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‘वक्त की नब्ज’ कॉलम में तवलीन सिंह का लेख: बढ़ाएं आर्थिक सुधारों की रफ्तार

मोदी से उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री बन जाने के बाद निवेशक वापस आ जाएंगे उनकी नीतियों में परिवर्तन देख कर।

Author October 30, 2016 4:57 AM
अरुण जेटली ।

लक्ष्मी पूजा का पावन दिन है। धन की देवी की पूजा देश भर में जब हो रही है, तो क्यों न बात हो उस समृद्धि की, जो नरेंद्र मोदी देखना चाहते हैं भारत में। उनमें और समाजवादी स्वभाव के राजनेताओं में अंतर यही है कि मोदी समृद्धि की बातें करके जीते और उनके प्रतिद्वंद्वी गरीबी की बातें करके हारे। प्रधानमंत्री बनने के बाद ऐसा लगने लगा कुछ महीनों के लिए कि मोदी भी गरीबी हटाओ के जाल में अटक गए हैं। मोदी मगर जल्द ही सावधान हो गए और देखा उन्होंने कि गरीबी हटाने के लिए भी समृद्धि चाहिए। सो, मेक इन इंडिया का नारा बुलंद हुआ लाल किले की प्राचीर से और योजना आयोग को हटा कर नीति आयोग बना, लेकिन इस प्रयास को रोकने में लग गए वही आला अधिकारी, जिनकी सोच ने देश को दशकों गरीब रखा है।

प्रधानमंत्री फिर सतर्क हुए और पिछले साल मुंबई में मेक इन इंडिया के नाम पर अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन बुलाया गया, जिसमें दुनिया के कई बड़े उद्योगपतियों ने भाग लिया और निवेश करने के वादे भी किए, लेकिन इसके बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था में वह हरारत नहीं दिख रही है, जो दिखनी चाहिए थी अभी तक। माना कि जो अर्थव्यवस्था मोदी को विरासत में मिली थी उसका बहुत बुरा हाल था। विदेशी निवेशक भाग गए थे जब उन्होंने देखा कि सोनिया-मनमोहन सरकार उन पर ऐसे कर लगाने की कोशिश कर रही है, जिसको देकर वे कंगाल हो जाएंगे।  देसी निवेशक तब डर गए जब उन्होंने देखा कि सरकार की नीयत इतनी खराब है कि बड़े-बड़े उद्योग बंद करने पर तुली हुई है। मिसाल के तौर पर अगर वेदांता समूह का लांजीगढ़ कारखाना न राहुल गांधी ने आदिवासियों के नाम पर बंद किया होता, तो मुमकिन है कि ओड़ीशा आज विश्व का सबसे बड़ा एल्यूमीनियम केंद्र बन गया होता। एल्यूमीनियम बनता नियमगिरी पहाड़ियों के साए में, जहां दुनिया का सबसे अच्छा बॉक्साइट मिलता है, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दाम आधे हो सकते थे। ऐसे कई उदाहरण और मिलते हैं सोनिया-मनमोहन शासनकाल के आखिरी तीन वर्षों में।

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मोदी से उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री बन जाने के बाद निवेशक वापस आ जाएंगे उनकी नीतियों में परिवर्तन देख कर। ऐसा अभी तक नहीं हुआ है और यही मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता मानी जाती है। मोदी ने सत्ता संभालने के बाद वादा किया था कि निवेशकों के लिए भारत का माहौल इतना सुहाना हो जाएगा कि भारत की गिनती उन देशों में होने लगेगी, जिनमें सबसे सुहाना माहौल है बिजनेस के लिए। पिछले हफ्ते लेकिन विश्व बैंक ने अपनी नई सूची जारी की, जिसमें भारत वहीं दिखा उन देशों में जहां बिजनेस करना मुश्किल नहीं, तकरीबन नामुमकिन है।

कारण अनेक हैं, लेकिन अहम कारण यही है कि अभी तक न केंद्र सरकार के आला अधिकारियों की मानसिकता बदली है और न ही राज्य सरकारों में वह परिवर्तन दिखता है, जिसकी उम्मीद थी। बातें बहुत बड़ी-बड़ी करते हैं भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री मोदी की नकल करके, लेकिन जमीनी तौर पर तकरीबन कुछ नहीं हुआ है। ऊपर से वे पुरानी मुश्किलें मौजूद हैं, टूटी सड़कों की, रद्दी रेल सेवाओं की और टूटे-पुराने बंदरगाहों की। प्रधानमंत्री अगर मुंबई से गोवा तक जाने की कोशिश करते हैं सड़क के रास्ते से, तो इस राष्ट्रीय हाइवे का हाल देख कर उनको शायद रोना आ जाएगा। मेरा काफी आना-जाना होता है इस हाइवे से और यकीन मानिए कि इसका इतना बुरा हाल है कि जो बड़े-बड़े आधुनिक ट्रक चलते हैं इस पर वे अक्सर बैलगाड़ी की रफ्तार से चलते हैं। ऐसे में कौन से विदेशी निवेशक होंगे, जो भारत में निवेश करने आएंगे, जब चीन जा सकते हैं या दक्षिण-पूर्व एशिया के किसी दूसरे देश में जहां यातायात की तमाम सेवाएं हमसे कहीं ज्यादा बेहतर हैं।

भारत सरकार से निवेशकों की शिकायत यह भी है कि हर कदम पर उनको उन्हीं पुरानी रुकावटों का सामना करना पड़ता है, जो दशकों से चली आ रही हैं। कारखाना लगाना हो, तो इजाजत लेने में सालों लग सकते हैं। फिर जमीन खरीदने में नई रुकावटों का सामना करना पड़ता है और इन सब रुकावटों के बाद उन सरकारी इंस्पेक्टरों का रोज सामना करना पड़ता है, जो हर दूसरे-तीसरे दिन आ जाते हैं रिश्वत खाने या सिर्फ तंग करने। सो, कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए हमें कि अभी तक देश की अर्थव्यवस्था से मंदी पूरी तरह से हटी नहीं है, बावजूद प्रधानमंत्री के नेक इरादों के।

अगली दिवाली तक मोदी अगर उस किस्म का परिवर्तन देखना चाहते हैं, जो हमने लाइसेंस राज के समाप्त होने के बाद देखा था देश भर में, तो प्रशासनिक और आर्थिक सुधारों की रफ्तार बढ़ानी होगी दृढ़ता दिखा कर। अब न मेक इन इंडिया मेलों से फर्क आने वाला है और न ही घोषणाओं से काम चलने वाला है। माना जाता है कि भारत में हर महीने दस लाख नई नौकरियां पैदा करने की जरूरत है और ऐसा तभी होगा जब निजी निवेशक फिर से भारत की अर्थव्यवस्था में विश्वास करने लगेंगे।
मेरी जब भी गैर-सरकारी निवेशकों से भेंट होती है तो एक ही शिकायत सुनने को मिलती है कि मोदी सरकार की नीयत साफ है और उनकी नीतियां भी कुछ ठीक हो गई हैं, लेकिन जमीनी तौर पर वे परिवर्तन और विकास नहीं दिखते, जिनका वादा था। उनका कहना है कि हाल इतना बुरा है कि जब किसी सड़क या कोई अन्य सरकारी योजना के लिए टेंडर खुलते हैं आजकल, तो उनको भरने कोई सामने नहीं आता है। नतीजा यह है कि सरकार को खुद सबसे बड़ा निवेशक बनना पड़ा है, लेकिन सरकार सब कुछ करने के काबिल नहीं है। लक्ष्मी पूजा नरेंद्र मोदी को आज दिल से करनी होगी। दिवाली की शुभकामनाएं आप सबको।

 

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