाफ पिछले चार वर्षों में कि उनको अलग अपनी बस्तियों में रहने पर मजबूर कर दिया गया है। सच तो यह है कि मुसलमानों की बस्तियां दशकों से अलग बनी हुई हैं, क्योंकि ‘सेक्युलर’ दौर में दंगे-फसाद हर साल हुआ करते थे, जिनमें ज्यादातर मुसलमान मारे जाते थे, क्योंकि प्रशासन और पुलिस अक्सर उस दौर में भी हिंदुओं का साथ दिया करते थे। सो, अपनी सुरक्षा के वास्ते मुसलमानों को अपनी अलग बस्तियों में रहना पड़ा। मोदी के कार्यकाल में गोरक्षकों की हिंसा जरूर बढ़ी है, लेकिन एक भी बड़ा दंगा नहीं हुआ है अभी तक। यानी जो भविष्यवाणी अरुंधति के वामपंथी हमसफर किया करते थे कि खून की नदियां बहने लगेंगी मोदी अगर प्रधानमंत्री बने तो, पर वैसा हुआ नहीं है। शायद इसलिए अब झूठ का सहारा लेना पड़ रहा है इनको।

हिंसा की बात करते हुए अंग्रेजी की इस प्रसिद्ध लेखिका ने आगे कहा कि कठुआ में उस बच्ची के बलात्कार और हत्या के बाद हजारों लोगों ने अपराधियों के समर्थन में जुलूस निकाले। यह इतना बड़ा झूठ है कि इसका विश्लेषण करना बेकार है और इस दूसरे झूठ का भी विश्लेषण बेकार है कि भारत में अब स्कूल की किताबों पर हिटलर की तस्वीरें छापी जाती हैं। विश्लेषण जरूरी है, लेकिन इस आरोप का कि मोदी का दौर ट्रंप के दौर से भी बदतर है, क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप को काबू में रखने के लिए अमेरिकी न्यायालय और अमेरिकी मीडिया बहुत कुछ कर रहे हैं। भारत में लोकतंत्र की तमाम संस्थाएं खोखली हो गई हैं वामपंथी बुद्धीजीवियों की नजर में, और इसका सबूत उनके लिए यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के आला न्यायाधीशों ने खुद प्रेस कान्फ्रेंस बुला कर कहा था कुछ महीने पहले कि लोकतंत्र खतरे में है।

इन न्यायाधीशों ने अगर इस बात को इसलिए कहा होता, क्योंकि न्याय का रास्ता भारत में इतना पेचीदा और महंगा है कि आम भारतीय अदालतों तक पहुंच ही नहीं पाता है, तो इनका समर्थन हम सबको करना पड़ता। लेकिन इनकी शिकायत सिर्फ यह थी कि मुख्य न्यायाधीश उनसे सलाह लिए बगैर फैसला लेते हैं कि कौन-सी न्यायपीठ में कौन बैठेगा। उन्होंने स्वीकार किया उसी प्रेस कान्फ्रेंस में कि ऐसा करने का मुख्य न्यायाधीश को पूरा अधिकार है, लेकिन चूंकि मोदी से नफरत आज भी भारत का तकरीबन पूरा मीडिया करता है, सो इन न्यायाधीशों की बातों का खूब प्रचार हुआ। टीवी पर चर्चाएं हुर्इं कई दिन और लंबे-चौड़े लेख लिखे गए अखबारों में, बावजूद इसके कि फली नरीमन जैसे जाने-माने वकील ने इन न्यायाधीशों की निंदा की, यह कहते हुए कि उन्होंने प्रेस कान्फ्रेंस बुला कर अपनी शिकायतें रख कर, देश की न्याय प्रणाली को कमजोर किया है, मजबूत नहीं।

ऐसा नहीं कि मोदी ने गलतियां नहीं की हैं अपने कार्यकाल में। कई गलतियां की हैं मेरी राय में, जिनमें सबसे बड़ी गलती उनकी यह रही है कि उन्होंने देश को नई दिशा न देकर उसी दिशा में रखा है अभी तक, जिस दिशा में कांग्रेस के प्रधानमंत्री लेते आए हैं पिछले सत्तर वर्षों से। ऐसा करने से कई अतिमहत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में अभी तक परिवर्तन के आसार नहीं दिखे हैं, जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में। नतीजा यह है कि जिन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें बनी हैं, वहां स्कूल, अस्पताल और ग्रामीण विकास का हाल बिलकुल वैसा है जैसे कांग्रेस के दौर में था। नई आर्थिक दिशा ली होती मोदी ने, तो शायद अभी तक परिवर्तन दिखने लगा होता।

राजनीतिक और प्रशासनिक क्षेत्रों में भी मोदी वह परिवर्तन नहीं ला पाए हैं अभी तक जिसकी उम्मीद थी। सो, अपने आप को उन्होंने बेशक देश का प्रधान सेवक कह दिया हो, लेकिन सेवा का यह संदेश न उनके मंत्रियों तक पहुंचा है और न ही उनके मुख्यमंत्रियों तक। आज भी इन लोगों में वही अकड़ दिखती है, जिससे साबित होता है कि वे जनता के राजा समझते हैं अपने आप को, सेवक नहीं। प्रशासनिक तरीकों में आज डिजिटल शब्द जरूर आ गया है, लेकिन सरकारी दफ्तरों में आज भी वही माहौल है, जो पहले हुआ करता था। आम आदमी घुटनों के बल जाकर उन चीजों को मांगता है, जो उसका हक होना चाहिए।

इस तरह की गलतियां और भी गिनवाई जा सकती हैं मोदी के दौर की, लेकिन इनके बारे में न वामपंथी राजनेता कभी बोलते हैं और न ही अरुंधति राय जैसे वामपंथी बुद्धिजीवी। नहीं बोलते हैं, क्योंकि वे जानते हैं अच्छी तरह कि ये चीजें मोदी को विरासत में मिली हैं उस ‘सेक्युलर’ दौर से, जिसकी वे तारीफें करते नहीं थकते हैं। ऐसी बातें करते हैं उस दौर की, जैसे उसमें न हिंसा थी, न हिंदू-मुसलिम तनाव, न गरीबी और न ही वे खराबियां, जो उनको मोदी के दौर में हर कदम पर दिखती हैं। झूठी हैं इनकी बातें, लेकिन भारत को विदेशी पत्रकारों की नजरों में बदनाम करने में बहुत सफल रहे हैं।

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