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बाखबर: अपने गोपीचंद अपने जासूस

लगता है, सुशांत मामले के बाद कुछ चैनल स्वयं को ‘एक दल’ या ‘एक सरकार’ समझने लगे हैं कि अगर किसी को कुछ करना है, तो पहले उनके एंकरों से ‘ओके’ ले, फिर कुछ करे! चैनल न हुए ‘समांतर सरकार’ हो गए और एंकर ‘गोपीचंद जासूस’!

पिछले कुछ सालों से मीडिया का रवैया खुद ही कोर्ट बनने जैसा हो गया है।

उसे काम की कोई कमी न थी, उसके प्रति किसी ने पक्षपात नहीं किया।’ एक सहेली ने बालीवुड का बचाव किया और एंकर ने मुंडी हिलाई! लेकिन नित्य के ‘कंगारू कोर्ट’ बने चैनल कहां मानने वाले? वे सर्वाेच्च न्यायालय के फैसले के दिन सुबह से लगे रहे और अदालत के समांतर फैसला सुनाते रहे कि आशा है कि अदालत का फैसला एक सौ तीस करोड़ जनता की भावनाओं का ध्यान रखेगा! अदालत को तो बख्शिए भाई, या कि आप उसकी कलम पर ही न बैठ जाना?

और जैसे ही अदालत ने मामले को सीबीआइ को सौंपने का फैसला दिया, समांतर अदालत लगाने वाले एंकरों-रिपोर्टरों के चेहरे दिपदिपाने लगे, मानो उन्हीं की जीत हुई हो। एक एंकर देर तक जोर-जोर से अकेला ही ताली बजाता दिखा। एक वकील साहब उमगे कि उनका मन आज नाचने को कर रहा है! गनीमत कि नाचे नहीं!

उसके बाद एंकर-वंदना शुरू हो गई कि हे एंकर भगवन, आप न होते तो ये न होता, सब आपकी लीला! (बस हमें अपने शो में इसी तरह बुलाते-दिखाते रहना।) एंकर-प्रभु हाथ जोड़ कर सभी को धन्यवाद देते रहे! एक आहत परिवार और चंद धंधई एंकरों की न्याय की मांग इस सुबह एक सौ तीस करोड़ जनता की मांग बना दी गई (जबकि सारे चैनलों की दर्शक जनता मिल कर भी एक सौ तीस करोड़ नहीं बैठती)। और फिर यही मांग ‘सारे देश’ की और फिर ‘सारी दुनिया’ की मांग बना दी गई!

धंधा चैनलों का और नाम जनता का! इसे कहते हैं : जनता नाम की लूट है, लूटी जाय सो लूट! ऐसी लूट कि जनता के कोड़े से बाकी आवाजों को दबा दो और अपना उल्लू सीधा करो! एक चैनल फिर भी फैसले को लेकर किसी न किसी से कुछ किंतु परंतु लगवाता रहा, लेकिन ‘अपने न्याय’ का हल्ला करने वाले चैनल महाराष्ट्र पुलिस पर हल्ला बोलते रहे।

लेकिन यह भी किसी हद तक सच है कि उसी हल्लाबोल एंकर ने इस मामले को लेकर सबसे अधिक जोरदार तरीके से अपनी सबसे लंबी अदालत चलाई और इसीलिए उसके कुछ स्थायी चर्चक-चंपुओं ने उसे मुक्तकंठ से बधाई दी, जैसे कि उसी ने केस जीता हो! एंकर ने भी खुश होकर हाथ जोड़ कर उनको धन्यवाद दिया, यानी ‘अहो रूपं अहो ध्वनिम्’!

फैसला आते ही शिवसेना प्रवक्ता को शेरो-शायरी सूझी, तो दूसरी ओर भाजपा के एक प्रवक्ता की भी काव्य प्रतिभा जाग गई। सेना के प्रवक्ता ने जैसे ही कहा कि ‘बात निकलेगी तो दिल्ली तक जाएगी’ त्यों ही एंकर ‘दिल्ली तक जाएगी’ को ‘डिकंस्ट्रक्ट’ करने में लग गए। उधर भाजपा प्रवक्ता ने ‘रिया’ में ‘यमक’ के दर्शन करके एक तुकबंदी ही मार दी कि एक दिन महाराष्ट्र सरकार जा ‘रिया’ है, ये जा ‘रिया’ है और वो जा ‘रिया’ है… पुरानी दिल्ली की ‘आ रिया जा रिया’ वाली हिंदी इसी तरह कुछ देर चैनलों को हंसाती नजर आई! लेकिन जब शिवसेना प्रवक्ता ने दूसरा शेर मारा कि ‘हमने बारिशों में जलते मकान देखे हैं’ तो कई एंकर बगलें झांकने लगे कि ‘जलते मकान’ का मतलब ‘किसका मकान’! क्या करें ‘लक्षणा-व्यंजना’ में तो एंकरों का हाथ पहले से ही तंग है!

इसी बीच तुर्की की प्रथम महिला से आमिर खान की मुलाकात की तस्वीरों ने कई खबर चैनलों को देशभक्ति की याद दिला दी। अपनी नई फिल्म ‘लालसिंह चढ्ढा’ को फिल्माने तुर्की गए आमिर खान तुरंत ‘देश-विरोधी’ हो गए। चैनलों ने आमिर खान की फाइल ही खोल दी कि आमिर ने कब कब ‘देश के विरुद्ध’ क्या क्या बोला है और कि आज देश के दुश्मन पाक के पक्षधर, कट्टर इस्लामिस्ट राष्ट्रपति एर्दाेगन की पत्नी से मिलने गए हैं… धिक्कार है। एक हिंदू नेता धमकाने लगे कि सोचना पड़ेगा कि वो वहां क्या कर रहे हैं… आप देश की इज्जत से नहीं खेल सकते! सिर्फ तारिक अनवर ने जरूर संतुलित सुर लगाया कि अगर तुर्की से कूटनीतिक संबंध न होते तो उनका जाना गलत होता…

भाई जी! आमिर ने अगर देश-विरोधी कुछ किया है तो आप मुकदमा चलाइए, सजा दीजिए। आमिर का पक्ष जाने बिना एकतरफा अभियान तो न चलाइए!

लगता है, सुशांत मामले के बाद कुछ चैनल स्वयं को ‘एक दल’ या ‘एक सरकार’ समझने लगे हैं कि अगर किसी को कुछ करना है, तो पहले उनके एंकरों से ‘ओके’ ले, फिर कुछ करे!
चैनल न हुए ‘समांतर सरकार’ हो गए और एंकर ‘गोपीचंद जासूस’! अब आगे की कहानी ‘गोपीचंद जासूस’ ही कहेंगे।

इसीलिए, सीबीआइ की टीम ज्यों ही मुंबई उतरती है कि चैनलों के गोपीचंद जासूसों के रिपोर्टर उनके पीछे पड़ जाते हैं कि आप किस तरह जांच शुरू करने वाले हैं? अपने गोपीचंदों के लिए सीबीआइ, सीबीआइ न हुई भगवान हो गई! वो तो एक पुराने सीबीआइ अफसर ने हमारा ज्ञानवर्धन किया कि सीबीआइ जांच तो कर लेती है, लेकिन सजा कितनों को दिला पाती है, यह देखने की बात है!

बहरहाल, सीबीआइ के आते ही कुछ ‘गोपीचंद’ रूपी एंकरों ने सुशांत की मौत की कहानी दुबई के ‘दाउद गैंग’ से जोड़ दी और इस तरह जिनके नाम अब तक आरोपित हुए उन सबके बचने का रास्ता खोल दिया! इसे कहते हैं निर्णायक मोड़, लेकिन एक चैनल को छोड़ किसी दूसरे चैनल पर यह कहानी नहीं दिखी! इसलिए यह कहानी एक क्षेपक ही रही! जाहिर है, जब तक अपने यहां गोपीचंद जासूूस हैं, तब तक क्षेपक भी मूल कहानी की तरह बिकेंगे।
सिर्फ एक हमदर्द चैनल ने ‘अवमानना’ के मामले में अदालत द्वारा एक बड़े वकील साहब को माफी मांगने का आदेश देने की बाबत उनके मार्फत लाइन लगाई कि वे माफी नहीं मागेंगे! अब देखना ही होगा कि वकील साहब का ‘ईगो’ बड़ा है या अदालत का कानून?

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