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दूसरी नजरः आंकड़े और नौकरियों की हकीकत

कंसाइज ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में ‘इंटरव्यू’ शब्द का मतलब बताया गया है- एक पत्रकार और सार्वजनिक हित से जुड़े व्यक्ति के बीच आमने-सामने की बातचीत। इसे ध्यान में रखते हुए दो हफ्ते पहले अखबारों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के छपे कई ‘साक्षात्कारों’ को ‘अंत:विचार’ कहा जाना चाहिए।

कंसाइज ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में ‘इंटरव्यू’ शब्द का मतलब बताया गया है- एक पत्रकार और सार्वजनिक हित से जुड़े व्यक्ति के बीच आमने-सामने की बातचीत। इसे ध्यान में रखते हुए दो हफ्ते पहले अखबारों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के छपे कई ‘साक्षात्कारों’ को ‘अंत:विचार’ कहा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री ने पहले से तय सवालों के लिखित में जवाब दिए। यह कहना मुश्किल है कि सवाल पहले से तैयार थे और जवाब बाद में दिए गए, या फिर इसका उलट हुआ। जवाब अच्छे थे, वाकई बहुत अच्छे; अच्छे और पूरे वाक्य, अच्छा व्याकरण, अच्छी वाक्य रचना और पत्र सूचना कार्यालय की विज्ञप्तियों का बखान।

इस लेख में मैं सिर्फ एक जवाब पर बात करना चाहता हूं। यह रोजगार से जुड़ा सवाल था। यह ऐसा सवाल है जो मुझसे रोजाना पूछा जाता है, खासकर जब मैं दिल्ली के बाहर होता हूं; नौकरियां हैं कहां? मैं नितिन गडकरी की साफगोई की तारीफ करता हूं। बिना पलक झपकाए या बगलें झांकते हुए उन्होंने साफ कहा- ‘नौकरियां नहीं हैं’।

मुद्रा लोन का मिथक

मोदी के जवाब में एक वाक्य से चर्चा खत्म हो जानी चाहिए थी। उन्होंने कहा- ‘पिछले चार साल में बारह करोड़ मुद्रा लोन दिए गए। और यदि हर लोन ने एक रोजगार सृजित किया तो इसका मतलब हुआ कि बारह करोड़ नौकरियां सृजित हुर्इं।’ अगर यह सही है तो इस जवाब की कोई काट नहीं है, लेकिन क्या हर मुद्रा लोन से एक नौकरी का सृजन हुआ?

मुद्रा लोन से जुड़े व्यापक तथ्य इस प्रकार हैं : 2015-16 से 15 अगस्त 2018 तक बैंकों ने तेरह करोड़ सैंतीस लाख पचासी हजार छह सौ उनचास कर्ज दिए। कुल रकम छह लाख बत्तीस हजार तीन सौ तिरासी करोड़ रुपए जारी हुई। इस कर्ज का औसत निकालें तो यह औसत रकम सैंतालीस हजार दो सौ अड़सठ रुपए बैठती है। प्रधानमंत्री ने दावा किया है कि हर कर्ज से एक रोजगार सृजित हुआ, तो फिर तीन साल और चार महीने में बारह करोड़ रोजगार (हकीकत में तेरह करोड़ सैंतीस लाख पचासी हजार छह सौ उनचास रोजगार) सृजित हो गए! निश्चित रूप से हर साल दो करोड़ रोजगार के वादे से भी ज्यादा!

नतीजे पर पहुंचने में बहुत सारी मुश्किलें हैं। पहली बात, एक साल में सक्रिय रूप से रोजगार तलाशने वालों की संख्या करीब चार करोड़ है, अगर तेरह करोड़ बेरोजगारों को रोजगार मिला है तो भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के पहले साल में देश से बेरोजगारी खत्म हो जानी चाहिए थी! दूसरा यह कि, बेरोजगारी की दर शून्य होनी चाहिए। जबकि इसके ठीक उलट, सीएमआइई (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनोमी) के अनुसार 2017-18 में बेरोजगारी की दर 4.7 फीसद रही। तीसरा यह कि, हम यह कैसे बताते हैं कि जून, 2018 के आखिर तक सारे रोजगार कार्यालयों में चार करोड़ छब्बीस लाख तिरपन हजार चार सौ छह लोग पंजीकृत थे? और अंत में, कैसे यह बताया जाए कि जुलाई 2017 में रोजगार में लगे लोगों की संख्या चालीस करोड़ बत्तीस लाख से गिर कर जुलाई, 2018 में उनतालीस करोड़ पचहत्तर लाख रह गई?

47268 रुपए का रोजगार!

असलियत यह है कि सैंतालीस हजार दो सौ अड़सठ रुपए का कर्ज एक नौकरी सृजित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस रकम से कुछ औजार या फर्नीचर तो खरीदे जा सकते हैं, या एअर कंडीशनर लगवाया जा सकता है या फ्रिज ले सकते हैं। इसे अतिरिक्त कारोबारी पूंजी के तौर पर भी उपयोग किया जा सकता है। लेकिन किसी भी तरह से सैंतालीस हजार दो सौ अड़सठ रुपए से रोजगार सृजित करने की कल्पना नहीं की जा सकती। अगर न्यूनतम वेतन (मान लीजिए तीन हजार रुपए महीना) से भी कम पर किसी कर्मचारी को रखा जाता है, तो इस कर्ज की इस रकम से तीन हजार रुपए की अतिरिक्त आमद भी नहीं होगी जिससे लोगों को तनख्वाह दी जा सके। किसी भी अथर्शास्त्री ने प्रधानमंत्री के इस दावे कि हर मुद्रा लोन से एक रोजगार सृजित हुआ है, का समर्थन नहीं किया है।
सच्चाई यह है कि नौकरियां पैदा हो ही नहीं रही हैं। इस नतीजे की पुष्टि किस्सों और तजुर्बों दोनों से होती है। सीएमआइई का सर्वे रोजगार में लगे लोगों की कुल संख्या में गिरावट को बताता है।

दूसरी ओर, यह माना गया कि बढ़ा हुआ निवेश और बढ़ा हुआ कर्ज नौकरियों का सृजन करेगा, लेकिन निवेश और कर्ज दोनों की हालत खराब है। सकल जमा पूंजी निर्माण, जो 2011-12 में 34.3 फीसद था, वह 2013-14 में गिर कर 31.3 फीसद पर आ गया और पिछले तीन सालों के दौरान यह और गिरता हुआ 28.5 फीसद पर आ गया है। दूसरी ओर, पिछले साल के मुकाबले 2017-18 में नई निवेश परियोजाओं की घोषणा में 38.4 फीसद की और नई परियोजनाओं के पूरा होने में 26.8 फीसद की गिरावट आई है। हाल के महीनों में कर्ज वृद्धि तो देखने को मिली है, लेकिन उद्योग में साल-दर-साल कर्ज वृद्धि 0.9 फीसद रही है और एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्योग) में 0.7 फीसद (जून 2018)। मुद्रा लोन के बावजूद मार्च 2015 से मार्च 2018 के बीच एमएसएमई को दिए जाने वाले कर्ज में 504564 करोड़ रुपए से 476679 करोड़ रुपए की गिरावट आई है।

निराशाजनक प्रमाण

जो प्रत्यक्ष अनुभव देखने को मिल रहे हैं, वे हताश करने वाले हैं। मैंने कई जगह अपने श्रोताओं से पूछा कि उनमें से क्या किसी के भी साथ उसके काम में अतिरिक्त व्यक्तिको काम पर लगाया गया। थुत्थुकुडी या ठाणे या कोल्हापुर या नाशिक तक में कहीं किसी को हाथ उठाते नहीं देखा, जो यह कहता कि उसके साथ काम में अतिरिक्त आदमी को लगाया गया। दस दिन पहले दो हजार करोड़ रुपए कारोबार वाली एक निर्माण कंपनी, जिसमें डिजाइनर, इंजीनियर और आर्किटैक्ट सब काम करते हैं, के प्रबंध निदेशक ने मुझसे कहा कि और लोग रखने की बात तो दूर, पिछले दो साल में उन्होंने सौ से ज्यादा कर्मचारियों को निकाला है। सरकार ने लेबर ब्यूरो को अर्थव्यवस्था में नौकरियों के सृजन की संख्या से संबंधित तिमाही रिपोर्ट जारी करने से रोक दिया है (क्यों?) और बजाय इसके ईपीएफ, ईएसआइसी या नई पेंशन योजना (एनपीएस) के आंकड़ों को दिखाया जा रहा है। आंकड़ों के इस घालमेल से अथर्शास्त्री और सांख्यिकीविद खुद हैरत में हैं।

बेरोजगारी को लेकर जो स्थिति बनी हुई है, उससे देश की जनभावनाओं का साफ पता चल जाता है। हर सर्वे से यह खुलासा हो चुका है कि लोगों में सबसे ज्यादा चिंता अगर है तो वह ‘नौकरियों’ को लेकर है। वे जीडीपी वृद्धि के आंकड़ों से चकित नहीं हैं और प्रधानमंत्री से उलट, उन्हें लगता है कि बिना रोजगार सृजन के सामान्य वृद्धि हासिल की जा सकती है। रोजगार विहीन वृद्धि तो एक तरह का टाइम बम है।

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