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वक्त की नब्जः दिल्ली पहुंचने का रास्ता

जब उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने देखा कि परिवर्तन और विकास के बदले उनको हिंदुत्व ही मिला है, तो भारतीय जनता पार्टी को छोड़ कर फिर वापस जाने लगे उन राजनीतिक दलों के पास, जिनको दशकों से वोट देते आए हैं।

Author June 3, 2018 4:33 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ।(फाइल फोटो)

कई महीनों से उत्तर प्रदेश के मतदाता एक संदेश भेजने की कोशिश कर रहे हैं प्रधानमंत्री को, जो शायद उन तक पहुंचा नहीं है। संदेश है कि जब उन्होंने पिछले साल उत्तर प्रदेश की विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी को चार सौ तीन में से तीन सौ पच्चीस सीटें दी थीं, वे परिवर्तन और विकास के लिए थीं। हिंदुत्व के लिए नहीं। पहले गोरखपुर और फूलपुर में भारतीय जनता पार्टी को हरा कर यह संदेश भेजने की कोशिश हुई और पिछले हफ्ते फिर वही संदेश भेजा गया, कैराना में पूर्व भाजपा सांसद हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को हरा कर।

सच तो यह है कि शुरू से ही नरेंद्र मोदी और अमित शाह या तो उत्तर प्रदेश के मतदाताओं की आवाज सुन नहीं पाए हैं या सुनना नहीं चाहते हैं। समझ में आया होता मतदाताओं का संदेश, तो योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री न बनाए होते। इसलिए कि गोरखपुर मठ के इस महंत ने राजनीति में आने का निर्णय किया था, क्योंकि रामजन्मभूमि आंदोलन ने उनको प्रेरित किया था। सो, हिंदुत्व के अलावा उनका कोई दूसरा एजेंडा हो ही नहीं सकता है। प्रशासनिक काबिलियत दिखाई होती, तो इसका असर गोरखपुर में दिखता, जो उनकी कर्मभूमि है और जहां से पिछले बीस वर्षों से सांसद रहे हैं।

गोरखपुर की सारी समस्याओं की जड़ गंदगी है। इस शहर के बाजारों और रिहायशी इलाकों में गंदगी इतनी है कि अगर कहा जाए कि भारत के सबसे गंदे शहरों की फेहरिस्त में गोरखपुर का नंबर बिल्कुल ऊपर होगा, तो गलत न होगा। ऐसा हाल न होता अगर योगीजी ने अपनी सांसद निधि में से कुछ पैसे शहर के सुधार में लगाए होते। ऐसा अगर कभी किया भी हो, तो दिखता नहीं है। इस गंदगी का सबसे खतरनाक नतीजा यह है कि जापानी इन्सेफलाइटिस से हर साल गोरखपुर के बच्चे हजारों की तादाद में मरते हैं। पिछले साल तो गोरखपुर के सबसे बड़े अस्पताल में अड़तालीस घंटों के अंदर तीस से ज्यादा बच्चे सिर्फ इसलिए मरे थे, क्योंकि बीआरडी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में ऑक्सिजन की कमी थी। अगस्त में हुई इस त्रासदी से बहुत बदनाम हुए योगीजी, क्योंकि कई लोगों ने पूछना शुरू किया कि उन्होंने बतौर सांसद क्यों नहीं अपने चुनाव क्षेत्र को सुधारने का काम किया। मलेरिया की तरह इन्सेफलाइटिस फैलाते हैं मच्छर, जो पलते हैं गंदे पानी में।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद योगीजी अगर हिंदुत्व को ताक पर रख कर बेहाल स्वास्थ्य-शिक्षा सेवाओं पर ध्यान दिए होते, तो मुमकिन है कि कैराना में भारतीय जनता पार्टी जीत जाती। मैं जब भी ग्रामीण उत्तर प्रदेश के दौरे पर जाती हूं, तो दुख होता है स्कूलों और अस्पतालों को देख कर। मैंने ऐसे स्कूल देखे हैं, जहां बच्चों को पेड़ों के नीचे बंजर जमीन पर बिठा कर पढ़ाया जाता है, क्योंकि स्कूल की छतें तक गिर गई हैं। अस्पताल ऐसे देखे हैं, जिनमें न डॉक्टर हैं, न दवा, न इलाज। कई जगहों पर तो मरीज भी नहीं दिखते हैं, क्योंकि इमारतें बनी हैं सिर्फ किसी राजनेता को उनके निर्माण से पैसा खाने के लिए।

पिछले साल विधानसभा चुनावों से पहले मैंने उत्तर प्रदेश के देहातों की काफी खाक छानी और जहां गई, मुझे लोगों ने कहा कि इस बार वे मोदी को वोट देंगे, क्योंकि उनको परिवर्तन और विकास का नारा बहुत अच्छा लगा। यह भी सुनने को मिला लोगों से कि उनको अहसास था कि उत्तर प्रदेश पिछड़ गया है जाति और धर्म के नाम पर, मंदिर-मस्जिद के नाम पर वोट देने के कारण। सो, पिछले साल जो भारतीय जनता पार्टी को उन्होंने इतना शानदार बहुमत देकर जिताया था, वह इस उम्मीद से कि मोदी अपने परिवर्तन और विकास वाले वादों पर खरे उतरेंगे, लेकिन चुनाव के बाद हुआ बिल्कुल कुछ और। मुख्यमंत्री बने योगी आदित्यनाथ, जिन्होंने सत्ता में आते ही उन मुद्दों को उठाना शुरू किया, जिनका दूर से कोई वास्ता नहीं है परिवर्तन और विकास के साथ।

लव जिहाद का मुद्दा उठा, जिसके उठते ही मुसलिम नौजवानों को रोमियो स्क्वॉड घेरने लगे जब भी उनको किसी हिंदू लड़की के साथ पाया गया। यहां तक कि घरों के अंदर घुस कर उनको निकाल कर मारा गया। बुलंदशहर जिले के सोही गांव में योगी आदित्यनाथ की हिंदू युवा वाहिनी के कुछ नौजवानों ने पैंतालीस वर्षीय गुलाम मुहम्मद को पीट-पीट कर मार डाला, सिर्फ इस शक पर कि उसने एक हिंदू लड़की को मुसलिम लड़के के साथ भाग कर शादी करने में मदद की। योगीजी के हिंदुत्व एजेंडे के तहत अवैध बूचड़खानों की मुहिम चली, जिसके चलते हजारों मुसलमान और दलित नौजवानों की नौकरियां चली गर्इं। सो, जब उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने देखा कि परिवर्तन और विकास के बदले उनको हिंदुत्व ही मिला है, तो भारतीय जनता पार्टी को छोड़ कर फिर वापस जाने लगे उन राजनीतिक दलों के पास, जिनको दशकों से वोट देते आए हैं।

कैराना में जब भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनाव अभियान में फिर से हिंदुत्व को अहमियत दी, तो उन्होंने विपक्ष को अपना वोट दिया और तबस्सुम हसन इस लोकसभा में पहली मुसलिम सांसद बन गई हैं। जीतने के बाद तबस्सुम हसन ने अपने हर इंटरव्यू में कहा कि उनकी जीत हुई है सिर्फ इसलिए कि कैराना के मतदाता भारतीय जनता पार्टी की फिरकापरस्त राजनीति को हराना चाहते थे। सो, क्या अब संदेश पहुंचेगा प्रधानमंत्री तक कि उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व उनको हरा सकता है, जिता नहीं सकता? अब भी अगर यह संदेश उन तक नहीं पहुंचता है, तो 2019 में उनका फिर से प्रधानमंत्री बनना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन हो सकता है। दशकों से राजनीतिक पंडित कहते आए हैं कि दिल्ली तक पहुंचने का रास्ता लखनऊ से जाता है। ऐसा अब भी है।

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