ताज़ा खबर
 

बाखबर- आ बैल मुझे मार

दिल्ली में मेवाणी की रैली और एक चैनल दिखाता रहा सिर्फ खाली कुर्सियां! दूसरे ने दिखाई कि कुछ भरी हैं, बाकी खाली हैं। तीसरे ने दिखार्इं कुछ भीड़!
Author January 14, 2018 06:55 am
गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी। (फोटो-ANI)

कितने आदमी थे? सर जी कुल तीन थे! लेकिन जंतर मंतर पर कितने थे?
एक चैनल ने बताया: दो सौ! दूसरे ने कहा: तीन सौ! तीसरे ने बताया: दो हजार!
दिल्ली में मेवाणी की रैली और एक चैनल दिखाता रहा सिर्फ खाली कुर्सियां! दूसरे ने दिखाई कि कुछ भरी हैं, बाकी खाली हैं। तीसरे ने दिखार्इं कुछ भीड़!
किसकी संख्या सही? कोई नहीं बताता कि किसके कैमरों ने किस वक्त स्टॉक शॉट लिए? रैली से पहले वाली ‘खाली कुर्सियां’ थीं कि बाद वाली, कि पीक टाइम में कितने लोग थे? सटीक टाइम, सटीक संख्या बताने का कष्ट कौन करे? दृश्यों की राजनीति इसी तरह खेली जाती है।
मेवाणी, खालिद आदि को लेकर सबसे हिट शीर्षक एक अंग्रेजी चैनल ने दिया: ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’! इसे कहते हैं ‘कहानी को फिक्स करना’, उस पर ऐसा विशेषण चिपकाना, जो तुरंत चिपके और छूटे नहीं! मेवाणी का आंदोलन ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ हो गया! अब लाख हटाओ नहीं हटने वाला! एक हिंदी चैनल ने लाइन लगाई ‘आजादी गैंग का मिशन दो हजार उन्नीस’! लेकिन ‘आजादी गैंग’ मुहावरा घिस चुका है! नया हिट है ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’!
एक अंगरेजी रिपोर्टर प्रेस क्लब में आयोजित मेवाणी की पे्रस कान्फे्रंस कवर करने आया कि उसे राहुल का एक सहायक दिख गया। फिर क्या था? रिपोर्टर राहुल के सहायक के पीछे-पीछे और सहायक आगे-आगे। वह बचता हुआ और रिपोर्टर पीछा करते हुए पूछता हुआ कि सर आप किसलिए यहां आए? क्या राहुल ने भेजा है? और बेचारे सहायक जी किसी तरह बच कर निकलने की जुगत में! कुछ कदम चलने के बाद सहायक जी तेज चलने लगे, तो रिपोर्टर जी भी तेज-तेज चल कर पूछते जाते कि अरे जवाब तो देते जाइए। क्या राहुल ने भेजा आपको? परेशान सहायक जी पीछा छुड़ाने के लिए दौड़ने लगे तो रिपोर्टर जी भी दौड़ने लगे। अंत में सहायक जी को आटो वाले ने शरण देकर बचाया, वरना रिपोर्टर से पीछा न छूटता!

इसे कहते हैं असली रिपोर्टिंग! खबर के स्रोत के पीछे पड़ी रहने वाली पत्रकारिता! यह है देसी ‘पपराजी’ पत्रकारिता। पीछे पड़ाऊ पत्रकारिता!
भीमा-कोरेगांव की कहानी संभलती दिखी। कई चैनल भीमा-कोरेगांव जा पहुंचे। वहां की पंचायत की औंरतों ने कहा: हर साल मनाते हैं। यहां शांति ही रहती है, जो किया बाहर के तत्त्वों ने किया होगा और आप हमें शांति से रहने दें।…
इतने में एक मंत्री जी के संदर्भ से खबर जोर मारने लगी कि हिंसा भड़काने में मेवाणी का हाथ नहीं है। जिस पर केस हुआ उसी को ऐसी क्लीन चिट!
एक चैनल पूछता रह गया कि ये क्या हो रहा है? मंत्री जी तो सरकार में हैं, वे ऐसा क्या बोल रहे हैं? सवाल अनुत्तरित ही रहा आया। यह सब भी शायद दलित विमर्श का हिस्सा रहा!
एक अंग्रेजी चैनल अभी से दो हजार अठारह की ‘सुर्खियों’ के बारे में सोचता दिखा और आपने कार्यक्रम में आशा निराशा के बीच बहस कराता रहा। बहस में तीन निराशावादी थे एक ‘फिफ्टी आशा फिफ्टी निराशावादी’ थीं और मात्र एक आशावादी थे। निराशावादी दो हजार अठारह को निराशा से लीपते-पोतते थे, जबकि एकमात्र आशावादी आशा का अलख जगाते थे। आशावाद और निराशावाद की कुश्ती बड़ी चमत्कारी थी कि जो जितना निराशावादी था उतना हृष्ट-पुष्ट नजर आता था। ऐसी निराली निराशा सबको नसीब हो!
सबसे बढ़िया कार्यक्रम है एबीपी का वाइरल सच की असलियत बताने वाला कार्यक्रम! इस कार्यक्रम में जादू का-सा मजा होता है। इस बार आदमी को गायब कर देने वाले चीनी कपड़े का सच बताया गया कि कैसे चीन ने एक ऐसा कपड़ा बनाया है, जो आदमी को गायब कर देता है। एक आदमी एक कपड़े का परदा सामने तानता, तो गायब हो जाता। चिंता में दुबला होता एंकर सोचता कि चीनी सैनिक ऐसा करने लगे तो भारत की खैर नहीं! इसीलिए खोजी एंकर ने आधा घंटे में परदे की पोल खोल कर दम लिया और ‘चीनी हमले’ से देश को बचा लिया!

एक पार्टी को आत्म-पीड़न ही पसंद है। दो-चार दिनों में एक बार जब तक खुद को ठुकवा न ले, तब तक दर्द नहीं मिटता। शायद इसी लिए एक बड़े नेताजी कश्मीर के विलय और आतंकवाद के युग्म का कोड़ा रकीबों को पकड़ा दिए और एक चैनल पार्टी करे प्रेमपूर्वक ठोंकता रहा। कोई तो है जो ‘आ बैल मुझे मार में’ यकीन करता है!।
इस बीच एक खोजी खबरनबीस ने आधार के आधार को ही खिसकाने की हिमाकत की! एफआइआर हुई। बड़ी खबर बनी। बिरादरी ने निंदा की। खोजी पत्रकार ने रिपोर्ट किया था कि आधार का डाटा कुछ सौ रुपए में खरीदा जा सकता है और आप किसी के भी निजी डाटा में सेंध लगा सकते हैं। एक बहस में एक चिंतक जी ने फरमाया कि ये हरकत तो हैकिंग के बराबर है और हैकिंग कानूनन अपराध है। इसलिए केस तो होना ही है, लेकिन दूसरे एक अन्य अंग्रेजी पत्रकार ने फिक्रमंद एंकर को आश्वस्त किया कि गारंटी देता हूं कि उस पत्रकार पर मुकदमा नहीं चलाया जाएगा!
हाय! गालों पर इंद्रधानुष पोतने वाली वह पलटन फिर हाजिर थी। अंग्रेजी चैनलों के एंकर चहकते थे कि चलो धारा तीन सौ सतहत्तर के ‘अपराधीकरण’ के खिलाफ एलजीबीटी समूहों की सुनवाई तो शुरू हुई! क्या पता ‘खुल जा सिम सिम’ हो ही जाय!
पद्मावती ‘पद्मावत’ हो गई, लेकिन करणी सेना करणी सेना रही। आन बान शान वालों के आगे ‘सीबीएफसी’ की सनद किस खेत की मूली? जब सरकारें तक आन बान शान दिखाने लगें तब अभिव्यक्ति की आजादी किस चिड़िया का नाम है?

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.