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कुछ सत्य कुछ सुंदर

Author April 15, 2018 2:21 AM

कुछ सत्य कुछ सुंदर
जाने-माने शिक्षाविद और समाज-संस्कृति-विचारक कृष्ण कुमार द्वारा समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखे गए लेखों और टिप्पणियों के संग्रह ‘कुछ सत्य कुछ सुंदर’ में हमारे समय और समाज के जमीनी यथार्थ से जुड़े उन बुनियादी प्रश्नों और समस्याओं को उठाया गया है, जिनका निदान अपेक्षित है, मगर किया नहीं जा रहा है। भाषा, संस्कृति, समाज, पर्यावरण, स्त्री, गांव आदि से संबद्ध विविध पहलुओं पर विचार करते हुए कृष्ण कुमार लोक की भावभूमि पर खड़े होकर वैश्विक संदर्भों को देखते हैं, वैश्विक व्यवस्था जन-संस्कृति पर चस्पां नहीं करते। इसलिए वे देख पाते हैं कि विज्ञान की उपलब्धियों, प्रगति, विकास, स्वराज की प्रबंध-व्यवस्था से आम जन ने क्या पाया है, क्या खोया है। औपनिवेशिक मानसिकता, भूमंडलीकरण और बाजारवाद के प्रभाव-दबाव के चलते जन-सामान्य, किसान, कारीगर, स्त्री, बच्चों की स्थितियां सुधरने के बजाय व्यवस्था और उद्योग-तंत्र के जाल में फंसी हैं, इस तथ्य को इन लेखों में विभिन्न कोणों से उभारा गया है।

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मध्यवर्ग को औपनिवेशिक विरासत में मिली श्रेष्ठता की वह भावना भी यहां लेखक के निशाने पर है, जिसके चलते वह जन को सुधार कर सभ्य बनाने की आत्मछवि बनाए रखता है। लेखक की निगाह में एक ओर दलाई लामा और नेल्सन मंडेला का दीर्घकालीन अहिंसक प्रतिरोध है और गांधी की राह पर चलती मेधा पाटकर का नर्मदा बचाओ अभियान है, दूसरी ओर बनारस, कांजीवरम और कोयम्बटूर के बुनकरों की व्यथा-कथा है, जो वर्षों की श्रम साधना से अर्जित अपने कौशल के सॉफ्टवेयर में बदल जाने के कारण बेरोजगार होकर रिक्शा चलाने को मजबूर हैं, क्योंकि इनका साड़ी व्यापार चीन के हाथों में चला गया है।
हिंदी को अपनी पहली पहचान मानने वाले कृष्ण कुमार इस भाषा की सिकुड़ती संवेदना से चिंतित हैं, क्योंकि हिंदीभाषी इसे जीवन की विविध नई स्थितियां और बदलावों के अनुरूप ढालने और निखारने में लगने के साथ सक्रिय नहीं दिखाई दे रहे।
कुछ सत्य कुछ सुंदर : कृष्ण कुमार; सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन, एन-77, पहली मंजिल, कनॉट सर्कस, नई दिल्ली; 180 रुपए।
पहेली
ह मीरा सीकरी का अत्यंत विचारोत्तेजक और रोचक उपन्यास है। लेखिका ने मनोविज्ञान की सूक्ष्मता के साथ स्त्री-पुरुष संबंधों को विश्लेषित किया है, फिर ये रिश्ते मां-बेटा, भाई-बहन, पति-पत्नी कैसे भी हों। जीत और वरयाम भाई-बहन हैं, उनके बीच कोई ऐसा ‘मेंटल ब्लॉक’ है, जिसके कारण उनकी जिंदगी की विडंबना आकार लेती है।… यही पहेली है, जिसे मीरा सीकरी ने बेहद पठनीय कथा विन्यास में सुलझाया है। उपन्यास के खत्म होते-होते इसका एक जिंदादिल पात्र आरपी कहता है- ‘जिन भाई-बहन के असामान्य से दिखते संबंधों को न समझ पाने के कारण तुम इतना परेशान हो रही हो, ऐसे संबंधों की विविध छायाएं, जैसे- लेस्बियन, गेय पौराणिक काल से लेकर आज तक मिल जाएंगी। हमें उनकी उपेक्षा और अवज्ञा न कर उन्हें सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि से समझने की कोशिश करनी चाहिए।’ कहना न होगा कि मीरा सीकरी ने पूरी सहानुभूति के साथ पात्रों को चित्रित किया है। कोई पात्र नकारात्मक नहीं लगता। सब मन:स्थिति और परिस्थिति के दायरों में सांस ले रहे हैं।
जाहिर है, उन्यास में एक ‘मनोवैज्ञानिक तनाव’ व्याप्त है। इसके बावजूद रोचकता, उत्फुल्लता और पठनीयता से भरपूर यह रचना एक ही बैठक में पढ़े जाने के लिए विवश करती है। जब जटिल को सरल या बोधगम्य बनाना हो तो रचनाकार के पास सशक्त, बिंबधर्मी, पारदर्शी भाषा का होना जरूरी है। ‘अपरिपक्व उम्र की धुंधली स्मृतियों के अपूर्ण आभासों और अनुमान के आधार पर बीत गई (मृत कहने का मन नहीं होता उसका) जीत के व्यक्तित्व की गरिमा को खंडित करने का उसे कोई अधिकार नहीं।’ ऐसे अर्थपूर्ण विषय पर लिखने वाली लेखिका मीरा सीकरी ने इस उपन्यास में अंतर्मन के रहस्यों में विद्यमान ग्रंथियों को रेखांकित किया है।
पहेली: मीरा सीकरी; आर्य प्रकाशन मंडल, 24/4855-56, अंसारी रोड, दरियागंज, दिल्ली; 200 रुपए।
कांटा और अन्य कहानियां
हानी कहने की अपनी एक कला होती है, जो संभवत: अर्जित कम, स्वत: स्फूर्त अधिक होती है। कुंदनसिंह परिहार का कहानी कहने का अंदाज बहुत कुछ स्वत:स्फूर्त है। बड़े ही सहज भाव से वे कहानी को आगे बढ़ाते जाते हैं और एक सही स्थान पर लाकर छोड़ देते हैं। अंतत: पाठक अपने निष्कर्ष निकालता है और सहज सुख की अनुभूति प्राप्त करता है। भाषा की दृष्टि से भी परिहार की कहानियां उसी भाषा को बोलती हैं, जिन्हें उनको आवश्यकता है। इस संग्रह की कहानियां हमारे सामाजिक यथार्थ को बड़ी सहजता से सरल भाषा में, कहानी कहने की खूबसूरत कला के साथ प्रस्तुत करती हैं।
परिहार अपनी कहानियों में न सिर्फ चमक लाने वाली हर कारीगरी से बचते हैं, बल्कि यंत्रणादायक सामाजिक स्थितियों पर घटनात्मक टिप्पणी के पत्रकारिक लेखन के क्षणभंगुर प्रभाव से ही मुक्त हैं। ये कहानियां एक देखी-जानी दुनिया से परिचित कराती जान पड़ती हैं। यह रचना का वही आत्मीय प्रभाव है, जो पाठक और शेष संसार के बीच अंतरैक्य का अनुभव कराता है। महत्त्वपूर्ण यह भी है कि परिहार की कहानियां घटनाओं के सतही रोमांच से पूरी तरह बरी हैं। यो पूंजीवादी बाजार में कीमत उसी कथा की होती है जो कैक्टस की चुभन से बचाने के लिए सपनों की दुनिया में ले जाती है या छद्म बहादुरी में। परिहार की कहानियां बाजार की उल्टी दिसा में हैं, यानी उस दिशा में जहां कहानियां यथार्थ को बदलने की जरूरत का अहसास पैदा कराती हैं।
कांटा और अन्य कहानियां : कुंदन सिंह परिहार; साहित्य भंडार, 50, चाहचंद (जीरो रोड), इलाहाबाद; 300 रुपए।
बहत्तर धड़कनें तिहत्तर अरमान
मकालीन हिंदी कहानी में जिन रचनाकारों ने अपनी कहानियों में नई भाषा, मिजाज, अंदाज और रुख का भान कराया है, उनमें आकांक्षा पारे काशिव की भी कहानियां हैं। ‘बहत्तर धड़कनें तिहत्तर अरमान’ आकांक्षा पारे का कहानी संग्रह है। इन कहानियों में जिंदगी खुद-ब-खुद उतर आई है। इसमें नए जमाने का तनाव, खींचतान और कशमकश भी है। लेखिका ने कहानियों को जिस अंदाज में कहा है उससे कहानियां बिल्कुल भी अजनबी नहीं लगतीं। ये बहुत ही धीमे और संजीदा अंदाज में पाठक के भीतर उतरती चली जाती हैं। कहानियों की खूबी यह है कि इनमें जब पात्रों के शब्द चुक जाते हैं, तो वहां स्थितियों का मौन मुखर हो उठता है।
आकांक्षा पारे की कहानियां बदलते वक्त की जटिलता का आईना हैं। आज इंसान रोबोट इस्तेमाल कर रहा है। वह वक्त दूर नहीं जब रोबोट इंसान में तब्दील हो जाएगा। कहानियों में नष्ट होती मानवीय संवेदनाओं को बचाने की एक जिद लेखिका के साथ बनी हुई है। यहां नए स्त्री-पुरुष हैं, जिनकी नई दुनिया और उनकी अपनी हकीकत है। इसे ही कहानियों में उतारा गया है।
बहत्तर धड़कनें तिहत्तर अरमान : आकांक्षा पारे काशिव; सामयिक प्रकाशन, 3320-21 जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 250 रुपए।

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