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समांतर संसार : फरिश्तों के कातिल

सय्यद मुबीन ज़ेहरा उठो बेटा स्कूल को देर हो रही है। नहीं अम्मा आज ठंड हो रही है, नहीं जाऊंगा। स्कूल नहीं जाओगे तो जीवन में क्या करोगे। अम्मा एक दिन की बात है, आज स्कूल में कुछ खास नहीं होगा, आप सोने दीजिए। मैंने कहा न उठो, उठ रहे हो कि नहीं, हर दिन […]

Author December 21, 2014 1:41 PM

सय्यद मुबीन ज़ेहरा

उठो बेटा स्कूल को देर हो रही है। नहीं अम्मा आज ठंड हो रही है, नहीं जाऊंगा। स्कूल नहीं जाओगे तो जीवन में क्या करोगे। अम्मा एक दिन की बात है, आज स्कूल में कुछ खास नहीं होगा, आप सोने दीजिए। मैंने कहा न उठो, उठ रहे हो कि नहीं, हर दिन का मजाक बना लिया है।

यह दृश्य हर उस घर में सुबह दिखता है, जिनके बच्चे स्कूल जाते हैं। अक्सर माताएं बच्चों को उनकी मर्जी के खिलाफ स्कूल भेजती हैं। मगर पाकिस्तान में सोलह दिसंबर के उस काले दिन को जिन मांओं ने बच्चों की जिद के खिलाफ स्कूल भेजा होगा और वे जीवित लौट कर नहीं आए होंगे वे जीवन भर अपने को कोसती रहेंगी कि मैंने ऐसा क्यों किया? पर सवाल उन मांओं को अपने आप से नहीं, उन आतंकवादियों से करना होगा, जिन्होंने कुरान की पहली आयत ‘इक्रा’ यानी ‘पढ़ो’ पर चल रहे बच्चों को गोलियों से छलनी कर दिया और इसके लिए उन्हें कोई अफसोस भी नहीं है। वे कैसे पशु थे, जो इंसानों की तरह दो पैरों पर चलते हुए आए और एक सौ बत्तीस मासूम बच्चों की लाशें बिछा गए।

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सोलह दिसंबर को जब टेलीविजन पर पाकिस्तान से पेशावर के समाचार आने शुरू हुए तो हर मां बेचैन हो गई। हर संवेदनशील व्यक्ति आंसू बहाने लगा। यहां तक कि वे भी सोचने पर मजबूर हो गए, जिनके दिल बहुत मजबूत हैं कि आखिर क्या कोई इतना भी बेरहम हो सकता है। यह विचार ही अपने आप में बेचैन करने वाला है कि कोई इतना क्रूर कैसे हो सकता है। युद्ध के भी कुछ नियम होते हैं, कि मासूम बच्चों को नहीं मारा जाएगा। मगर वहां जो कुछ हुआ उससे यह साफ है कि आतंकवाद का कोई धर्म, कोई सिद्धांत नहीं होता। वह किसी भी नकाब में आता है और आतंक का नंगा नाच कर चला जाता है।

आतंकवाद आज हमारे समाज का एक ऐसा मसला बन गया है कि हम सब इसके आगे असहाय महसूस करते हैं। उन आवाजों को भी अब खामोश होना पड़ गया है, जिन्होंने इन्हें ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ के रूप में पहचान देने की कोशिश की। आतंकवाद का पालतू भेड़िया अब पिंजरे से निकल कर अपने मालिक को ही निगलने को तैयार है। समय-समय पर जिस मालिक ने इस भेड़िये को मेहमानों और पड़ोसियों को डराने और आतंकित करने के लिए इस्तेमाल किया था आज वही मालिक इस भेड़िये के खूनी पंजे के नीचे आ गया है। यहां तक कि अब इस भेड़िये ने मालिक के मासूम बच्चों को शिकार बना कर साबित कर दिया है कि पड़ोसी देश की आतंक की फैक्ट्री से निकला उसका ही उत्पाद उसके लिए जहर बन गया है। आज दुखों ने सरहदें लांघ ली हैं और इस आतंक के भेड़िये की वहशी करतूत से मानवता को गहरी ठेस पहुंची है।
आतंकवाद, जिसने मलाला को मारने की कोशिश की थी, ताकि उसकी आवाज बंद की जा सके और उसके हाथों से कॉपी-किताबें छीनी जा सकें। उसने सवाल किया था कि आखिर लोगों के हाथों में बंदूक थमाना क्यों आसान है और किताबें देना क्यों मुश्किल? लोकसभा टेलीविजन पर बहस के दौरान यही सवाल मन में आया, यह खयाल उभरा कि यह हमारे चयन का मामला है कि हम क्या पसंद करते हैं। हम क्या फैसला करते हैं कि हमें हाथ में बंदूक लेनी है कि किताब। लेकिन कुछ लोग किताब को बोझ बनाना चाहते हैं। उन मासूमों के मन पर क्या गुजरी होगी, जिन्होंने अपने सामने आतंकवादियों को अपनी किताबों और कॉपियों को खून में रंगते देखा होगा। उन बच्चों के दिमाग में कैसा डर बैठ गया होगा, जिन्होंने आतंकवादियों को अपने साथियों को चुन-चुन कर मारते देखा होगा। वे जो मासूमों को मार रहे थे, अफसोस की बात तो यह है कि उनके नाम के साथ तालिबान जुड़ा है। ये खुद को ज्ञान की तलब रखने वाला बताते हैं, मगर उन्होंने जो ज्ञान सीखा है वह ऐसा नहीं है जिस पर मानवता गर्व कर सके। वे शैतान के पुजारी बने हुए हैं और उनका ज्ञान जालिम और शैतानों का ज्ञान है। दरिंदगी ही जिसकी खासियत हो सकती है।

आखिर क्या हो गया है पड़ोसी देश को? कभी वह कसाब जैसे शैतानों को भेज कर हमें खून के आंसू रुलवाता है और कभी अपने घरों में मातम करवा देता है। क्या हुआ है वहां के समाज को, जो मलाला को गोली लगने पर ज्यादा अफसोस नहीं करता? जब मलाला को शांति का नोबेल पुरस्कार मिलता है तो उसे भी हास्य का पात्र बनाता है। आज जब पाकिस्तान में आतंकवादियों ने मानवता को शर्मसार करने वाला आतंक फैलाया है अब तो वहां की हर राजनीतिक पार्टी, वहां का मीडिया, पूरा समाज एक आवाज होकर आतंकवादियों से सवाल कर रहा है। मगर यह सवाल पहले क्यों नहीं पूछा गया। जब हामिद मीर को गोली लगी तब यह सवाल क्यों नहीं पूछा गया? जब बेनजीर को आतंकवादियों ने मार दिया तब यह सवाल क्यों नहीं किया गया? जब वहां आतंकवाद की फैक्ट्रियां बनाई गर्इं तब यह सवाल क्यों नहीं पूछा गया?
अगर गलत को गलत कहने की आदत शुरू से हमारी घुट्टी में पड़ जाए तो बुराई को आगे बढ़ने से रोका जा सकता है। ऐसा करने से बुराई की राह चलने वालों के हौसले पस्त हो जाते हैं। जब पूरा समाज एक होकर बुराई के खिलाफ खड़ा हो जाता है, तो गलत सोच से बचने के लिए अच्छाई और सच्चाई को अपनाना पड़ता है। लेकिन जब हम गलत को सही साबित करने के लिए खोज-खोज कर उदाहरण लाते हैं तब हमारे आसपास सब गलत होने लगता है। यही हुआ है हमारे पड़ोसी देश में भी। जब पहली बार आतंकवादियों को हथियार थमा कर वहां की सरकारों ने अपनी नीति का हिस्सा बनाया था तब वहां की जनता एक होकर इसका विरोध करती तो ऐसा दिन नहीं देखने को मिलता। जो लोग हमारी जान के दुश्मन हैं, अगर वहां पर उनकी जान की रक्षा की जाएगी तो कैसे आपकी जान के प्यारे सुरक्षित रह सकते हैं। आज भी तो आप सब बोल रहे हैं, लेकिन कब? जब निर्दोष मासूम फरिश्तों के कातिल शैतानों ने इधर-उधर हर तरफ से अमन-चैन लूट लिया है।

वहां के आतंकवादियों का सोच इराक के अल-बगदादी जैसी हो गई है, जहां जितना उत्पीड़न और हिंसा आप करते हैं उतना ही आगे बढ़ते हैं। क्या पाकिस्तान में अब तालिबान के भेस में आइएसआइएस के शैतान घुस चुके हैं। यह सवाल इसलिए भी हमें बेचैन कर रहा है कि हमारे पड़ोस में बच्चों को गोली उन्होंने मारी है, जिनके हाथ में बंदूक भी वहीं के शासकों ने थमाई थी। यही बात बेचैन करने वाली है कि वहां के शासकों के पास इतनी भी दूरदर्शिता नहीं थी कि वे लोगों के हाथों में बंदूक की जगह किताबें थमा सकें। जो लोग अपने फौरी फायदों के लिए हिंसा को बढ़ावा देते हैं ऐसे लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है। लेकिन तकलीफ होती है उन माता-पिता के बारे में सोच कर, जिन्होंने इस हिंसा की आग में अपने दिल के टुकड़े खो दिए हैं। क्या हो गया है इस दुनिया को, जहां धर्म का नाम लेकर शैतान निकलते हैं और फरिश्तों को खून में नहला देते हैं।

 

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