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आकर्षण और विकर्षण के बीच

निर्माता जब किसी साहित्यिक कृति पर फिल्म बनाने की ओर अग्रसर होता है, तो वह उसमें तमाम परिवर्तन कर देना चाहता है, जो बाजार के अनुकूल और व्यावसायिक दृष्टि से सफल हो। चाहे इस प्रक्रिया में कृति की आत्मा और मूल संवेदना ही क्यों न खत्म हो जाए।

Author July 14, 2019 6:47 AM
साहित्यिक कृतियों पर हिंदी में बनी अधिकतर फिल्में विफल साबित हुई हैं और फिल्मों में जाने वाले अधिकतर साहित्यकारों को अंतत: निराशा ही हाथ लगी। वह चाहे प्रेमचंद हों या लोकप्रिय कवि-गीतकार नीरज हों।

कवि कुंभनदास के प्रति’ शीर्षक कविता में केदारनाथ सिंह सत्ता और कविता के संबंध पर लिखते हैं- ‘कैसी अनबन है/ कविता और सीकरी के बीच/ कि सदियां गुजर गई/ और दोनों में आज तक पटी ही नहीं।’ यह बात हिंदी साहित्य और हिंदी सिनेमा के संबंध पर भी अक्षरश: लागू होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि दोनों के संबंधों में अभी सदियां नहीं गुजरी हैं। हालांकि दोनों के सबंधों की दशा और दिशा को देख कर लगता नहीं है कि भविष्य में कभी सकारात्मक परिवर्तन होगा। हिंदी साहित्य और हिंदी सिनेमा के बीच बहुत प्रारंभ से ही कोई रिश्ता नहीं बन पाया। यह बिडंबनापूर्ण लेकिन तथ्य है कि एक भाषा के दो अभिव्यक्ति-माध्यमों (साहित्य और सिनेमा) में लगभग परस्पर विरोध की स्थिति बनी रही। इस विरोध के कई कारण हो सकते हैं, पर सबसे महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि जहां हिंदी सिनेमा ने लोगों की सतही अभिरुचियों को भुनाने पर बल दिया, वहीं हिंदी साहित्य ने जनता की अभिरुचियों को परिष्कृत करने का वृहत्तर दायित्व अपने कंधों पर लिया। उदाहरण के लिए यहां तिलस्मी-ऐय्यारी कथाओं के विरुद्ध प्रेमचंद और पारसी रंगमंच के विरुद्ध जयशंकर प्रसाद के रचनात्मक संघर्ष को याद किया जा सकता है। हम कह सकते हैं कि हिंदी साहित्य ने जहां जनता को संस्कारित किया, वहीं हिंदी सिनेमा ने उसकी क्षुद्र भावनाओं को उभार कर व्यावसायिक इस्तेमाल किया। स्पष्ट है, हिंदी सिनेमा और साहित्य के उद्देश्यों में जमीन-आसमान का अंतर शुरू से ही मौजूद रहा है। यह अकारण नहीं है कि साहित्यिक कृतियों पर हिंदी में सबसे कम सफल फिल्में बनी हैं।

साहित्यिक कृतियों पर हिंदी में बनी अधिकतर फिल्में विफल साबित हुई हैं और फिल्मों में जाने वाले अधिकतर साहित्यकारों को अंतत: निराशा ही हाथ लगी। वह चाहे प्रेमचंद हों या लोकप्रिय कवि-गीतकार नीरज हों। अपनी साहित्यिक संवेदना और मूल्यों को मार कर सिनेमा की दुनिया में टिके रहना किसी भी साहित्यकार को रास नहीं आया। उपेंद्रनाथ अश्क, अमृतलाल नागर, भगवतीचरण वर्मा, पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ आदि सबको देर-सबेर मुंबई से लौटना ही पड़ा। प्रेमचंद 1933 में मुंबई गए। उनकी कहानी पर मोहन भावनानी के निर्देशन में फिल्म ‘मिल मजदूर’ बनी। पहले तो उनकी कहानी में काफी बदलाव किया गया, फिर सेंसर ने काफी कुछ बदला। अंत में फिल्म का जो स्वरूप सामने आया उससे प्रेमचंद काफी क्षुब्ध हुए। उनके संवेदनशील रचनाकार को यह सब बहुत नागवार गुजरा कि फिल्म बनने की प्रक्रिया में उनकी कहानी की ही हत्या हो गई। आगे उनकी कृतियों पर ‘नवजीवन’, ‘सेवासदन’, ‘रंगभूमि’ आदि फिल्में बनीं, किंतु सभी विफल साबित हुई।

यहां एक बड़ा प्रश्न यह है कि हिंदी के सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक प्रेमचंद की रचनाओं पर बनी फिल्में क्यों विफल हुई? प्रेमचंद तो हिंदी और उर्दू दोनों के सबसे बड़े रचनाकार थे। ऐसा प्रतीत होता है कि फिल्मों के दर्शक और साहित्य के पाठकों की चेतना में भारी अंतर था। रचनाओं में सिनेमा के मिजाज के अनुकूल अनेकानेक परिवर्तन करने के बावजूद प्रेमचंद की कृतियों पर बनी फिल्में विफल हुर्इं, तो यही कहा जा सकता है कि हिंदी सिनेमा के दर्शक वर्ग का जो चरित्र था, वह प्रेमचंद के चेतना और सरोकारों से कासों दूर था।

किशोर साहू जब फिल्मों में आए तब वे भी एक साहित्यकार थे। उन्होंने साहित्यकारों को फिल्मों में लिखने का मौका भी दिया, पर उन्होंने भी किसी साहित्यिक कृति पर फिल्म बनाने से परहेज ही किया। इस दौर में भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास ‘चित्रलेखा’ पर इसी नाम से केदार शर्मा द्वारा बनाई गई फिल्म जरूर सफल रही। इसे एक सुंदर अपवाद के रूप में याद किया जा सकता है। आजादी के बाद भी साहित्यिक कृतियों पर जो फिल्में बनीं, वे प्राय: विफल रहीं। चंद्रधर शर्मा गुलारी की कहानी ‘उसने कहा था’ और रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ (तीसरी कसम) पर बनी फिल्में फ्लाप रहीं। ‘तीसरी कसम’ शैलेंद्र की मृत्यु के बाद हिट हुई। राजेंद्र सिंह बेदी की रचना ‘एक चादर मैली सी’ पर जब फिल्म बनी तो वह भी विफल साबित हुई।

हिंदी साहित्य और हिंदी सिनेमा के बीच रिश्ता सत्तर के दशक में कुछ बेहतर हुआ। गुलजार ने कमलेश्वर की कृतियों पर ‘आंधी’ और ‘मौसम’ जैसी महत्त्वपूर्ण फिल्में बनाई। बासु चटर्जी ने मन्नू भंडारी की कहानी ‘यही सच है’ पर ‘रजनीगंधा’ जैसी सफल फिल्म बनाई। लेकिन यह दौर काफी छोटा रहा। यह देखना कम दिलचस्प नहीं है कि हिंदी फिल्मकारों की तुलना में बंगाली फिल्मकारों ने साहित्यिक कृतियों की संवेदना को गहराई से समझा और सफल फिल्में बनाई। सत्यजित राय द्वारा प्रेमचंद की कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर इसी नाम से बनाई गई फिल्म सफल रही। बासु चटर्जी का उदाहरण सामने है ही। उन्होंने बांग्ला की साहित्यक कृतियों पर हिंदी में सफल फिल्में बनाई। शरतचंद के उपन्यासों पर अत्यंत सफल फिल्में बनी। ‘देवदास’, ‘परिणीता’ आदि को याद किया जा सकता है। इसी तरह विमल मित्र के उपन्यास ‘साहब बीवी गुलाम’, बंकिमचंद्र चटर्जी के उपन्यास ‘आनंद मठ’ पर इन्हीं नामों से फिल्में बनीं और सफल रहीं।
विचारणीय प्रश्न है कि हिंदी के फिल्मकार हिंदी की साहित्यिक कृतियों को कोई महत्त्व क्यों नहीं देते हैं। वे अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं को तरजीह देते हैं, पर हिंदी की कृतियों के प्रति उनमें हिकारत का भाव होता है। दरअसल, शुरू से ही हिंदी के जो फिल्म निमार्ता हैं वे गैर-हिंदी क्षेत्रों से संबद्ध रहे हैं। आरंभिक फिल्मकार मराठी, गुजराती, बंगाली, पारसी आदि थे। इनकी प्राथमिकता में हिंदी की साहित्यिक कृतियां नहीं थीं। यह अपने-आप में कम विडंबनापूर्ण नहीं है कि हिंदी सिनेमा के अधिकतर अभिनेता-अभिनेत्रियां आदतन हिंदी नहीं बोलते हैं। वे रोमन में संवाद रटते हैं। हिंदी फिल्मों के सितारों को हिंदी भाषा नहीं आती। हिंदी क्षेत्रों में भाषायी अस्मिता और चेतना का खतरनाक स्तर तक अभाव है। इस अभाव का ही एक प्रतिबिंब फिल्मों से साहित्यिक कृतियों का बेदखल हो जाना है।

सिनेमा अंतत: एक व्यवसाय है। इसमें भारी पूंजी लगी होती है। जैसे-जैसे समय बीत रहा है फिल्म निर्माण में पूंजी की भूमिका और बढ़ रही है। पूंजी से संचालित किसी भी उपक्रम का पहला और अंतिम उद्देश्य मुनाफा होता है। जो भी व्यक्ति पैसा लगाएगा वह सर्वप्रथम यही देखेगा कि उसका पैसा न सिर्फ लौटे, बल्कि साथ में कुछ मुनाफा भी हो। इसके लिए वह हर तरह के हथकंडे का इस्तमाल करता है। यहीं से फिल्म निर्माता और साहित्कार में टकराव शुरू होता है। निर्माता जब किसी साहित्यिक कृति पर फिल्म बनाने की ओर अग्रसर होता है, तो वह उसमें तमाम परिवर्तन कर देना चाहता है, जो बाजार के अनुकूल और व्यावसायिक दृष्टि से सफल हो। चाहे इस प्रक्रिया में कृति की आत्मा और मूल संवेदना ही क्यों न खत्म हो जाए। साहित्यकार की समस्या यह होती है कि उसका पूरा संस्कार ही व्यावसायिकता और बाजार के विरुद्ध विकसित होता है। बल्कि इस विरोध के कारण ही वह साहित्यकार बनता है। इसलिए उसे अपनी कृति का बाजारोपयोगी बनाना स्वीकार नहीं होता है।

एक तो साहित्यिक कृति पर फिल्म बनाने में कोई दिलचस्पी फिल्मकारों में नहीं होती। अगर कोई इस दिशा में प्रयास करता भी है तो उपर्युक्त व्यावहारिक समस्या खड़ी हो जाती है। इस संबंध में एक दूसरी बात भी है, जो साहित्यिक कृति पर फिल्म निर्माण में बाधक है। प्रत्येक श्रेष्ठ साहित्यिक रचना उपयोग होने से इंकार करती है। उसकी महत्ता इस बात में निहित होती है कि वह ‘संस्कृति उद्योग’ का हिस्सा न बने। संस्कृति उद्योग उच्च कला और निम्न कला में फर्क को मिटा देता है। वह प्रत्येक चीज को पूंजीवाद और बाजार के लिए अनुकूलित कर देता है। कोई भी अच्छी रचना इस तरह के अनुकूलन से इनकार करती है। व्यावसाय को लक्ष्य करके किसी कृति पर फिल्म बनाना उसे बाजार के प्रति अनुकूलन का प्रतिरोध है। शायद इसलिए भी साहित्यिक कृतियों पर जो फिल्में बनीं उसमें प्राय: कृति का मर्म कहीं खो गया।

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