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दूसरी नजरः दक्षिण की लपटें देश को झुलसा सकती हैं

केंद्र सरकार ने यह आग भड़काई है। यह बुझाई जानी चाहिए, इससे पहले कि दक्षिण की लपटें पूरे देश को झुलसाने लगें।

Author April 8, 2018 06:29 am
प्रतीकात्मक चित्र

भारत के संविधान ने राष्ट्रपति (यानी केंद्र सरकार) के लिए यह अनिवार्य जिम्मेदारी तय कर रखी है कि वे हर पांच साल पर वित्त आयोग का गठन करें (अनुच्छेद 280)। इस आयोग का प्रमुख काम है ‘करों से मिलने वाले शुद्ध राजस्व का केंद्र और राज्यों के बीच बंटवारा किस प्रकार हो…और इस राजस्व से विभिन्न राज्यों को रकम किस प्रकार आबंटित हो’, इस बारे में राष्ट्रपति से सिफारिश करना।

वित्त आयोग के और भी काम हैं, पर वे उस विवाद से ताल्लुक नहीं रखते, जो इस निबंध का विषय है। ऊपर वित्त आयोग का जो पहला काम बताया गया है, उस संदर्भ में सारे राज्य एक साथ हैं: वे हर वित्त आयोग से करों में अपने लिए और अधिक हिस्से की मांग करते हैं।

पिछले वित्त आयोग के मुताबिक राज्यों का हिस्सा तय था- बयालीस फीसद।

ऊपर आयोग का जो दूसरा काम बताया गया है- राज्यों के बीच आबंटनों का निर्धारण- उसी को लेकर विवाद खड़ा हुआ है। हर राज्य और अधिक हिस्सा चाहता है, लेकिन कुल सौ फीसद से अधिक नहीं हो सकता (बयालीस फीसद का)। यह भी संभव नहीं है कि राज्यों के भिन्न-भिन्न हिस्से हमेशा के लिए तय कर दिए जाएं, क्योंकि आबंटन के मद्देनजर वस्तुगत स्थितियां पांच साल में बदल सकती हैं, और बदली भी हैं। अगर किसी राज्य के हिस्से में मामूली कटौती भी की जाती है, तो वह नाराज हो जाता है। किसी भी वित्त आयोग का काम आसान नहीं रहा है, पर पंद्रहवें वित्त आयोग (जिसका गठन नवंबर 2017 में हुआ था) के जितना कठिन काम शायद ही किसी अन्य आयोग का रहा होगा।

विचलन पर सवाल
इसका कारण पंद्रहवें वित्त आयोग के काम के दायरे में निहित है। इस आयोग का भी मुख्य काम वही है जो पहले के आयोगों का रहा है, पर दो बातें पहले से भिन्न हैं।
पहला यह कि पंद्रहवें वित्त आयोग से कहा गया कि वह किए गए कामों पर आधारित प्रोत्साहन पर विचार करे, जिन कामों में यह भी शामिल हो-
* आबादी की जन्मदर को संतुलित करने की दिशा में प्रयास और प्रगति;
* भारत सरकार की योजनाओं का कार्यान्वयन;
* लोकलुभावन कामों पर होने वाले खर्च पर नियंत्रण।

दूसरा यह कि वित्त आयोग 2011 की जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल करेगा, न कि 1971 की जनगणना के आंकड़ों का, जो अब तक होता रहा था।
ये दोनों बदलाव, बड़े बदलाव हैं, और इन्होंने केंद्र तथा राज्यों के रिश्तों पर गंभीर असर डाला है। मूल रूप से संविधान केंद्र को कराधान के अधिक अधिकार देता है और खर्च की ज्यादा जिम्मेदारियां राज्यों पर डालता है। लिहाजा, केंद्र के शुद्ध कर-राजस्व के बंटवारे के लिए एक उचित व्यवस्था की जरूरत है। राज्य की विधानसभा को राज्य के बजट की बाबत उतना ही अधिकार है जितना केंद्रीय बजट को लेकर लोकसभा को। वित्त आयोग राज्यों पर केंद्र की योजनाओं या मर्जी को थोपने का जरिया नहीं है। संवैधानिक रूप से, राज्य को यह कहने का हक है कि ‘करों में मेरा वाजिब हिस्सा दो और मुझे अपनी विधानसभा के निर्णयों के अनुसार काम करने के लिए छोड़ दो।’

बेहतर काम की सजा
दूसरा बदलाव काफी विवादास्पद है। इसके पहले, 1971 की जनगणना के आंकड़े आधार थे। आंकड़ों को इस प्रकार निश्चित कर देने के पीछे यह सहमति थी कि उन राज्यों के हितों का खयाल रखा जाए जिन्होंने अपनी जनसंख्या के स्थिरीकरण में काफी अच्छा काम किया है। थोड़ा विचलन चौदहवें वित्त आयोग ने ही कर दिया था; उसने 1971 की जनगणना के आंकड़ों का मान 25 फीसद से घटा कर 17.5 फीसद कर दिया था। पंद्रहवें वित्त आयोग को यह निर्देश देना कि वह 1971 के आंकड़ों के बजाय 2011 के आंकड़ों को अपने हिसाब में ले, साफतौर पर उन राज्यों के लिए सजा है जिन्होंने अपनी आबादी के स्थिरीकरण की दिशा में 1971 से 2011 के बीच शानदार काम किया है।
यह तर्क कि कम राजकोषीय क्षमता, कम राजस्व, ऐतिहासिक प्रतिकूलताओं वाले और विकास में पिछड़े रहे राज्य अधिक मदद के हकदार हैं, एक मजबूत तर्क है। चौदहवें वित्त आयोग ने यह स्वीकार किया था, जब उसने ‘राजकोषीय सक्षमता’ का मान 47.5 फीसद से 50 फीसद कर दिया था- अन्य सभी मानकों से ज्यादा। हालांकि 1971 के आंकड़ों के बजाय 2011 के आंकड़ों को अपनाना सही नहीं ठहराया जा सकता: वास्तव में, यह उन राज्यों को एक विकृत प्रोत्साहन है जिन्होंने अपनी जनसंख्या के स्थिरीकरण के तकाजे की अनदेखी की है।
बेहतर शासन और बेहतर परिणाम वाले राज्य पहले ही अपने हिस्से में काफी-कुछ गंवा चुके हैं (देखें तालिका):

राज्य वित्त आयोग द्वारा निर्धारित हिस्सा (प्रतिशत में)
10वां आयोग 11वां आयोग 12वां आयोग 13वां आयोग 14वां आयोग
आंध्र (अविभाजित) 8.465 7.701 7.356 6.937 6.742
कर्नाटक 5.339 4.930 4.459 4.328 4.713
केरल 3.875 3.057 3.665 2.31 2.500
तमिलनाडु 6.637 5.385 5.305 4.969 4.023
कुल 24.316 21.073 19.785 18.575 17.978

आग बुझाएं
चार दक्षिणी राज्यों ने बेहतर शासन और बेहतर नतीजों के बावजूद 6.338 फीसद का नुकसान उठाया है। यह इसलिए हुआ क्योंकि भारत की जनसंख्या में उनका हिस्सा घटा है! वर्ष 1971 की जनगणना के मुताबिक कुल जनसंख्या में उनका हिस्सा 24.7 फीसद था, जबकि यह कम होकर 2011 में 20.7 फीसद रह गया। अगर अन्य सभी मानकों को यथावत बनाए रखा जाए, तब भी सिर्फ इस एक प्रावधान से कि पंद्रहवें वित्त आयोग को 2011 की जनगणना के आंकड़ों को अपने हिसाब में लेना होगा, दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी और घट जाएगी।

1991 के बाद, हरेक राज्य खुली अर्थव्यवस्था, कमतर नियंत्रण और राज्य-केंद्रित रणनीतियों का लाभ उठा सकता है। जो राज्य कभी कम उद्यमी माने जाते थे, वे अब ऊंची वृद्धि दर का दावा कर रहे हैं। हमें उन राज्यों से हमदर्दी है जो अपेक्षया गरीब हैं, लेकिन हम बेहतर कार्य-प्रदर्शन वाले राज्यों के हकों और उनकी आकांक्षाओं की अनदेखी नहीं कर सकते।

केंद्र सरकार ने यह आग भड़काई है। यह बुझाई जानी चाहिए, इससे पहले कि दक्षिण की लपटें पूरे देश को झुलसाने लगें।

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