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वक्त की नब्ज- गोरक्षा के नाम पर

राज्यसभा में मुख्तार अब्बास नकवी ने पहले तो कहा कि ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं है जैसा कि मीडिया में प्रचार किया जा रहा है।

Author April 9, 2017 4:05 AM
उत्तर प्रदेश के शहर इलाहाबाद के एक बंद पड़े बूचड़खाने के सामने से गुजरती एक गाय। (REUTERS/Jitendra Prakash)

आसान नहीं था पहलू खान की हत्या का वीडिओ बार-बार देखना। लेकिन बार-बार देखा मैंने, इस उम्मीद से कि शायद समझ सकंू बार-बार देख कर कि उस बुजुर्ग मुसलमान की बर्बर हत्या के पीछे असली कारण क्या था। हत्यारे मामूली कट्टरपंथी हिंदुत्ववादी नहीं थे देखने में। जींस पहने थे और ऐसी टी-शर्ट, जिनको देख कर लगा कि फैशन में रुचि है उन नौजवानों की। उनके लिबास से ऐसा भी लगा मुझे कि शिक्षित, मध्यवर्गीय घरों के लड़के थे। सो, कहां से उनमें एक बुजुर्ग आदमी की हत्या करने की नीयत पैदा हुई?
जब बेहोश होकर गिर पड़ा वह बुजुर्ग तब भी उन नौजवानों को नहीं लगा कि बस इतनी सजा काफी होनी चाहिए, अगर सजा देनी ही थी बिना किसी जुर्म के साबित हुए। इरादा सिर्फ सजा का होता तो बड़े-बड़े पत्थर उठा कर उसके सिर पर न फेंके होते, ताकि जिंदा बचने की संभावना न रहे। गर्व से उन्होंने अपनी बर्बरता को वीडिओ में कैद किया और सोशल मीडिया पर डाल दिया। सो, प्रधानमंत्री ने इस वीडिओ को देखा होगा और राजस्थान की मुख्यमंत्री ने भी, लेकिन एक शब्द इन राजनेताओं के मुंह से नहीं निकला, जिससे साबित हो कि इस हत्या से उनको तकलीफ हुई है।

उनके प्रवक्ता जब बोले तो उन्होंने ऐसे बयान दिए, जिन्हें सुन कर मैं हैरान रह गई। राज्यसभा में मुख्तार अब्बास नकवी ने पहले तो कहा कि ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं है जैसा कि मीडिया में प्रचार किया जा रहा है। फिर कहा कि संसद को सोच-समझ कर कुछ कहना चाहिए, ताकि ऐसा न लगे कि गोहत्या को ठीक मानता हो यह सदन। राजस्थान के गृहमंत्री ने इससे भी ज्यादा स्पष्ट शब्दों में कहा कि गलती दोनों तरफ से हुई है। दोनों तरफ से? पहलू खान की क्या गलती थी? क्या मेले से गाय खरीद कर घर ले जाना अपराध हो गया है भारत देश में? हो गया है तो किसान पशु पालना बंद कर दें क्या? पहलू खान के बेटों ने उनकी हत्या के बाद टीवी पर कागजात दिखाए, जो साबित करते हैं कि उन्होंने जायज तरीके से गाय खरीदी थी, लेकिन हत्यारों ने इसकी परवाह नहीं की। उनका एक ही मकसद था: पहलू खान और उनके बेटों को जान से मारना गोरक्षा के नाम पर।
सवाल सिर्फ इस एक हत्या का नहीं, सवाल है कि हम भारत में कानून-व्यवस्था बनाए रखना चाहते हैं या नहीं? कानून-व्यवस्था जिन देशों में कायम होती है उनमें उन लोगों को अपराधी माना जाता है, जो कानून को अपने हाथों में लेते हैं। गोरक्षा के नाम पर ऐसा पहली बार गोरक्षकों ने मोहम्मद अखलाक की हत्या करके किया। उस बर्बर हत्या के बाद प्रधानमंत्री की तरफ से इशारा आता कि उनको तकलीफ हुई इस हत्या से, तो शायद गोरक्षक नियंत्रण में रहते। अब उनके हौसले इतने बुलंद हैं कि सरेआम कर रहे हैं ऐसी हत्याएं। न उनको कानून का डर है और न राजनेताओं का, वरना हत्या करते समय वीडियो न बनाते।

तो क्या गोरक्षा ही इन हत्यारों का मकसद है, कि बात कुछ और है? यह सवाल इसलिए उठता है, क्योंकि गोरक्षा ही करना चाहते, तो उन गायों की रक्षा क्यों नहीं कर रहे, जो हमारे शहरों में आवारा भटकती हैं? आवारा इसलिए भटकती हैं क्योंकि जब बूढ़ी हो जाती हैं और दूध देना बंद कर देती हैं तो हिंदू परिवार इनको मारने के बदले खुला छोड़ देते हैं अपने हाल पर। गोरक्षकों को वास्तव में गोरक्षा ही करनी होती, तो क्या उन हिंदू परिवारों को न समझाते कि ऐसा करना महापाप है? गोरक्षा ही मकसद होता इन गोरक्षकों का, तो क्यों नहीं तहकीकात करते कि सरकारी गोशालाओं में इतनी गाएं क्यों मरती हैं हर साल? धीरे-धीरे साबित हो रहा है कि इन हत्यारे गोरक्षकों का मकसद कुछ और ही है। वह इसलिए कि ज्यादातर हत्याएं हुई हैं मुसलमानों की। ऊना में दलितों की पिटाई हुई थी, लेकिन इस एक घटना के अलावा जितनी भी हिंसा हुई, सिर्फ मुसलमानों के खिलाफ हुई है। सो, मोहम्मद अखलाक के बाद एक कश्मीरी लड़के को उधमपुर के पास मार डाला था गोरक्षकों ने और उसके बाद नेपाल की सीमा पर एक-दो हत्याएं हुर्इं, जिनमें मरने वाले मुसलिम नौजवान ही थे। तो क्या गोरक्षा का असली मकसद है मुसलमानों को दिखाना कि भारत में अब उनकी जगह हिंदुओं से कम ही रहेगी?

सोशल मीडिया पर जो हिंदुत्ववादी ट्वीट आए हैं पहलू खान की हत्या के बाद, वे साबित करते हैं इस बात को। मैंने जब अपनी एक ट्वीट में कहा कि पहलू खान की हत्या से मैं शर्मिंदा हूं और पूरे देश को शर्मिंदा होना चाहिए तो खूब गालियां खानी पड़ीं हिंदुत्ववादियों से। संदेश सबका एक ही था कि मैं इस हत्या को लेकर सिर्फ इसलिए शर्मिंदा हूं, क्योंकि एक मुसलिम की मौत हुई है। संघ के कार्यकर्ता रोज मारे जाते हैं केरल में, लेकिन उसके बारे में कोई नहीं लिखता, आदि। पूर्व विदेशमंत्री सलमान खुर्शीद के एक ट्वीट को जब मैंने रीट्वीट किया, तो गालियां और खानी पड़ीं, बावजूद इसके कि खुर्शीद साहब के ट्वीट में एक ऐसा शेर था, जिसने याद दिलाया कि प्रधानमंत्री खुद कह चुके हैं बहुत बार कि वे सबका साथ, सबका विकास करना चाहते हैं। शेर इसी बात को कहता है खूबसूरत अंदाज में। सो: ‘कभी शाख-ओ-सब्ज-ओ-बर्ग पर कभी गुंचा-ओ-गुल-ओ-खार पर, मैं चमन में चाहे जहां रहूं मेरा हक है फस्ल-ए-बहार पर। भारत में ‘फस्ल-ए-बहार’ पर जिस दिन सबका हक नहीं रहेगा उस दिन भारत भी भारत नहीं रहेगा।

 

 

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