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दक्षिणावर्त : नाहक वितंडा

तरुण विजय जिनका देश, समाज, उसके चिंतन और गरीबी में पल रहे करोड़ों भारतीयों की हालत सुधारने से कोई सरोकार नहीं, वे अचानक बदजुबानी के सूरमा बन गए हैं। कोई खड़ा हो गया है कि गोडसे की मूर्ति लगनी चाहिए तो अभी लगनी चाहिए, किसी को भिंडरावाला याद आ रहा है, कोई अपनी जिंदगी भर […]
Author December 21, 2014 13:39 pm

तरुण विजय

जिनका देश, समाज, उसके चिंतन और गरीबी में पल रहे करोड़ों भारतीयों की हालत सुधारने से कोई सरोकार नहीं, वे अचानक बदजुबानी के सूरमा बन गए हैं। कोई खड़ा हो गया है कि गोडसे की मूर्ति लगनी चाहिए तो अभी लगनी चाहिए, किसी को भिंडरावाला याद आ रहा है, कोई अपनी जिंदगी भर की ताकत किसी टीवी चैनल के सामने जबरदस्त सांप्रदायिक भाषण देकर दिखा रहा है। जबकि सच तो यह है कि गांधी और गोडसे में से किसी एक को चुनने का अर्थ है भारत और अभारत में से किसी एक को चुनना। आज भारतवर्ष का विश्व में सर्वश्रेष्ठ परिचय किसी सेनानी, सम्राट या वाणी-वीर से नहीं, बल्कि साधारण, वाणी शूरता से रहित बात करने वाले गांधी से है। जो इसे नहीं मानता वह आत्मदैन्य का शिकार है।

कोई और समय होता तो वाणी-वीरों की इन तमाम मूर्खताओं को नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ लिया जाता। लेकिन कुछ मीडिया घरानों और दलों को परेशानी है कि वे लोग सत्ता में आ गए हैं, जिनके लिए इन्होंने अब तक तमाम दरवाजे बंद किए हुए थे। जिन लोगों को वे अल्पसंख्यकों का शत्रु, देश के विकास में बाधक और सांप्रदायिक राक्षस बताते रहे, वे जनता का समर्थन और जनादेश इस कदर पा गए कि ‘सज्जनता, सेक्युलरवाद, राष्ट्रीय एकता, सरहद पर मोमबत्तियां’ वगैरह के ठेकेदार स्तब्ध रह गए। अब जनता के खिलाफ गुस्सा कैसे व्यक्त करें कि उसने इन भलमनसाहत के एकमेव सिपहसलारों को परास्त कर दिया और उन्हें अस्वीकृति की पर्ची थमा दी।
अब ये क्या करें? कुछ तो ऐसा करना ही चाहिए कि लगे, प्राण हैं। सांप्रदायिकता सब घटाना चाहते हैं। कौन-सा शासक होगा, भले वह किसी भी पार्टी का हो, चाहेगा कि उसके शासनकाल में सांप्रदायिकता बढ़े, नफरतें बढ़ें और वर्ग वैमनस्य फैले? अपने शासन में सब अच्छा देखना, अच्छा करना चाहते हैं। जो अपनी नाक कटवा कर अखबार में खबर बनाना चाहें ऐसे संकीर्ण और अर्थहीन लोगों के कथन पर अगर राजनीतिक पार्टियां अपना एजेंडा बनाने लग जाएं तो इसे क्या कहा जाएगा? यह हुआ होगा, ऐसा कहना कठिन है, लेकिन ऐसा करना असंभव भी नहीं है, कि कुछ लोगों को नफरत फैलाने का काम दे दिया जाए। खुद कुछ करेंगे नहीं, पढ़ने-लिखने से कोई संबंध होगा नहीं, सिर्फ अखबारी दुकानदारी के लिए वाणी-वीर बन जाएंगे।

बहुत बड़े-बड़े दावे, बहुत बड़े-बड़े ढकोसले पिछले वर्षों में हमने देखे। नेक काम करने वाले प्रेस कॉन्फें्रस के जरिए देश नहीं बदलते। वे तो नगालैंड, मिजोरम, मणिपुर, अंडमान जैसी जगहों में बरसों से काम कर रहे हैं और उनके नाम भी आप शायद कभी नहीं सुनेंगे। हमारी तो आदत हो गई है कि ड्राइंगरूम में बैठ कर धर्म सुधारेंगे, धर्म बचाएंगे और जिनसे हमें अपने धर्म पर खतरे का अंदेशा है, उनसे बचाव के लिए कठोर शब्दों में प्रेस वक्तव्य का ब्रह्मास्त्र छोड़ेंगे। फिर पत्रकारजी से कहेंगे, सर, बहुत जबरदस्त बयान दिया है। प्लीज जरा बढ़िया-सा छाप दीजिएगा। अपना फोटू भी भेजा है। पिछली बार आपने बिना फोटो के बयान छाप दिया था। इस बार प्लीज हमरा एक ठो फोटुवा जरूर छपे के चाही।

बस, भाईजी का फोटो छप गया, जिसे वे जगह-जगह सोशल मीडिया के जरिए भेजते हैं। उधर मीडिया और संसद में खीजे हुए लिक्खाड़ों और वाकशूरों को पहले पन्ने की खबर और संसद ठप्प करने का स्वर्णिम मौका मिल गया। ब्रेकिंग न्यूज। प्रधानमंत्रीजी आएं और समझाएं कि ऐसा बयान क्यों दिया, किसने दिया, किस उद्देश्य से दिया, आगे कोई ऐसा बयान नहीं देगा, इसकी गारंटी दी जाए। पूरा देश परेशान है कि ऐसे बयान आ रहे हैं। देश में तूफान मचा है। पूरा इंडिया जानना चाहता है, ऐसे बयान क्यों आ रहे हैं। प्राइममिनिस्टर मस्ट कम, मस्ट एक्सप्लेन, नो प्राइममिनिस्टर नो पार्लियामेंट।

जय हो! जिसने गोडसे का नाम लेकर या बाकी बड़े-बड़े राष्ट्रीय और महान काम करने के बयान देकर आराम की नींद ली और सुबह छह बजे अखबार खरीद कर अपनी फोटो वाली खबर सोशल मीडिया में डालने की मेहनत की, वह अपने लल्लूराम और धर्मपत्नी की ओर अकड़ से ग्रीवा तान कर कहता है, देख लो तुम्हीं मेरी इंपोर्टेंस नहीं समझते थे। मेरे एक बयान ने संसद रुकवा दी।

अब अगला कोई बयान किसी मंदिर, मस्जिद, चर्च, किसी बड़े नेता या राष्ट्रपिता के बारे में दिलवा दिया जाए। फिर प्राइममिनिस्टर को बुलवाया जाए, हमें आश्वस्त करिए, बताइए, ऐसा क्यों हो रहा है?

जिस मीडिया ने मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी के क्रिसमस वाले बयान को उलटा कर छापा उसके अखबारी गुणों की कैसे प्रशंसा की जाए। बड़े से बड़े नास्तिक या नफरत से भरे शासन तंत्र में भी यह विकृत साहस नहीं हो सकता कि वह ईद, दिवाली या क्रिसमस से छेड़छाड़ करे या उस दिन की छुट््टी रद्द कर दे। लेकिन अखबार ने छापा कि ऐसा हो गया। सांता क्लॉज अब क्रिसमस की पूर्व संध्या पर बच्चों को खिलौने बांटने नहीं आएंगे, क्योंकि सांता क्लॉज निबंध लिखने में व्यस्त होंगे। यह खबर छपी। अब कौन-सी खबर खबर है और कौन-सा संपादकीय खबर के रूप में छप गया है, यह फर्क करना मुश्किल हो गया है।

किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि 1987 के कांग्रेस के फैसले से नवोदय आवासीय विद्यालयों में सभी त्योहार एक साथ मनाए जाते हैं जिनमें क्रिसमस, दिवाली और ईद भी हैं। यह कोई नया आदेश नहीं निकला था। निबंध प्रतियोगिता अटलजी के जन्मदिन के निमित्त और वैकल्पिक रखी गई। इसमें अटलजी का क्या कसूर कि वे ेक्रिसमस के दिन जन्मे। उनके अनुयायियों का क्या कसूर कि वे अटलजी का जन्मदिन भी मनाना चाहते हैं?

पर ये सेक्युलर तालिबान चाहेंगे कि अटलजी का जन्मदिन, अटलजी के जन्मदिन पर न मनाया जाए, बल्कि आगे-पीछे किसी दूसरी तारीख को मना लिया जाए। वरना हम कहेंगे कि क्रिसमस को खराब करने के लिए अटलजी का जन्मदिन मनाया जा रहा है। यह तो शुक्र है कि किसी ने अभी तक यह नहीं कहा कि हिंदू सांप्रदायिकतावादियों ने षड्यंत्र के तहत अटलजी का जन्मदिन 25 दिसंबर निर्धारित किया। असल में उनकी जन्मपत्री के अनुसार तो उनका जन्म 26 दिसंबर को हुआ था!
हमारी भी कुछ मजबूरियां हैं। हमारा मंदिर की सफाई में मन नहीं लगता, संस्कृत हम खुद नहीं पढ़ते, लेकिन बाकी सबको पढ़ाना चाहते हैं, एक जगह भी ऐसी व्यवस्था करने में विफल रहते हैं कि संस्कृत पढ़े-लिखे व्यक्ति को सम्मानजनक नौकरी मिल जाए। गाय को प्लास्टिक खिलाते हैं और पश्चिमी प्रदेशों से बांग्लादेश के कसाईखानों तक हम ही पहुंचाते हैं। लेकिन वाणी की वीरता ऐसी दिखाएंगे कि धरती कांप उठे और आसमान डोल जाए। युद्ध के नगाड़े बज उठें और धमनियों में रक्त गरम होकर हिलोरें लेने लगे, ऐसे शब्द प्रयोग करेंगे। फिर दोस्तों को फोन करेंगे- सुना तुमने, क्या जबरदस्त बोला था मैं।

लल्लूरामजी काम कुछ नहीं करेंगे। सदियों बाद एक नया मौसम आया है, तो उसे संभालने और अपनी महत्त्वाकांक्षाएं नियंत्रित कर इतिहास के इस क्षण को सफल करने में मेहनत लगती है, धैर्य धारण करना पड़ता है। कौन करे? शार्टकट बड़ा अच्छा लगता है।

अगर हमारी विचारधारा, सिद्धांत और सपने महान हैं, तो हमारी भाषा भी उसी के अनुरूप ढलनी चाहिए। अटलजी इसके भव्य और गरिमामय उदाहरण हैं। इस 25 दिसंबर को जब उनका जन्मदिन मनाएं, तो भाषा की भद्रता का गुण उनसे सीखने और अगर सीखा हुआ है तो उसे और पुष्ट करने का प्रयास करें। हम तो हर साल क्रिसमस पर अपने घर के पास गोल मार्केट के चर्च में जाते हैं- परिवार सहित। इस बार संकोच है। इतना ज्यादा सेक्युलर शोर मचा है कि कहेंगे, देखो हमने चिल्ला-चिल्ला कर इनको भी चर्च भेज दिया!

करुणा और बलिदान के जो भाव जीजस के जीवन से मिलते हैं वे बहुत दुर्लभ हैं। उनसे एक अजीब-सी आत्मीयता महसूस होती है। संगठित चर्च के मतांतरण व्यापार से पूर्णत: गांधी की भाषा में असहमत होते हुए भी जीजस के प्रति तो श्रद्धा रखी जा सकती है। इतना ही आपस में व्यवहार हो जाए तो भी क्या कम होगा।

 

 

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