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कभी-कभार : रुड़की में स्पिकमैके

रुड़की में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के दीक्षांत सभागार में स्पिकमैके के पहले शिशिर वार्षिक अधिवेशन में देश भर से आए लगभग आठ सौ छात्रों और अन्य की उपस्थिति में पहले दिन राजन-साजन मिश्र का गायन और हरिप्रसाद चौरसिया का बांसुरी वादन सुना..

Author नई दिल्ली | December 20, 2015 00:24 am

रुड़की में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के दीक्षांत सभागार में स्पिकमैके के पहले शिशिर वार्षिक अधिवेशन में देश भर से आए लगभग आठ सौ छात्रों और अन्य की उपस्थिति में पहले दिन राजन-साजन मिश्र का गायन और हरिप्रसाद चौरसिया का बांसुरी वादन सुना। यह खयाल दिमाग में घूमा कि हमारा शास्त्रीय संगीत सदियों तक मंदिरों और दरबारों से जुड़ा रहा और अब दोनों ही उससे दूर जा चुके हैं। दरबारों का दूर जाना तो समझ में आता है, क्योंकि उनका स्थान कई सार्वजनिक संस्थाओं जैसे अकादेमियों आदि ने ले लिया। पर मंदिर उत्तर भारत में अधिकतर इतने बेसुरे क्यों हो गए और उनका शास्त्रीय संगीत का प्रश्रय और संबंध इतना क्षीण क्यों हो गया, यह समझना कठिन है।

हमारी परंपरा का सच्चा-गहरा-टिकाऊ अध्यात्म सबसे अधिक मानवीय रूप में हमारे संगीत और नृत्य में ही बसता है: विराट से तादात्म्य, ब्रह्माण्ड का सहज स्पंदन, बहुलता और मिलाजुलापन आदि सब इस शास्त्रीयता में रसे-बिंधे हैं। बल्कि शायद वहीं वे सबसे अधिक बचे हैं और वहीं वे सामाजिक समरसता और साझापन सबसे अभिभूत करने वाले रूपों में रचते हैं। संगीत से मंदिरों की दूरी के अपवाद हैं, पर वे बहुत कम हैं। अलबत्ता सिर्फ कबीर से संबंधित समुदायों और संप्रदायों में संगीत की परंपरा अब भी बहुत सक्रिय है और उनमें लोक और शास्त्र की उपस्थिति अब भी केंद्रीय है।

उथले-छिछले कर्मकांड ने प्राय: सभी धर्मों को उनके अपने अध्यात्म और सृजनशीलता से दूर किया है। यह आकस्मिक नहीं है कि हम इस समय, दुर्भाग्य से, ऐसे मुकाम पर हैं जब धर्मों ने अपने को सभी तरह की सृजनशीलता और सर्जनात्मक गतिविधियों से दूर कर लिया है। वे स्वयं भी अब सृजनशील नहीं रह गए हैं। इसका कोई सामाजिक या सांस्कृतिक औचित्य खोज पाना संभव नहीं लगता।

धर्मों का जनतांत्रिकीकरण उनकी अपार व्याप्ति के बावजूद नहीं हो पाया है। पर शास्त्रीय संगीत और नृत्य का हुआ है: उन्होंने अपना एक व्यापक रसिक-समुदाय विकसित किया है, जिसमें सब वर्गों और वर्णों के लोग शामिल हैं। स्पिकमैके जैसी संस्था और आंदोलन ने इसमें बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उसने शास्त्रीय कलाओं की रसिकता, सुरुचि और समझ सभी को युवाओं में फैलाया है। उनकी भारी उपस्थिति रुड़की में फिर इसका जीता-जागता साक्ष्य थी और उसे देखना बहुत प्रीतिकर था।

राजनीति से अप्रभावित:

हमारा मीडिया राजनीति से इस कदर आक्रांत है कि उससे अलग जो वृत्तियां या घटनाएं होती रहती हैं उन पर अक्सर उसका ध्यान तक नहीं जाता। स्वयं राजनीति को शायद मीडिया ने यह भयंकर आत्मविश्वास दे दिया है कि वही देश और समाज की सबसे कारगर नियामक है। लोकतंत्र में सारी नागरिकता एक तरह से राजनीतिक हो भी जाती है, क्योंकि अंतत: लोकतंत्र एक राजनीतिक व्यवस्था है। हमने जिस तरह का लोकतंत्र विकसित किया है उसमें व्यक्ति की नगण्यता बढ़ती गई है। समूह, जातियां, व्यवसाय, धर्म, संप्रदाय आदि सबकी प्रासंगिकता होती है, पर व्यक्ति की नहीं। यह और बात है कि शक्तिशाली व्यक्ति अपनी छवि और आतंक दोनों ही स्थापित करने में, इसी लोकतंत्र में, सफल होते रहते हैं। यह एक अंतर्विरोध है और सच्चाई भी।

साधारण व्यक्ति की कोई जगह नहीं होती, पर असाधारण व्यक्ति पर पूरी रोशनी पड़ती रहती है। यह असाधारणता हो सकता है कि किसी व्यक्ति ने अध्यवसाय और संघर्ष करके अर्जित की हो: पर वह उसे वंश, धर्म, जाति, परिवार आदि से उत्तराधिकार में भी मिल सकती है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि बहुत सारे व्यक्ति इसलिए वर्चस्व पा गए हैं कि वे किसी परिवार, जाति, धर्म, विचारधारा आदि के हैं। ऐसे व्यक्तियों के पास प्रतिभा की भले कमी हो, आकांक्षा का अभाव नहीं होता: वे ऊपर पहुंच और वहां देर तक बने रह सकते हैं। कई क्षेत्रों के बारे में इन दिनों आमतौर से यह कहा-माना जाता है कि उनमें सचमुच के मूर्धन्यों की कमी है: मूर्धन्यता के बिना भी हमारे समय में, आप शिखर पर पहुंच और रह सकते हैं।

इस स्थिति के बरक्स यह भी सही है कि ऐसे बहुत सारे समूह और लोग हैं, जो राजनीति से अप्रभावित और अविचलित रह कर अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय हैं। ये क्षेत्र ज्ञान और सृजन के, नवचार और जनहित के, आविष्कार और शोध के, पहल और साहस के, कल्पना और आस्था आदि के हैं। उनको राजनीतिक प्रश्रय भले न मिलता हो, थोड़ी-बहुत सामाजिक मान्यता और सम्मान जरूर मिलते रहते हैं। उनका वर्चस्व, दुर्भाग्य से, नहीं होता पर जगह होती है। कई बार यह लगता है कि ऐसे लोगों को राजनीति में आकर खोखलेपन, मूल्यहीनता, बाजारूपन और आत्मरति से उसे मुक्त करना चाहिए। या, कम से कम, वैकल्पिक राजनीति बन कर एक चुनौती बन सकना चाहिए। चालू राजनीति में ही घुसपैठ कर कोई वैकल्पिक विधा रच-गढ़ पाना चाहिए।

फिर यह खयाल आता है कि बाजार से मिल कर आज की राजनीति, जो सब कुछ को लील लेने या पालतू बनाने पर आमादा है, ऐसे किसी विकल्प को पनपने ही नहीं देगी। जो लोग उसका विकल्प खड़ा करना चाहते हैं वे उसमें सफल नहीं हो पाएंगे, होने नहीं दिए जाएंगे और राजनीति से अलग वे जो कुछ सर्जनात्मक कर रहे थे वह भी समाप्त या शिथिल हो जाएगा। यह दुविधा सच्ची है और इसे बरका कर शायद कुछ टिकाऊ या कारगर नहीं हो सकता। पर उसका समाधान क्या निकले, यह भी समझ में नहीं आता। लोकतंत्र में राजनीति को सिर्फ राजनेताओं के जिम्मे नहीं छोड़ा जा सकता!

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