बॉखबर: रहस्य रोमांच से भरपूर - Jansatta
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बॉखबर: रहस्य रोमांच से भरपूर

इसके बरक्स एक चैनल दिखाता है: जनता पैंतीस दिन बाद भी खाली हाथ लाइनों में खड़ी है। वह पहाड़गंज में खड़ी है।

Author December 18, 2016 1:55 AM
गुरुवार (1 दिसंबर) को राज्यसभा में हुए हंगामे का एक दृश्य।

एक सप्ताह में चार-चार खबर-बम और सभी सुलगते हुए:

पहला बम: सौजन्य: इंडिया टुडे पर करन थापर के साथ पश्चिम बंगाल के वित्तमंत्री उवाच: बड़े पद पर विराजमान एक केंद्रीय मंत्री ने जो कहा उसे बता नहीं सकता। बताऊंगा तो बम के गोले की तरह फटेगा। वे कह रहे थे कि हमको तो एक कमरे में ले जाकर खबर दी गई। उसके बाद नोटबंदी की घोषणा हो गई। मंत्री को भी पता नहीं था।

दूसरा बम सौजन्य राहुल गांधी: मेरे पास पीएम के बारे में पर्सनल सूचना है, लेकिन मुझे बोलने से रोका जा रहा है। मेरे पास जो सूचना है, उससे पीएम डरे हुए हैं।

तीसरा बम वेंकैया नायडू के हवाले से इंडिया टुडे पर: यह अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले का ‘डायरी बम’ है। सोनिया गांधी का नाम आया है।
चौथा बम सौजन्य केजरीवाल: नोटबंदी आठ सौ करोड़ रुपए का घोटाला है, इतना बड़ा फैसला बिना सोचे ले लिया। सारा देश मुसीबत में है। लोग जानना चाहते हैं कि वे कितने पढ़े-लिखे हैं? एक चैनल पर लिखा आया कि केजरीवाल डिग्री की सबूत मांग रहे हैं!
बहस के नाम पर बहस न करने के नए तरीके हैं: मुलाहिजा फरमाएं-
सत्ता पक्ष: ‘हम बहस को तैयार हंै, लेकिन विपक्ष बाधा डालता है!’
विपक्ष: ‘हम बहस को तैयार हैं, लेकिन सत्ता पक्ष बाधा डालता है!’
सत्ता: ‘हम बीस दिन से बहस को तैयार हैं!’

विपक्ष: ‘तब हम वोट की बात करते थे, अब बिना वोट के तैयार हैं। लेकिन अब तो सत्ता पक्ष ही शोर करने लगता है। शुक्रवार को अनौपचारिक तौर पर तय हुआ था कि विपक्ष को बोलने देंगे, लेकिन सत्ता पक्ष खुद बोलने लग गया। जिसके गले में जितना दम, वह उतना ही बम-बम! स्थगन दर स्थगन!
चैनल विपक्ष को कायल करने में लगे हैं कि संसद की कार्रवाई क्यों नहीं चलने देता विपक्ष?
अगर संसद आराम से चले तो आपको हंगामा दिखाने और शाम को बहस कराने का अवसर कहां से मिले सरजी?
वृहस्पति की दोपहर न्यूज एक्स खबर देता है कि आडवाणीजी फिर से नाराज हैं। संसद में हंगामेबाजी से चिंतित हैं। संसद की छवि खराब होती है। कार्रवाई एक दिन तो चलने दें। मन करता है इस्तीफा दे दूं!
सरजी कौन आपकी सुनने वाला है?

इसी बीच एबीपी ‘कैशलेस’ के आइडिया पर ही प्रश्न उठा देता है: एंकर दहाड़ते हुए सावधान करता है कि कैशलेस के बहाने कहीं डेढ़ सौ करोड़ का घोटाला तो नहीं हो रहा? डरावना म्यूजिक बजाता है, फिर पूछता है: क्या कैशलेस के प्रचार के पीछे डेढ़ लाख करोड़ का घोटाला है? वाट्सऐप पर मैसेज घूम रहा है, जो इस घोटाले को बताता है।… फिर बताने लगता है कि किस तरह से यह हो सकता है।… रहस्य रोमांच वाला म्यूजिक बजता है।
वह कहानी निपटाता है, तो तुरंत नीति आयोग के प्रवक्ता ‘डिजिटल मनी ट्रांसफर’ को पापूलर बनाने के लिए दो ईनामी योजना घोषित करते हैं कि वे क्रिसमस से शुरू होंगी: ‘लकी ग्राहक योजना’ और ‘डिजी धन व्यापारी योजना’! इनाम लो। डेली लो। वीकली लो। हजार का लो। लाख का लो!
लेकिन नए नोटों का अपना ही जादू है। वे हर रोज कहीं न कहीं बड़ी मात्रा में बरामद होते दिखते हैं। कैसे तो लगते हैं कम्बख्त गुलाबी-गुलाबी नए-नए दो हजार के नोटों के जखीरे!

कैसा चमत्कार है कि जिन नोटों को बैंकों में होना चाहिए था वे नए ब्लैकमनी बनाने वाले उस्तादों के स्पेशल बाथरूमों और तहखानों में मिलते हैं!
राजदीप देखते ही कहने लगते हैं कि ये नए गुलाबी नोट ही तो कहीं नया काला धन नहीं? वे नई ब्लैक मनी पर बहस कराने लगते हैं!
इस नई ब्लैक मनी की शोभा ही निराली है: ताजा पैकिंग के साथ लाइनों में लगी नोटों की गड््िडयां! उनको पकड़ने वाले अधिकारी उनको घूरते हुए! और दर्शक बने हम भी उनको घूरते हुए! कैसी विडंबना कि एक ओर कैशलेस कर दी गई बेशुमार जनता नोटों के लिए लाइनों में लगी तरसती रहती है, दूसरी ओर करोड़ों के नए नोटों की गड्डियां मेजों पर सजी दिखती हैं!

इसके बरक्स एक चैनल दिखाता है: जनता पैंतीस दिन बाद भी खाली हाथ लाइनों में खड़ी है। वह पहाड़गंज में खड़ी है। विंध्यवासिनी में खड़ी है। पश्चिम बंगाल के चाय बागानों में खड़ी है। एनडीटीवी दिखाता है, यहां लाइनों में लगे लोगों के पास एक निक्का पैसा तक नहीं। सब तरस रहे हैं! एबीपी अखिल भारतीय लाइनें दिखाता है। एक-दो किसान स्वयं को खुश बताते हैं, बाकी सब दुखी बताते हैं। लेकिन जनता का दुख जानने की जरूरत है किसे? उसे तो ‘खुश’ मान लिया गया है।

खबरें विभाजित हैं। बाइट टू बाइट विभाजन है। विपक्ष के नेता खरगे बोल रहे हैं: लोग परेशान हैं, लेकिन सत्ता पक्ष शोर करके हमें बोलने नहीं देता! एक-एक मिनट पर सदन स्थगित कर दिया जाता है और उनके लोग हंगामा करते हैं। एक सांसद सदन में कह रहे हैं कि पांच दिन से बोलने नहीं दे रहे। बाजू के सांसद चिल्लाने लगते हैं कि अगर ऐसा बोलना है तो उधर चले जाओ।

कहानी-दर-कहानी फाइट है। ‘जैसे को तैसा’ की नीति है। विपक्ष की कहानी पर अपनी कहानी हावी करो। वे एक्सपोज करें तो तुम उनको करो।
‘अगस्ता वेस्टलैंड’ घोटाले की कहानी पुरानी है। उसमें अब न रहस्य बचा है, न रोमांच! वह कई बार कही जा चुकी है: वही गवाह हैं, वही डायरी है, वही नाम हंै, यानी सोनिया और एपी! लेकिन रहस्य रोमांच से भरपूर राहुल की ‘पीएम के बारे में पर्सनल इनफार्मेशन’ की धमकी भरी कहानी अब भी ‘अगस्ता वेस्टलैंड’ घोटाले पर भारी है, क्योंकि इन दिनों ‘पर्सनल ही पोलिटीकल’ होता है, फिर उसमें रहस्य और रोमांच है!
जब तक राहुल पूरी कहानी नहीं दिखाते, तब तक देश को उत्कंठ बने रहना है!

 

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