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वक्त की नब्ज- हकीकत से आंखें चुराने का सबब

गुजरात में नेहरू-गांधी परिवार के वारिस ने नोटबंदी और जीएसटी पर डट कर हमला किया है, यह कह कर कि मोदी के इन दोनों कदमों ने अर्थव्यवस्था पर तारपीडो की तरह काम किया है। जब भी उन्होंने यह बात कही, किसी आमसभा में तालियों के साथ स्वागत किया उपस्थित लोगों ने।

गांधी नगर में जनसभा को संबोधित करते हुए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी। (फोटो- ANI)

मेरी मुलाकात पिछले हफ्ते एक उद्योगपति से हुई, जो नरेंद्र मोदी के बहुत बड़े फैन हैं। मैंने जब उनसे पूछा कि कैसा चल रहा है आजकल, तो उनको लगा कि मैं गुजरात और हिमाचल में होने वाले चुनावों के बारे में पूछ रही हूं। सो कहा, ‘सवाल ही नहीं है कांग्रेस का इन दोनों राज्यों में जीतने का।’ मैंने जब स्पष्ट किया कि मैं चुनावों के बारे में नहीं, देश के हाल के बारे में उनकी राय जानना चाहती हूं, तो उन्होंने मुस्करा कर कहा, ‘इतना भी बुरा नहीं है, जितना आप मीडिया वाले कह रहे हैं। और मुझे यह बताएं कि आजकल आप लोग राहुल गांधी का इतना प्रचार क्यों कर रहे हैं?’ मोदी के इस समर्थक से ऐसी बातें सुन कर लगा कि शायद राहुल गांधी ने वास्तव में मोदी सरकार की किसी दुखती रग को छुआ होगा। गुजरात में नेहरू-गांधी परिवार के वारिस ने नोटबंदी और जीएसटी पर डट कर हमला किया है, यह कह कर कि मोदी के इन दोनों कदमों ने अर्थव्यवस्था पर तारपीडो की तरह काम किया है। जब भी उन्होंने यह बात कही, किसी आमसभा में तालियों के साथ स्वागत किया उपस्थित लोगों ने। मैंने यह बात जब अपने उद्योगपति दोस्त से कही, तो उन्होंने स्वीकार किया कि तकलीफ तो हुई है कारोबारियों को, खासकर जीएसटी के कारण, लेकिन सरकार इस तकलीफ को दूर करने की कोशिश भी तो कर रही है। यह कहने के बाद उन्होंने कहा कि पत्रकारों को इस पर ध्यान देना चाहिए कि मोदी का विकल्प क्या है। ‘क्या नया कह रहे हैं राहुल गांधी? कौन-सा चमत्कार करने वाले हैं? यकीन करो कि मोदी अगर इस देश में परिवर्तन और विकास लाने में कामयाब नहीं होते हैं, तो कोई नहीं ला सकेगा।’

इस परिवर्तन और विकास की उम्मीद में मैंने भी मोदी का समर्थन किया है 2013 से, लेकिन अब कुछ ऐसा लगने लगा है कि कहीं न कहीं विकास और परिवर्तन का रास्ता छोड़ कर मोदी किसी दूसरे रास्ते पर भटक गए हैं। माना कि राजनीति एक ऐसा रंगमंच है, जहां खूब हल्लागुल्ला न हो तो सन्नाटा छा जाता है, लेकिन आर्थिक मामलों में ड्रामा करने से उपलब्धियां हासिल नहीं होतीं। सो, क्या जरूरत थी जीएसटी का एलान संसद में आधी रात को करने की? क्या मोदी जानते नहीं हैं कि आम लोग किसी भी टैक्स का स्वागत नहीं करते हैं? अपने भारत में तो इस शब्द को सुनते ही लोग घबरा जाते हैं, क्योंकि टैक्स विभाग का जुल्म और भ्रष्टाचार टैक्स देने वालों ने भी झेला है और न देने वालों ने भी। जीएसटी को लेकर समस्या यह भी है कि इतना पेचीदा है यह टैक्स कि ‘गुड ऐंड सिंपल’ टैक्स न होकर एक मुसीबत बन कर आया है, छोटे कारोबारियों के जीवन में। मुझे हर दूसरे-तीसरे दिन कोई न कोई मिल जाता है, जो कहता है कि जीएसटी के कारण उसका कारोबार तकरीबन ठप हो चुका है। इस तरह की बातें ऊपर तक पहुंच गई हैं, सो गुजराती खाखरा पर कम किया गया है टैक्स, लेकिन ऐसे कई और कारोबार हैं, जो अब भी तकलीफ में हैं। सो, प्रधानमंत्री अगर चाहते हैं कि अर्थवस्था को और नुकसान न हो तो उनको जल्दी ऐसे कदम उठाने होंगे, जो इस टैक्स को वास्तव में सिंपल बना दें। यह कहना गलत न होगा कि 2019 में अगर मोदी फिर से जीतना चाहते हैं, तो अर्थव्यवस्था में फिर से बहार लानी होगी।

अभी स्थिति यह है कि बहार तो दूर की बात, मंदी के बादल छाने लगे हैं। कुछ नोटबंदी और जीएसटी की वजह से और कुछ इसलिए कि गोरक्षकों ने गौमाता को बचाने के बहाने दलित और मुसलिम समाज को इतना सताया है कि गोश्त और चमड़े के कारोबार में हजारों नौकरियां खत्म हो चुकी हैं। कृषि क्षेत्र में दूध का कारोबार कौन करेगा, जब गायों को वाहन में रख कर इधर से उधर ले जाना इतना खतरनाक हो गया है? प्रधानमंत्री ने गोरक्षकों को खबरदार एक-दो बार किया जरूर है, लेकिन उनका संदेश उन तक या तो पहुंचा ही नहीं है या ये लोग जानते हैं कि जब तक भारतीय जनता पार्टी का राज होगा किसी प्रदेश में, पुलिस उनके साथ सख्ती से पेश नहीं आएगी। यहां याद रखना जरूरी है कि राजस्थान सरकार के मंत्रियों ने पहलू खान के हत्यारों की खुल कर पैरवी की है।
जहां हिंसा का महौल बन जाता है वहां निवेशक कहां से आने वाले हैं? निवेशक नहीं आएंगे तो रोजगार भी नहीं आ सकता है। माना कि विदेशों से आ रहे हैं निवेशक भारी तादाद में और यह भी माना कि वर्ल्ड बैंक ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत में अब बिजनेस करना आसान हो गया है।

लेकिन अपने जो बेचारे देसी कारोबारी हैं उनके लिए बिजनेस करना आसान नहीं, दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है। नोटबंदी और जीएसटी की वजह से ही नहीं, इसलिए भी कि काला धन ढूंढ़ने के लिए ऐसे अधिकारी तैनात किए गए हैं, जो खुद भ्रष्ट हैं अक्सर। सो, मोदी के इरादे नेक होंगे, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है।  राहुल गांधी शुरू से मोदी की आर्थिक नीतियों की आलोचना करते आए हैं, कभी उनको सूट-बूट की सरकार का ताना देकर तो कभी उनको गरीबों का दुश्मन और अमीरों का दोस्त कह कर, लेकिन आज अगर उनकी बातें सुन रहे हैं गुजरात के मतदाता तो सिर्फ इसलिए कि वे खुद परेशान हैं। परिवर्तन के नाम पर दिया था उन्होंने मोदी को वोट 2014 में, लेकिन जिस परिवर्तन की उम्मीद कर रहे थे अपने आम जीवन में वह परिवर्तन था स्कूलों, अस्पतालों में, रोजगार में। इन क्षेत्रों में परिवर्तन क्यों इतना धीरे आ रहा है?

 

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