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वक्त की नब्ज: चुनौतियों के इस वक्त में

आगे की रणनीति तय करना आसान नहीं है दुनिया के राजनेताओं के लिए, क्योंकि इतने बड़े संकट का सामना शायद ही किसी ने पहले किया होगा। लेकिन यह भी सच है कि संकट के समय ही असली परीक्षा होती है नेतृत्व की।

तबलीगी जमात के मरकज में शामिल हुए लोगों के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद से पूरे देश में हड़कंप है।

एक अरसे से पत्रकार रही हूं, लेकिन पहली बार ऐसा समय देखने को मिल रहा है, जब विश्व के सारे देश एकजुट होकर एक दुश्मन का सामना कर रहे हैं। दुश्मन अदृश्य है और खतरा पूरी मानव जाति को है। जिन लोगों ने दूसरे विश्वयुद्ध को देखा है, वे बताते हैं कि उस युद्ध के बाद पहली बार दुनिया के सामने इतनी बड़ी कठिनाई आई है, जिसका सामना हम सबको मिल कर करने की जरूरत है। मुसीबत की इस घड़ी में जब तबलीगी जमात के मौलाना साद का कोरोना पर दिया गया भाषण सुनने को मिलता है तो यकीन नहीं होता कि ऐसे लोग भी हैं हमारे बीच।

मैंने भाषण को यूटूब पर खोजा आरिफ मोहम्मद का बयान आज तक पर सुनने के बाद। केरल के राज्यपाल ने अपने इस बयान में कहा कि इस भाषण को तबलीगी जमात के मुखिया ने उस सम्मेलन में दिया था दिल्ली स्थित मरकज में, जहां इकट्ठा हुए थे तबलीग के हजारों मौलवी देश भर से और विदेशों से भी। गवर्नर साहब ने कहा कि इस भाषण को यूट्यूब पर सुना है कोई अस्सी हजार लोगों ने और इसमें मौलाना ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मुसलमानों को कोरोना से कोई खतरा नहीं है, सो मस्जिदों में जाकर नमाज पढ़ते रहें और अगर किसी की मौत हो भी जाती है किसी मस्जिद में, तो इससे अच्छी मौत नहीं हो सकती है। यानी फौरन जन्नत नसीब हो जाएगी उनको, जो मस्जिदों में अपनी जान गंवाते हैं नमाज पढ़ते समय।

जब तक मैंने भाषण ढूंढ़ना शुरू किया तब तक गायब कर दिया गया था मरकज की वेबसाइट से और मौलाना साद खुद गायब हो गए हैं, लेकिन मुझे इंडिया टुडे के एक साथी ने ढूंढ़ कर भेजा। सुना इस भाषण को, तो रोंगटे खड़े हो गए। मौलाना कहते हैं कि वायरस से ज्यादा खतरा उन लोगों से है, जो मुसलमानों को मस्जिदों में नमाज पढ़ने से रोकना चाहते हैं। वीडियो पर उनके भाषण के बीच लोगों के खांसने की आवाज सुनाई देती है। इस सम्मेलन से जब मौलवी वापस लौटे अपने घर, तो साथ लेकर गए देश भर के शहरों तक कोरोना, जिसने तीन सौ से ज्यादा लोगों को बीमार कर दिया जिनमें से कुछ लोग मर चुके हैं।

इस लापरवाही की जिम्मेदारी तो तबलीग की जाहिर तौर पर है ही, लेकिन यह भी पूछना जरूरी है कि दिल्ली पुलिस की भी जिम्मेवारी बनती है कि नहीं? अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन था यह, जिसकी इजाजत लेनी पड़ती है गृह मंत्रालय से, सो क्या गृहमंत्री की जवाबदेही भी बनती है कि नहीं? गंभीर सवाल हैं ये, जिनका जवाब अभी तक भारत सरकार से मिला नहीं है। व्यस्त हैं भारत सरकार के आला अधिकारी मीडिया पर प्रतिबंध लगाने में। पिछले सप्ताह मामला सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा और आदेश आया कि प्रतिबंध नहीं लगेंगे, लेकिन मीडिया को जिम्मेदारी से खबरें देनी चाहिए इस महमारी के बारे में।

मैं महाराष्ट्र के उसी गांव में हूं जहां थी, जब प्रधानमंत्री ने पूर्ण बंदी का एलान किया इक्कीस दिन के लिए। जबसे यह बंदी शुरू र्हुुई है, गांव में एक भी अखबार नहीं आया है। इस अखबार को आॅनलाइन पढ़ लेती हूं मैं अपने फोन पर, लेकिन जिन लोगों के पास आॅनलाइन जाने की सुविधा नहीं है उनको खबरें मिलती हैं एक-दूसरे से, अफवाहों से। सो, आज खबर है कि मुंबई से कुछ लोग आए थे किसी बारात में और जब वापस मुंबई पहुंचे और बीमार पड़े, तो उनकी जांच की गई करोना के लिए और जांच पॉजिटिव निकली हैं। खौफ-सा फैला हुआ है गांव में इस खबर के बाद, बावजूद इसके कि यह खबर किसी दूसरे गांव से आई है, किसी पड़ोसी जिले से। इस जिले में अभी तक एक भी व्यक्ति कोरोना का शिकार नहीं हुआ है। लेकिन ऐसा कब तक रहेगा?

लोग चाहते हैं कि बंदी इक्कीस दिन बाद समाप्त कर दी जाए, क्योंकि लोग वायरस से नहीं मरेंगे, तो आर्थिक मंदी से मर जाने का खतरा है। इस जिले में बंदी इतनी सख्ती से लगाई गई है कि एक गांव से दूसरे गांव तक भी जाना मुश्किल है। सब दुकानें, सब कारोबार बंद हैं। इस गांव में कमाई होती है अक्सर मुंबई से आने वाले पर्यटकों से, जो आजकल बिलकुल नहीं आ सकते हैं। जिनकी कमाई पर्यटन से नहीं, मछली बेचने से होती है वे भी इन दिनों खाली बैठे हैं, क्योंकि मछुआरे अपना काम-धंधा बंद किए हुए हैं। अभी तक तो किसी न किसी तरह गुजारा कर रहे हैं लोग, लेकिन सब मानते हैं कि इक्कीस दिन बाद अगर प्रधानमंत्री ने फिर से शाम को आठ बजे एलान किया कि रात बारह बजे के बाद बंदी लंबी चलेगी, तो मुसीबत बीमारी से कम और भूखे मरने के डर से ज्यादा होने वाली है।

सब मानते हैं कि समस्या गंभीर है, लेकिन साथ में यह भी मानते हैं कि बंदी लंबी चली तो कई छोटे कारोबार बिलकुल ठप हो जाएंगे। मुंबई से खबर आई है कि छोटे कारोबारियों से लेकर बड़े उद्योगपतियों को भी यही डर सताने लगा है। सो, सब चाहते हैं कि उन जगहों पर जहां संक्रमण ज्यादा फैला है, वहीं बंदी रहे, पूरे देश में नहीं। इस पर निर्णय लेना होगा प्रधानमंत्री को मुख्यमंत्रियों से सलाह-मशविरा करने के बाद। फैसला अगर लेते हैं बंदी लंबी खींचने की, तो उम्मीद है कि इस बार चार घंटों से ज्यादा समय देंगे, ताकि लोग थोड़ी-बहुत तैयारी कर सकें कर्फ्यू में रहने के लिए।

आगे की रणनीति तय करना आसान नहीं है दुनिया के राजनेताओं के लिए, क्योंकि इतने बड़े संकट का सामना शायद ही किसी ने पहले किया होगा। लेकिन यह भी सच है कि संकट के समय ही असली परीक्षा होती है नेतृत्व की।

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