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बाखबरः किसान-हठ बरक्स राज-हठ

इस बार वह होता दिखा, जो अब तक न दिखा था। इधर पीएम ‘मन की बात’ कहते थे, उधर धरने पर बैठे किसानों में से कुछ थाली और कनस्तर बजाते दिखते थे। ये सीन कुछ ही चैनलों ने दिखाए।

movementअपनी मांगों को लेकर धरना पर बैठे किसान। फाइल फोटो।

एक एंकर खबर देते हुए कांग्रेस के प्रति हमदर्दी में रोने लगता है : हाय हाय! राहुल बाबा ‘रोमन हॉली डे’ पर। दूसरा भी राहुल विरह में दग्ध होकर गाने लगता है कि ‘छोड़ गए राहुल, हमें हाय अकेला छोड़ गए…’ कांग्रेसी प्रवक्ता बताता रहा कि वे अपनी बीमार नानी को देखने गए हैं!
इसे क्या कहें? ‘ब्याज-स्तुति’ या ‘ब्याज-निंदा’ या ‘ब्याज-रोदन’। ‘ब्याज-रोदन’ अपनी राजनीति का बनाया अलंकार है।

इस बार वह होता दिखा, जो अब तक न दिखा था। इधर पीएम ‘मन की बात’ कहते थे, उधर धरने पर बैठे किसानों में से कुछ थाली और कनस्तर बजाते दिखते थे। ये सीन कुछ ही चैनलों ने दिखाए।

एक दिन एक नामी एंकर अपन ब्रांड गनमाइक की जगह साधरण माइक लेकर गाजीपुर बार्डर से सिंघू बार्डर पर बैठे किसानों के दिलों की बातें लाइव दिखाने सुनाने लगता है :

एक किसान : आपने कहावत सुनी होगी कि ‘राशन पानी लेकर चढ़ गया’। हम छह महीने का ‘राशन पानी लेकर दिल्ली पर चढ़ाई’ करने आए हैं।
दूसरा : हमको किसी पार्टी ने भड़काया है तो क्या उनको अंबानी आडानी ने भड़काया है?
तीसरा : किसान ही अन्न देते हैं, किसान ही देश को बचाते हैं और ये हमीं पर गुर्राते हैं।
इस बीच पत्रकार उसे जगह पहुंच जाता है, जहां एक हाथ का लिख एक हिंदी पोस्टर कहता है- ‘एक मरा हुआ पत्रकार लोकतंत्र में एक मरा हुआ नागरिक पैदा करता है।’

यह पोस्टर किसानों की चैनलों से नाराजी का सबूत है। ऐसी खबरें रही हैं कि किसानों के बीच जाना कई चैनलों के लिए निरापद नहीं है। एक हिंदी चैनल के कवरेज को लेकर यह कटाक्षमय पोस्टर लगाया गया है। शायद इसी वजह से पत्रकार महोदय भी अपने चैनल का ब्रांड गनमाइक लेकर नहीं ले गए।
चौथा किसान : हमें कोई नहीं बहका सकता। आज का किसान न तो बावला है, न अनपढ़ है, खूब पढ़ा-लिखा है।

पांचवां : जो पहले ईस्ट इंडिया कंपनी ने किया था, अब अंबानी आडानी करेंगे।
छठा : किसान मजदूर एक हो गए, तो दिल्ली बंबई सब बंद कर देंगे।
एक टप्पा गाने लगता है : ऊपर गांधी जी को राख्या नीचे बैठे चोर… बोलो ता रा रा रा…
हजारों किसान लाखों नाराजियां।

पत्रकार सिंघू बार्डर पहुंचता है, तो सरसों का साग और रोटी खाता है, फिर गरम खीर खाता है, फिर चाय पीता है और हर बार वाह-वाह करता है। पत्रकार भी पूरा खद्दूवीर है।

पत्रकार के आश्चर्य का ठिकाना नहीं है। वह कहता जाता है : ये रहा मसाज कैंप। ये रहा जिम। ये रही लाइब्रेरी। ये रही किताब की दुकान, जिसमें कुछ मार्क्सवादी साहित्य की किताबें भी दिखती हैं। एक किसान रजिस्टर दिखाता है कि यहां आने वाला चंदा दर्ज है।

धरने पर बैठे किसान एकदम दो टूक और बड़ी बेबाकी से अपने दिल की बात कहते जाते हैं और पत्रकार चकित होता जाता है।
उनकी उक्त बातें सुन कर आप खुद नतीजा निकाल सकते हैं कि कानून वापसी से कम से कुछ नहीं मानने वाले अगर कुछ मानना भी चाहें, तो उनके सलाहकार नहीं मानने देंगे।

एक ओर ‘किसान-हठ’ तो दूसरी ओर ‘राज-हठ’!
खबर चैनल बुरे फंसे हैं। सरकार के आगे सरकार की-सी कहते हैं और किसानों के बीच किसानों की-सी कहते हैं।

तीस दिसंबर की बातचीत के लिए किसान आए तो कवरेज में तने हुए दिखते थे। जब ‘लंच’ लेने लगे तो कृषिमंत्री जी ने टोका कि अकेले ही खाओगे क्या? और कृषि मंत्री जी के लिए लंगर खुल गया। मंत्री जी और उनके अमले ने किसानों का लाया लंच खाया, बाद में मंत्री की चाय भी किसानों ने पी!
इसे देख रिपोर्टरों ने नतीजा निकाला कि बातचीत अच्छे माहौल में हुई। दो किसान नेताओं से भी कहलवाया कि बातचीत अच्छे माहौल में बात हुई। दो मुद्दों पर सहमति हो गई है, बाकी दो पर चार जनवरी को होगी। इस ‘अच्छे अच्छे’ से नाराज-सा दिखता एक किसान नेता एक चैनल पर बोला कि अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। हम आपस में बात करेंगे तब आपको बताएंगे।

कोरोना की कृपा कि इस बार वाला ‘हैप्पी न्यू ईयर’ बेहद संयमित दिखा। इकतीस दिसंबर को चैनलों ने कोरोना के टीके का ‘मंगलाचरण’ भी गाया कि एक जनवरी से टीका शुरू हो जाना है। लेकिन चर्चाओं से यह साफ न हुआ कि आक्सफोर्ड एस्ट्राजेनेटिका पहले लगेगा कि ‘वोकल फॉर लोकल’ वाला यानी अपना देसी वाला पहले लगेगा।

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