ताज़ा खबर
 

बाखबर, सुधीश पचौरी का कॉलम: बजट का शेर और बब्बर शेर

बसंती मूड में वे सीरियसली समझाते रहे कि बजट किस तरह गांव, गरीब और विकास के लिए प्रतिश्रुत है! विपक्ष ने बिलकुल नहीं टोका कि यह चुनावी भाषण क्यों दिया जा रहा है?

Author February 5, 2017 4:19 AM
साल 2016 में अपना दूसरा पूर्ण बजट पेश करते जाते अरुण जेटली एवं अन्य।

बजट, ब्रीफकेस, वित्तमंत्री सेठ, कॉरपोरट और आदमी तथा गृहिणी यानी जनता का तड़का! बजट ब्रीफकेस में, ब्रीफकेस मंत्रीजी के दाएं कर-कमल में, सत्र संसद का और आशंका एंकरों की! आशंका कि विपक्ष बायकाट करेगा और बायकाट कर वह अपने को बर्बाद ही करेगा! दो दिन धमकी लटकी रही, लेकिन चतुर विपक्ष पलटी मार गया। एकदम एंटीक्लाइमेक्स कर गया! चैनलों को रगड़ने का मनचीता मौका नहीं मिला! एक दिन पहले आर्थिक सर्वे दिया गया, तो मुख्य वित्ताधिकारीजी जनता को उसकी बारीकियां समझाने आए! वाह! क्या अदा थी: सोफे पर कुछ तिरछे बैठ कर बेतकल्लुफ मुद्रा में बात करना, एंकर के पूरा पूछने से पहले ही सवाल को लपक लेना और कंधे उचका कर जवाब देना नई अदा है, जो इन दिनों ‘जन सेवकों’ पर तारी है! टीवी पर आकर हर बंदा शाहरुख खान बन जाता है! लेकिन हर एक के साथ टोकाटाकी करने वाला वह एंकर उनको चातकीय दृष्टि से ही क्यों निहारता रहा?

कट टू बजट पंचमी: हर चैनल ‘सबसे पहले छाप’ खबर तोड़ रहा था कि वित्तमंत्री संसद पहुंच गए हैं, ताकि सब जान जाएं कि तय दिन ही बजट आना है। एक चैनल भाजपा से भी अधिक उद्विग्न रहा कि बजट पेश होगा कि नहीं? बजट चैन से निपटेगा कि नहीं?  निपटा भी। विपक्ष ने ऐसी चुप लगाई कि न थप-थप तक की, न हाय हाय। सिर्फ सुनता रहा। सत्ता पक्ष के सांसदों को ही हर बार बजट के लिए थप-थप करनी पड़ी और खुशी का इजहार करना पड़ा!  वित्तमंत्रीजी ने अपने शुष्क लंबे बजट पाठ में रदीफ काफिया को जमाए बिना एक शेर पेल कर सांसदों के रसिकत्व की परीक्षा ली और वे ताली मार कर अच्छे नंबरों से पास हुए!

बजट पेश होने के बाद अचानक सब चैनलों पर पीएम ही पीएम थे। बसंती मूड में वे सीरियसली समझाते रहे कि बजट किस तरह गांव, गरीब और विकास के लिए प्रतिश्रुत है! विपक्ष ने बिलकुल नहीं टोका कि यह चुनावी भाषण क्यों दिया जा रहा है?  उसके बाद एंकरों को राष्टÑीय कर्तव्य मिला। एक एंकर हंस-हंस कर विशेषज्ञों से पूछता रहा कि बजट को पांच में से कितने नंबर देंगे? विशेषज्ञों को उदारता का ऐसा दौरा पड़ा रहा कि पांच में से कम से कम चार तो सब देते रहे। एक ने साढ़े चार दिए! कंजूस कहीं के! वे पांच में से पांच भी तो दे सकते थे। चार बजट के, तो एक वित्तमंत्रीजी की मुस्कान और शेर कहने का! सौ फीसद देने से शायद नजर लग जाती, इसलिए नहीं दिए!

इस परम आत्ममुग्धता के बीच अकेले राहुल ही बचे, जिन्होंने विपक्ष की भूमिका निभाई और चैनल उनके दो वाक्य बजाते रहे। इधर बजट खत्म हुआ उधर राहुल तपाक से बोले कि ये शेरो-शायरी का बजट है, रोजगार नहीं पैदा होने वाला! एक अंगरेजी चैनल पर बजट को समझाने के लिए वित्तमंत्रीजी स्वयं उपलब्ध रहे। दूसरे अंगरेजी चैनल पर पीयूष गोयलजी भी पूरे समय मुस्कुराते दिखते रहे। कांग्रेस के राजीव गौड़ा जब बजट की निस्सारता बताते, तो पीयूषजी मन ही मन नहीं, खुल कर विहंसते नजर आते! उनकी हंसी आप में वक्तव्य थी, लेकिन वे फिर भी बोले! इस हंसी में अहंकार नजर आता था!

जब बड़ी खबर नहीं मिलती तो चैनल छोटी खबरों को राष्टÑीय खबर बनाने की कला सिखाते हैं! बंगलुरू में एक साइकिल चालक को एक गाडी ने टक्कर मारी, बुरी तरह घायल होकर वह चालीस मिनट तक किनारे पड़ा सबसे कहता रहा कि फोटो मत खींचो, अस्पताल ले चलो। लेकिन लोग मोबाइल से फोटो खींचते रहे! चैनलों के बेहद संवेदनशील मानवतावादी एंकर इस तमाशबीन जनता को लानतें भेजते रहे।  एंकरों और रिपोर्टरों ने ऐसी ‘जनता’ को जम के धुना! हर चैनल अपने-अपने फिक्स ‘मानवीय’ चेहरों को लेकर दिन भर जुटा रहा कि देखो, अमानवीय जनता को देखो!हमने भी देखी अमानवीय जनता, लेकिन जनता शर्मिंदा नहीं थी। वह तो ऐसी ही होती है! वह तो ‘सिटीजन जर्नलिस्ट’ का काम कर रही थी! महंगी मानवीयता तो सूट-बूट वाले लखटकिया एंकरों का अलंकार है!

चेन्नई के मरीना बीच ने फिर खबर बनाई और हर चैनल पर छाई! कई दिन से मरीना बीच का यह कीचड़ दिखता रहा। एक व्यक्ति तमिल में बताता रहा कि किस तरह दो जहाजों के टकराने से कई सौ टन तेल तैलाक्त कीचड़ बन कर मीलों तक फैला है और तट को बर्बाद कर चुका है! चार दिन से चैनल खबर दे रहे थे, लेकिन किसी ने न सुनी। जब एक कमेटी ने इसका संज्ञान लिया तब सुनी। अब उसे सैकड़ों लोग हाथ से साफ कर रहे हैं और अभी इक्कीस दिन लगेंगे!
महाराष्ट्र का नया समाजशास्त्र! एक पाठ्य पुस्तक समझाती बताई गई कि बदसूरत और विकलांग स्त्री दहेज की मांग का कारण बनती है! एंकर कुपित हो कहने लगे कि ऐसी बातें पढ़ने से दहेज ‘नेचुरलाइज’ होता है। लेकिन अपना समाज तो ऐसे ही शिक्षाशास्त्र रचा करता है, जो किसी आलोचना से नहीं डरता!
पंजाब के चुनाव का विश्लेषण हो तो एनडीटीवी स्टाइल वाला! सीन देखा तो पाया कि प्रणय राय लाल पगड़ी पहने हैं, विश्लेषक दोराब सुपारीवाला और शेखर गुप्ता पटके पहने हैं! इसे कहते हैं सेक्युलर विश्लेषण!

सबसे मजेदार खबर बंगलुरू के अभयारण्य की ‘सफारी’ की रही। नीली गाड़ी में बैठे दर्शनार्थियों को शेरनी सहित वन में विचरण कर रहे एक बब्बर शेरजी ने एकदम नजदीक आकर दर्शन दिए। वे तो कार का दरवाजा खोल कर दर्शनार्थियों से हाथ मिलाने के मूड में थे, इसीलिए उन्होंने कार के शीशे पर अपना भारी भरकम पंजा मारा और चाहा कि हैंडशेक तो कर लें। लेकिन शीशा न टूटा। कार के ड्राइवर ने कार आगे बढ़ाई तो बब्बर सरजी दो चार कदम संग चल कर मिलने का आइडिया त्याग दिए और कार से विलग हो गए! सफारी वाले कम से कम इतना तो बता सकते थे कि जो फुटेज आपने दिखाया उसे खींचा किसने था? उसे जरूर पीछे आती कार में बैठे शेरजी के दर्शनार्थी ने खींचा होगा!शेरजी ने अपना सबसे बढ़िया और क्लोज एंगिल उन्हीं को दिया! और, इसके लिए उनका धन्यवाद तो कर ही दिया होता!

 

बजट 2017: वित्त मंत्री अरुण जेटली का यह बजट अर्थव्‍यवस्‍था के लिए टॉनिक साबित होगा या नहीं?

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App