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वर्षा जल की जगह

गांवों में वर्षा जल संचयन के द्वारा ज्यादा से ज्यादा पानी एकत्र किया जा सकता है, जिससे सिंचाई करके किसान अपने काफी खर्च को बचा सकते हैं। इसकी मदद से साथ ही ज्यादा बोरवेल वाले क्षेत्रों में भूजल के स्तर को गिरने से रोका जा सकता है।

Author Published on: September 22, 2019 2:23 AM
विश्व भर में जल की कमी एक बड़ा संकट बनती जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण भूजल के स्तर का लगातार नीचे जाना भी है। इसके लिए बारिश के समय जो वर्षा जल बह कर सागर में मिल जाता है, उसका संचयन करके और उचित प्रबंधन करके भूजल का पुनर्भरण किया जाना बहुत आवश्यक है।

दीपक कुमार त्यागी

जल जीवन के लिए अमृत है और इसके बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना करना संभव नहीं है। आज समय की मांग है कि हम सभी को वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए जल संरक्षण और उसके उचित प्रबंधन पर तेजी से कार्य करना होगा। आज देश में प्राकृतिक स्वच्छ जल स्रोतों का अस्तित्व तेजी से सिमटता जा रहा है और देश में अंधाधुंध भूजल दोहन के चलते अब यह स्थिति हो गई है कि नदियों की गोद में आबाद क्षेत्रों में भी स्वच्छ पेयजल की किल्लत होने लगी है। यों हमारे देश में भविष्य में भीषण पेयजल संकट और लातूर जैसे हालत पैदा न हों, इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों के स्तरों पर देश में विभिन्न जल परियोजनाएं शुरू की हैं। लेकिन अभी ये प्रयास नाकाफी हैं।

हालात पर नजर डालें तो पिछले लगभग सौ वर्ष के दौरान विश्व में जल संचयन और प्रबंधन के मामले में लोगों की आदत में दो बड़े बदलाव समय के साथ हुए हैं। पहला, आम लोगों और समुदायों ने अब जल संचयन और उसके उचित प्रबंधन से अपने हाथ खींच लिए है और सरकार को यह जिम्मेदारी सौंप दी गई है। जबकि पहले आम लोग पानी का संचयन और इंतजाम खुद करते थे। यह चलन विश्व भर में अब पूरी तरह समाप्त हो गया है। दूसरे, वर्षा जल के इस्तेमाल और इकट्ठा करने के आसान तरीकों में अब काफी कमी आई है, जबकि अब बांधों के माध्यम से नदियों, नल और नलकूपों के माध्यम से भूजल का बहुत तेजी के साथ रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए दोहन किया जाने लगा और इन्हें ही सभी लोगों को जल प्रदान करने का मुख्य स्रोत बना दिया गया। आकड़ों के अनुसार नदियों और जलाशयों का जल वर्षा के जल का एक छोटा-सा हिस्सा भर है। जबकि उन पर सभी को पानी पिलाने का दबाव दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है, जो भविष्य के लिए ठीक नहीं हैं। लेकिन हम अव्यवस्थित विकास की आंधी दौड़ में लगातार प्राकृतिक संतुलन को अपने ही हाथों से बिगाड़ते जा रहे हैं।

भारत में हालत यह है कि देश में तेजी से बढ़ती जनसंख्या के चलते पानी की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है। बढ़ती मांग के चलते भारत में भी पानी का संकट हर वर्ष नई चुनौतियां पैदा कर रहा है, जिस पर अगर तत्काल ध्यान नहीं दिया गया तो स्थिति बेहद भयावह और विस्फोटक हो सकती है। आकड़ों पर नजर डालें तो भारत में विश्व की अठारह फीसद से अधिक आबादी है, लेकिन विश्व का केवल चार प्रतिशत नवीकरणीय जल संसाधन और विश्व के भूक्षेत्र का 2.4 प्रतिशत भूक्षेत्र उपलब्ध है। आज यहां लगभग पचपन प्रतिशत कुएं पूरी तरह सूख चुके हैं। पिछले दस वर्षों में भूजल स्तर में बहुत तेजी से कमी दर्ज की गई है, जलाशय सूख रहे हैं और नदियों में पानी के बहाव में दिनोंदिन कमी आ रही है। यह स्थिति तब है, जब देश में प्रतिवर्ष 1170 मिमी औसतन वर्षा होती है, जो विश्व के बहुत सारे देशों से बहुत अधिक है और पश्चिम अमेरिका से छह गुना अधिक है।

भारत के शहरी क्षेत्रों की दशा यह है कि अधिकतर लोगों को पीने का साफ पानी मुहैया करना सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है। वहां बढ़ते जल प्रदूषण के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में भी सत्तर फीसद लोग प्रदूषित जल पीने के लिए विवश हैं। लगभग तैंतीस करोड़ लोग देश में ऐसी जगह रहने को मजबूर हैं जहां हर साल सूखा पड़ता है। देश में होने वाली कुल वर्षा के पांच प्रतिशत जल का भी अगर संचयन कर लिया जाए तो करोड़ों लोगों, कृषि और उद्योगों की साल भर की पानी की आवश्यकता को पूरा किया जा सकता है। जल संचयन और उसके प्रबंधन के लिए आज हमें इजराइल जैसे छोटे देश से सीखना होगा, जहां वर्षा का औसत बहुत कम है, वहां भी सरकार और आम जनता के जागरूक होने और उन्नत तकनीक के इस्तेमाल के चलते लोगों का जीवन सुचारू रूप से चल रहा है। तो अंतरिक्ष तक अपनी तकनीक का डंका बजवाने वाला भारत यह काम क्यों नहीं कर सकता!

वर्षा जल संचयन की आवश्यकता इसलिए है कि आज भारत ही नहीं, बल्कि विश्व भर में जल की कमी एक बड़ा संकट बनती जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण भूजल के स्तर का लगातार नीचे जाना भी है। इसके लिए बारिश के समय जो वर्षा जल बह कर सागर में मिल जाता है, उसका संचयन करके और उचित प्रबंधन करके भूजल का पुनर्भरण किया जाना बहुत आवश्यक है, ताकि भविष्य के लिए भूजल संसाधनों का संवर्धन हो पाए। आज अकेले भारत में ही व्यवहार्य भूजल भंडारण का आकलन 214 बिलियन घनमीटर (बीसीएम) के रूप में किया गया है, जिसमें से 160 बीसीएम की फिर से प्राप्ति हो सकती है। इस जल संकट की ज्वंलत समस्या का एकमात्र समाधान है जल संचयन और उसका उचित प्रबंधन। पशुओं के पीने के पानी की उपलब्धता, फसलों की सिंचाई के विकल्प के रूप में वर्षा जल संचयन प्रणाली को विश्वव्यापी तौर पर अपनाया जाता रहा है। यह उन सभी स्थानों के लिए उचित है, जहां प्रतिवर्ष न्यूनतम 200 मिमी वर्षा होती हो, जिसके संचयन के लिए भारत में अपार संभावनाएं हैं।

हम वर्षा जल का संचयन ज्यादा से ज्यादा अलग-अलग जगहों में इकट्ठा करके कर सकते हैं, जैसे बांधों, कुओं और तालाबों आदि में। अलग-अलग जगहों में पानी का संचयन करने के कारण जमीन पर बह कर व्यर्थ जाने वाले वर्षा जल की मात्रा में कमी आती है, जिससे बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा को रोकने में और भूजल को रिचार्ज करने में स्वाभाविक रूप से मदद मिलती है। देश के औद्योगिक संस्थानों में संचयन किए हुए वर्षा जल का उपयोग कंपनी में करके हम भविष्य के लिए स्वच्छ भूजल की बचत कर सकते हैं।

गांवों में वर्षा जल संचयन के द्वारा ज्यादा से ज्यादा पानी एकत्र किया जा सकता है, जिससे सिंचाई करके किसान अपने काफी खर्च को बचा सकते हैं। इसकी मदद से साथ ही ज्यादा बोरवेल वाले क्षेत्रों में भूजल के स्तर को गिरने से रोका जा सकता है। सबसे अधिक जल कृषि क्षेत्र में ही इस्तेमाल होता है। वर्षा जल संचयन किसानों के लिए सबसे कारगर साबित हो सकता है, क्योंकि वर्षा के पानी को बचा कर ज्यादातर किसान गरमी के महीने में बहुत ही आसानी से पानी की किल्लत को दूर कर सकते हैं।

आज दुनिया आधुनिक टेक्नोलॉजी से जुड़ चुकी है। ऐसे में लोगों के बढ़ती जनसंख्या के कारण आज विश्व के हर एक क्षेत्र मे बड़ी-बड़ी इमारतों का निर्माण हो रहा है। यह बात तो साधारण है कि इन इमारतों के निर्माण के लिए सबसे ज्यादा पानी का उपयोग हो रहा है। ऐसे में वर्षा जल संचयन के माध्यम से बचाए हुए पानी को इन इमारतों के निर्माण में लगा कर कई प्रतिशत स्वच्छ पानी को बचा सकते हैं। पूरे वर्ष लोग आसपास की जमीन पर कचरा फेंकते हैं और बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां अपने कारखानों से निकली हुई जहरीली या रासायनिक पानी को पास के क्षेत्रों में निकाल देते हैं। लेकिन मुश्किल तब आती है जब बारिश का महीना आता है, क्योंकि बारिश होने पर वही रासायनिक पदार्थ और कचरा जमीन पर बहते हुए पानी से मिलता है और लोगों के खेतों, तालाबों और कुओं में जाकर गिरता है। ऐसे में ज्यादा से ज्यादा वर्षा के पानी को जमीन पर न बहने देकर उसे किसी अन्य स्थान पर इकट्ठा करके हम उपयोग में ला सकते हैं और अपने आसपास के जल स्रोतों को भी इन जहरीले रासायनिक तत्त्वों से दूर रख सकते हैं। हमें समझना होगा कि आज वर्षा जल के संचयन, उचित प्रबंधन और उसका ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करके भविष्य के लिए स्वच्छ जल के स्रोतों और भूजल को बचा सकते हैं।

 

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