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यह बवंडर भला क्यों?

कितनी अजीब बात है कि साहित्यकारों की क्रांति का मकसद था यह साबित करना कि उनकी बोलने की आजादी, उनकी सेक्युलर सोच को खतरा है मोदी सरकार से और साबित हुआ कुछ और।

Author October 18, 2015 11:54 AM

कितनी अजीब बात है कि साहित्यकारों की क्रांति का मकसद था यह साबित करना कि उनकी बोलने की आजादी, उनकी सेक्युलर सोच को खतरा है मोदी सरकार से और साबित हुआ कुछ और। साबित हुआ उनके पुरस्कार लौटाने के बाद कि जितनी आजादी उनको आज है अपनी बात कहने की, शायद ही पहले कभी थी। भूले-बिसरे बुजुर्ग लेखकों ने पुरस्कार क्या लौटाए कि उनके नाम अखबारों की सुर्खियों में दिखने लगे और उनके चेहरे टीवी की चर्चाओं में। उनकी बातें चाहे बेतुकी क्यों न हों, उनको पूरा मौका मिला कहने का। बेतुकी बातें बहुत हुर्इं। कई बुजुर्ग लेखकों ने कहा कि देश का माहौल आज इतना बिगड़ गया है कि इमरजेंसी से भी ज्यादा खराब हो गया है मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद। अच्छा जी?

क्या भूल गए हैं ये बुजुर्ग क्रांतिकारी कि यह बात अगर इमरजेंसी में कहते तो सीधे जेल में बंद हो जाते? क्या भूल गए हैं कि उस समय कैदखानों में बंद थे कई लेखक, कवि और पत्रकार जिनका अपराध सिर्फ यह था कि उन्होंने इंदिरा गांधी की तानाशाही का विरोध करने की हिम्मत दिखाई थी? क्या भूल गए हैं कि अखबारों पर सेंसरशिप इतनी सख्ती से लगी थी उस समय कि भारत के आम लोग बीबीसी रेडियो को सुना करते थे यह जानने के लिए कि उनके अपने देश के अंदर क्या हो रहा है?

सच पूछिए तो मुझे इन साहित्यकारों की बातें सुन कर ताज्जुब हुआ इस बात को लेकर कि इन लोगों ने इतनी शोहरत हासिल की तो कैसे। न ही मोदी सरकार पर लगाए गए इनके इल्जाम सच साबित हुए हैं और न ही इनकी इतिहास की समझ। जितने भी पुरस्कार लौटाने वाले लेखक थे उन सबने साहित्य अकादेमी और मोदी सरकार से अपनी नाराजगी के दो कारण बताए। एक यह कि एमएम कुलबर्गी जैसे रौशन खयाल लेखकों की हत्याएं हिंदू कट््टरपंथी कर रहे हैं और प्रधानमंत्री उनको रोकने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। और दूसरा कि दादरी के बिसहड़ा गांव में जो शर्मनाक हत्या हुई मोहम्मद अखलाक की, उसके बाद मोदी मौन रहे।

माना कि मोदी को चुप नहीं रहना चाहिए था इस हत्या के बाद, लेकिन क्या हमारे देश के ये महान बुद्धिजीवी इतिहास को बिल्कुल भूल चुके हैं? भूल गए हैं क्या कि इमरजेंसी के दौरान दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके में क्या हुआ था? मुगल जमाने की इस बस्ती पर जब इंदिरा गांधी ने बुलडोजर चलवाए थे तो दंगे फैल गए थे पुरानी दिल्ली की गलियों में इस अफवाह के कारण कि नगरपालिका के आला अधिकारियों ने यह कह कर बस्ती बरबाद की कि ‘दूसरा पाकिस्तान’ नहीं बनने देंगे।

मेरे पास भारत में हुए तमाम सांप्रदायिक दंगों-कत्लेआम की एक फेहरिस्त है, जो आसानी से आपको मिल जाएगी गूगल से, सो मैं मरने वालों के आंकड़े नहीं बताऊंगी लेकिन इस फेहरिस्त से कुछ शहरों के नाम पेश करती हूं, जहां दंगे हुए हैं पिछले चालीस वर्षों में। तुर्कमान गेट, मारिचझापी, मुरादाबाद, मंडई, नेल्ली, दिल्ली, मलियाना, हाशिमपुरा, भागलपुर, गावकदल, बंबई, बीजबेहारा, सोपोर, गोधरा, नरोदा पाटिया। इन दंगों में ज्यादातर मुसलमान या सिख मारे गए थे, लेकिन इनके बाद एक भी साहित्यकार ने अपने सरकारी पुरस्कार लौटाने की कोशिश नहीं की। तो आज क्या हो गया है भारत में, जो पहले नहीं हुआ था कभी? एक शब्द में: मोदी।

सच तो यह है कि हमारे महान बुद्धिजीवियों को नरेंद्र मोदी के नाम से नफरत है। याद कीजिए कि इन लोगों ने लोकसभा के चुनाव परिणाम आने से पहले ही चिट्ठियां लिखना शुरू कर दी थी कि मोदी अगर प्रधानमंत्री बन गए तो देश बरबाद हो जाएगा। इनकी बातों में और कांग्रेस पार्टी के बड़े नेताओं की बातों में उन्नीस-बीस का भी फर्क नहीं था उस समय, और न अब दिखता है। बिल्कुल वैसे जैसे कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता रोज टीवी पर कहते हैं कि मोदी सरकार ने सांप्रदायिकता फैला दी है देश भर में, यही बात पुरस्कार वापस करने वाले साहित्यकारों ने बार-बार कही है।

इनका पूरा साथ दिया है सेक्युलर पत्रकारों ने, जिनको भी मोदी से इतनी नफरत है कि प्रधानमंत्री क्या बने कि इन लोगों ने कोशिश शुरू की देश के माहौल में सांप्रदायिकता का जहर घोलने की। हर छोटी घटना को बड़ा बना कर पेश किया गया है पिछले साल में। किसी ने गिरिजा घर की खिड़की का शीशा तोड़ दिया तो सुर्खियां बन गई हैं, गिरिजा घर में चोरी अगर हुई तो वह भी सुर्खियों में आ जाती है। रही बात घर वापसी आंदोलन की तो इसको इतना बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया है कि जैसे सिर्फ मोदी के आने के बाद यह आंदोलन चला है। सच तो यह है कि आरएसएस यह आंदोलन बरसों से चला रहा है, लेकिन सुर्खियां बनी हैं सिर्फ पिछले एक साल में।

साहित्यकारों की इस क्रांति के बाद ऐसा लगने लगा है कि जैसे देश के सेक्युलरवादी लोगों को सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात से है कि मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद क्यों नहीं देश भर में अशांति का माहौल बना। वह भी इसके बावजूद कि हर छोटी-मोटी घटना का दोष मोदी पर लगाया गया है। यहां तक कि कुलबर्गी, गोविंद पानसरे और नरेंद्र दाभोलकर की हत्याओं का भी दोष प्रधानमंत्री पर लगाया गया है। यहां भी क्रांतिकारी लेखकों और कांग्रेस प्रवक्ताओं की भाषा बिल्कुल एक है। क्या यह सिर्फ इत्तेफाक है?
साहित्यकारों की क्रांति शुरू की थी पंडित नेहरू की भानजी ने। क्या यह भी सिर्फ इत्तेफाक है? नयनतारा सहगल से जब मोदी के बारे में टीवी पर सवाल पूछे गए तो उनका जवाब अक्सर था कि हिटलर भी चुनाव जीते थे। क्या इस जवाब में छिपा हुआ नहीं है साहित्यकारों की इस क्रांति का असली कारण? भारत के प्रधानमंत्री जब उनकी नजरों में हिटलर हैं, तो क्यों न उसकी मुखालफत हो? तवलीन सिंह

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