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वक्त की नब्ज- भुलाने की कोशिश में दर्द बढ़ता गया

इस प्रयास में मैंने खुद जाकर मेरठ-मलियना के दंगे देखे। मुरादाबाद, भागलपुर और मुंबई के दंगों को भी मैंने अपनी आंखों से देखा है और सिखों का जब 1984 में कत्लेआम हुआ था, तो कई दिन दिल्ली की सड़कों में घूमी।

2002 गुजरात दंगे की फाइल फोटो (Express archive)

एक विडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ पिछले हफ्ते, जो इतना डरावना था कि देखना बहुत मुश्किल था मेरे लिए। विडियो में एक व्यक्ति आखिरी सांसें लेता हुआ दिखाया गया है, खून से लथपथ, दर्द से कराहता हुआ और उसके दोनों कटे हुए हाथ उसके घुटनों के बीच रखे हुए हैं। जिसने मुझे यह विडियो भेजा उसने बताया अपने ईमेल में कि पीड़ित व्यक्ति संघ का एक कार्यकर्ता है तिरुवनंतपुरम से और उसके हत्यारे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता हैं, जिनको शरण मिलती है केरल की मार्क्सवादी सरकार से। मुझे इसलिए भेजा गया था यह विडियो कि मुझसे हिंदुत्ववादियों को शिकायत है कि मैं सिर्फ तब आंसू बहाती हूं जब गोरक्षकों के हाथों किसी मुसलमान की हत्या होती है। सच तो यह है कि मुझे जाति और धर्म के नाम पर हर किस्म की हिंसा से नफरत है। जबसे पत्रकार बनी, तबसे मेरी कोशिश रही है कि मैं इस किस्म की हिंसा की हर घटना की तफतीश खुद जाकर करू, सो उस सेक्युलर जमाने में जब हर वर्ष कोई बड़ा दंगा होता था, मैं खुद लोगों से मिल कर समझने की कोशिश करती थी कि इतनी नफरत, इतना द्वेष क्यों है लोगों में कि छोटे बच्चों को जान से मार डालते थे सिर्फ इसलिए कि उनको बच्चे के मां-बाप के मजहब से शिकायत थी। इस प्रयास में मैंने खुद जाकर मेरठ-मलियना के दंगे देखे। मुरादाबाद, भागलपुर और मुंबई के दंगों को भी मैंने अपनी आंखों से देखा है और सिखों का जब 1984 में कत्लेआम हुआ था, तो कई दिन दिल्ली की सड़कों में घूमी। लेकिन आज तक समझ नहीं पाई कि आम इंसान कैसे दरिंदे बन जाते हैं।

पहली बार अगर थोड़ी-सी समझ में आई ऐसी हिंसा तो बर्लिन में, जहां कोई दो हफ्ते पहले जाना हुआ। बर्लिन अगर आप टूरिस्ट बन कर भी जाते हैं तो आपको याद दिलाया जाता है हर दो कदम पर उस जुल्म का, जो हिटलर ने यहूदियों पर ढाया था। सो, बतौर एक विदेशी टूरिस्ट मुझे पहले दिखाया गया कब्रिस्तान के रूप में वह स्मारक, जो ब्रैंडेनबर्ग गेट के पास बना है। बर्लिन के बिल्कुल बीच में चार एकड़ चौड़े मैदान में बना यह स्मारक, जहां कंक्रीट की कब्रें याद दिलाती हैं उन लाखों यहूदियों की, जिनको हिटलर के नाजी दौर में बर्बरता से मारा गया था, सिर्फ इसलिए कि वे यहूदी थे। बर्लिन का शायद ही कोई हिस्सा है आज, जहां उस नाजी दौर की याद ताजा रखने के लिए कोई स्मारक न हो। यहां तक कि रात को जब खाना खाने गई एक प्रसिद्ध रेस्तरां में, तो मालूम हुआ कि वहां एक यहूदी लड़कियों के लिए स्कूल हुआ करता था कभी।कहने का मतलब यह कि जहां हम भारत में सांप्रदायिक हिंसा में मरने वालों को भुलाने की कोशिश करते हैं, जर्मनी में याद रखने की कोशिश रहती है, ताकि दुबारा ऐसा जुल्म कभी न हो। तो क्या हम भुलाने की कोशिश करके गलती करते आए हैं? इस सवाल की अहमियत आजकल इसलिए बढ़ गई है कि जब भी गोरक्षकों द्वारा की गई हिंसा की कोई नई घटना सामने आती है, तो हिंदुत्ववादी खुल कर कहते हैं कि वे बदला ले रहे हैं उस हिंसा का, जो मुसलिम हमलावरों ने सदियों पहले की थी हिंदुओं के साथ।

यह भी कहते हैं कि स्वतंत्रता के बाद जो कांग्रेस का सेक्युलर राज रहा है, उसमें उनको कभी मौका नहीं मिला अपना क्रोध व्यक्त करने के लिए, सो अब कर रहे हैं, क्योंकि पहली बार देश की बागडोर एक ऐसे प्रधानमंत्री के हाथों में है, जो गर्व से अपने आप को हिंदू कहते हैं, जो पूरी श्रद्धा से गंगा आरती करते हैं बनारस में और जिनको ज्यादातर देश के मुसलिम भय की नजरों से देखते हैं। संघ के वरिष्ठ नेताओं से जब भी मैं बात करती हूं तो बेझिझक मुझे बताते हैं कि उनको अच्छा लगता है कि हिंदू अब मुसलमानों को मारने की हिम्मत दिखा रहे हैं। सवाल है कि कब तक लेते रहेंगे हम खून का बदला खून से? सवाल यह भी है कि ऐसी हिंसा होती रहती है अगर तो क्या भारत एक बार फिर नहीं टूटेगा धर्म-मजहब के नाम पर?
सो, क्या पुराने जख्मों को भुलाने के बदले बेहतर न होगा कि उनको याद करने की कोशिश हो, ताकि याद करने से इन जख्मों को भरने का काम किया जाए? सच तो यह है कि मैं नहीं जानती कि प्रधानमंत्री हिंदू-मुसलिम तनाव को खत्म करना चाहते हैं या नहीं, लेकिन इतना जानती हूं कि अगर चाहते हैं कि भारत के इन दोनों सबसे बड़े समुदायों में हमेशा के लिए शांति हो जाए तो उनको शांति लाने का जरिया ढूंढ़ना होगा। एक जरिया यह हो सकता है कि धर्मगुरुओं का एक सम्मेलन बुलाया जाए, जिसमें मौलवी भी हों और पंडित भी और जिसमें उन लोगों को भी भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाए, जिन्होंने ठेका ले रखा है अपनी कौम को सुरक्षित रखने का। संघ परिवार के लोग भी आएं और जमाते-इस्लामी के भी और आमने-सामने बैठ कर तय करें कि पुराने जख्म और पुरानी नफरतें कम करने के लिए क्या करना चाहिए।हिंदुओं की एक शिकायत यह है कि इतिहास की किताबों में मुसलिम दौर पर ध्यान ज्यादा दिया गया है सेक्युलरिजम के नाम पर और प्राचीन भारत की उपलब्धियों पर कम, सो इसकी बातें हों। मुसलमानों को शिकायत है कि उनको दूसरे दर्जे के नागरिक बनाने की कोशिश की जा रही है, तो इसकी भी बातें हों। भूल जाने के बदले याद रखने का काम हो, शायद याद करना ही असली दवा बन जाए।

 

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