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‘बाखबर’ कॉलम में सुधीश पचौरी का लेख : दलित विमर्श की चोट

ज्यों ही कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद ने मायावती को लेकर दयाशंकर के कहे अपशब्दों की निंदा करते हुए अपना बयान दिया, त्यों ही भाजपा राज्यसभा में इतनी रक्षात्मक हुई कि वित्तमंत्री जेटली को अपशब्दों की निंदा करनी पड़ी, स्त्री प्रतिष्ठा के प्रति संवेदनशील होने की अपील करनी पड़ी।

Author नई दिल्ली | July 24, 2016 5:36 AM
जुलाई में गुजरात के गिर सोमनाथ जिले में दलित युवकों की पिटाई की गई थी। (Photo Source: Video grab)

अगर गुजरात के स्वयंभू ‘गोरक्षक’ न होते और ऊना में कुछ दलित युवकों को गोकशी का आरोपी मान कर, अधनंगा करके कार से बांध बेरहमी से पीटा न गया होता, न ये सीन वायरल होकर टीवी में छाए होते और अगर यूपी में चुनाव आसन्न न होते और भाजपा के उपाध्यक्ष नेता दयाशंकरजी की जुबान इस कदर गंदी और लंबी न होती और अगर मायावती भाजपा के लिए जमीनी चुनौती नहीं होतीं, तो मीडिया में दलित प्रेम इस कदर न उमड़ा होता और न वैसा जोरदार दलित और स्त्री विमर्श देखने-सुनने को मिलता!

ज्यों ही कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद ने मायावती को लेकर दयाशंकर के कहे अपशब्दों की निंदा करते हुए अपना बयान दिया, त्यों ही भाजपा राज्यसभा में इतनी रक्षात्मक हुई कि वित्तमंत्री जेटली को अपशब्दों की निंदा करनी पड़ी, स्त्री प्रतिष्ठा के प्रति संवेदनशील होने की अपील करनी पड़ी। मायावतीजी सदन की हीरोइन हो उठीं। हर सदस्य उनके प्रति कहे गए अपशब्दों को बोले बिना दयाशंकर को गिरफ्तार करने, सजा देने की मांग करने लगा। मायावती ने सबका धन्यवाद करते हुए अपशब्द कहने वाले को नसीहत दी कि यह भाजपा को भारी पड़ेगा। जनता जवाब देगी। अपशब्द कहने वाले ने जो कहा वह अपनी मां बहन के लिए ही कहा होगा। संग में बोल उठीं कि कल को सड़कों पर कुछ होता है, तो जिम्मेदारी उनकी होगी, जिनने अपशब्द कहे। मायावती का क्षोभ गहरा था, लेकिन मर्यादा में था। सदन के उपाध्यक्ष ने अपशब्द कहने वाले नेता की निंदा का प्रस्ताव किया और कानूनन सजा देने के लिए कहा! पहली बार सदन एकजुट हुआ। भाजपा नेता की मनुवादी मनोवृत्ति को पूरे सदन ने धिक्कारा! राज्यसभा के सीधे प्रसारण ने दलित विमर्श पैदा कर दिया!

दयाशंकरजी के अपशब्दों की वजह से राज्यसभा में भाजपा की जम कर धुलाई हुई। हर चैनल में भाजपा का दलित-प्रेम एक्सपोज हुआ। कई चैनलों के एंकरों ने कहा कि भाजपा के पिछले छह महीने की ‘दलित-कमाई’ बट््टेखाते में गई! शाम की बहसों तक भाजपा प्रवक्ता हकलाने से लगे थे। एक चैनल ने कहा कि भाजपा का यूपी में यह ‘सेल्फ गोल’ है। चुनाव में यह भाजपा को सचमुच भारी पड़ेगा। इस दलित विमर्श में मायावती को फायदा पहुंचा! भाजपा को नुकसान हुआ! उसके दलित-प्रेम की पोल खुली! अगले दिन बसपा के लोग लखनऊ समेत अन्य जगहों पर प्रदर्शन करते दिखे।

दिनों बाद टाइम्स नाउ पर भाजपा प्रवक्ता की तबियत से धुलाई सबसे ज्यादा एंकर अर्णव ने की। बाकी सुखाने का काम सुधींद्र भदौरिया ने पूरा किया। भाजपा प्रवक्ता भाजपा को किसी तरह यह कह कर बचाते रहे कि भाजपा ‘इन्क्लूसिव’ राजनीति में यकीन करती है। दयाशंकर को पार्टी पद से हटा दिया गया! यह वे ऐसे कहते मानो अहसान किया हो!
मामला यहीं ठंडा नहीं हुआ, अगले दिन राज्यसभा में जम कर दलित विमर्श हुआ और शायद सबसे बेहतरीन हस्तक्षेप सीताराम येचुरी का रहा, जिनने दलित विमर्श को एक ऊंचाई दी। जिसे एक बहस में भाजपा के नए संसद सदस्य जाधवजी ने अपनी तरह से पुष्ट किया।

दलित दर्द का सबसे मार्मिक चेहरा एनडीटीवी की बहस में उभरा। बरखा के एक सवाल के जवाब में मीरा कुमार ने अपनी लयात्मक शैली में कहा कि जिनको ऊना में पीटा गया उनका पेशा मरे जानवरों की खाल निकालने का है। चमड़ा तो सबको चाहिए। ये कैसे लोग हैं जो चमड़ा तो चाहते हैं, लेकिन चमड़ा काढ़ने वाले को पीटते हैं!  लेकिन चैनलों का दिल तो राहुल की कथित ‘झपकी’ पर लगा था, क्योंकि दलित विमर्श के दौरान हुई भाजपा की धुलाई, राहुल की धुलाई से ही संतुलित की जा सकती थी!

टाइम्स नाउ राहुल के चेहरे पर दो लाइनें चिपका कर पूछता रहा कि ‘वे सो रहे थे?’ या कि ‘वे सोच रहे थे?’और ‘कोढ़ में खाज’ कहिए कि कांग्रेसी प्रवक्ता राहुल के आंख मूंदने की भी तीन तेरह वाली व्याख्या करने आ जुटे। रेणुका चैधरी ने कहा कि बाहर कड़ी धूप थी, आंखों को मींड़ कर वे तरलता पैदा कर रहे थे। दूसरे ने लाइन दी कि वे कुछ सोच रहे थे, फिर लाइन आई कि वे भाषणों को आंखें बंद कर ध्यान से सुन रहे थे! तीसरे ने बताया कि वे मोबाइल देख रहे थे। राहुल ने खुद कुछ नहीं बताया!

राहुल के पीछे पड़े रहना एक चैनल का अतिरिक्त शौक है, सो उसने शाम तक आते-आते एक बहस कराई, जिसमें भाजपा प्रवक्ता राहुल को ‘स्लीपिंग प्रिंस’ कह कर आनंद लेते रहे!
अगले दिन राहुल ऊना में उत्पीड़ित किए गए दलितों के परिवारों के साथ थे। वे उनसे बात करते, चाय पीते दिखते थे। एक चैनल को इससे भी चैन न था, उसे आपत्ति रही कि ‘खर्रांटे मारने वाले’ राहुल और एनसीपी के प्रफुल्ल पटेल दलितों से मिलने क्यों पहुचे? अगर नेता न जाते तो कहते नहीं गए, गए तो कहते हैं कि फोटो खिंचवाने के लिए गए! यार! फोटो तो आपके चैनलों ने ही शाया किए, तब काहे का एतराज करते हैं। इतना ही एतराज था तो राहुल के जाने को कवर न करते!

सबसे दयनीय तर्क मुद्दे के राजनीतिकरण का रहा! दलितों की पिटाई शायद आध्यात्मिक कर्तव्य थी और उस पर चर्चा करना, उनको विजिट करना राजनीति थी? और चैनल भी इसे ‘राजनीतिकरण’ बताते थे! इस डबल पाखंड को क्या कहा जाए? तुम करो तो संस्कृति, बाकी करें तो राजनीति! भई वाह!

राहुल ने कहा: मैं उस मां से मिला, जिसके बच्चे को चालीस लोगों ने मारा। कहा, हमें दबाया जाता है। गुजरात के अस्पताल में गया, जहां ग्यारह लोगों ने आत्महत्या की कोशिश की। उनको दबाया जाता है। एक ओर गांधीजी, दूसरी ओर मोदीजी! मोदी के गुजरात में दलित दबाए जाते हैं। मैंने कहा, आप अकेले नहीं हैं! उन्होंने वेमूला से लेकर गुजरात तक के दलित अत्याचार गिना दिए और बात खत्म कर दी! और अगर यह ‘पेराट्रूपिंग राजनीति’ थी तो भी क्या बुरी थी? क्या दलितों के लिए कोई न बोले और बोले तो आपकी अनुमति से बोले?
दलित विमर्श की यह चोट भाजपा को देर तक कसकेगी!

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