ताज़ा खबर
 

‘दलित विमर्श’ कॉलम में सूरजपाल चौहान का लेख : हकीकत के रूबरू

दलित आत्मकथाएं पीड़ा, संघर्ष और क्रोध का मिलाजुला अभिनव स्वर हैं, जिसे साहित्य के जनतंत्र में पहले नहीं देखा-सुना गया। हिंदी दलित आत्मकथाओं ने पाठकों को गहरे तक छुआ है।

Author नई दिल्ली | July 24, 2016 5:43 AM
दलित सदस्यों के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया।

स्कूल-कॉलेजों में शुरू से पढ़ाया जाता है कि भारत एक कृषिप्रधान देश है। मगर इसके साथ एक बात और जोड़नी चाहिए थी कि भारत एक जातिप्रधान देश भी है। यहां मनुष्य की पहचान उसके गुण या दोष से नहीं, जाति से होती है। हिंदी साहित्य में शुरू से लेखक ग्रामीण जीवन के बारे में बड़े गर्व से अपनी कविताओं, कहानियों, उपन्यासों में यथार्थ से कोसों दूर वर्णन करते रहे हैं। आज भी वे अपने लेखन में हवाई बातें करते हैं। लिख रहे हैं: ‘भारत के गांव स्वर्ग हैं और वहां भारतीय आत्मा निवास करती है।’ ये लोग गांवों में चंद रोज के लिए भंगी, चमार, महार या डोम बन कर रहें तो पता चलेगा कि भारत के गांव कैसे स्वर्ग हैं और वहां के गली-मोहल्ले में कैसी भारतीय आत्मा निवास करती है? हिंदी साहित्य का सारा का सारा पुलिंदा झूठ पर टिका है।

इसी तरह की बातें करके सब कुछ गड्डमड्ड करने का हमेशा से प्रयास होता रहा है। जैसे ही हिंदी क्षेत्र में दलित समाज के लेखकों ने अपना दुख-दर्द व्यक्त करना शुरू किया, बवाल मच गया- ‘अरे, हम क्यों नहीं लिख सकते दलित साहित्य, क्या दलित पर लिखने के लिए दलित होना जरूरी है?’ अरे भाई, आज तक गैर-दलित लेखक ही तो दलितों पर लिख रहे थे। लेकिन कितनी हैरानी की बात है, हिंदी के किसी गैर-दलित लेखक ने आज तक कोई ऐसी कविता, कहानी, उपन्यास या आत्मकथा क्यों नहीं लिखी, जिसे देश के दलितों ने सहर्ष स्वीकार किया और अपना माना हो। आखिर दलित लेखकों को मुंशी प्रेमचंद के डंडे से कब तक पीटा जाता रहेगा। फिर प्रेमचंद ने मात्र लाक्षणिक लेखन किया है। दूसरे गैर-दलित लेखकों ने तो इतना भी नहीं किया।

दुनिया की सबसे क्रूर और पिछड़ी व्यवस्था अगर कोई है तो वह वर्णव्यवस्था है। आज भी इस देश के दलितों की हालत जानवरों से भी बदतर है। किसी दलित ने मंदिर में घुसने भर की कोशिश की तो उसकी नाक में नकेल डाल कर, निर्वस्त्र करके पूरे गांव और शहर की गलियों में घुमाया जाता है। दलित महिला सरपंच को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर घोर अपमान सहना पड़ता है। आए दिन अखबारों में पढ़ने को मिलता है कि दलितों को जिंदा जला दिया गया। दुनिया में शायद ही कोई ऐसी सामाजिक व्यवस्था होगी, जिसमें एक मनुष्य द्वारा त्यागे मल को दूसरा मनुष्य अपने सिर पर उठाने को बाध्य होता हो!

वर्षों से चतुरंगी वर्णव्यवस्था में दलितों को अशिक्षित और निरक्षर बनाए रखने के षड्यंत्र किए गए हैं। इस व्यवस्था के कई प्रयोजन थे। एक ओर दलितों में निरक्षर, अशिक्षित और मूर्ख होने की हीन-भावना भरी जाती रही, वहीं दूसरी ओर दलित-विरोधी मूल्यों से अंतर्व्याप्त साहित्य सृजित किया गया। अब समय बदला है, देश के दलित समुदाय में शिक्षितों का एक बड़ा वर्ग तैयार हो गया है, जो द्विजों द्वारा लिखे साहित्य की असलियत समझता है और चुनौती की मुद्रा में है। दलित रचनाकारों को अंडबंड साहित्य लिखने वालों के सारे ढोंग, सारे आडंबरों की अब समझ आ गई है और दलित उन्हें नकारने की घोषणा कर चुके हैं।

छुआछूत के मामले में गांवों में आज भी वैसी ही स्थिति है, जो पचास-साठ साल पहले थी। शहरों या कस्बों में जो थोड़ी कमी देखने में आती है, उसका कारण द्विजों में आत्ममंथन का नहीं, दंड का भय अधिक कारगर रहा है और यह दंड का अधिकार दिया है संविधान ने। 1998 से पहले जितने सांप्रदायिक दंगे होते थे, उनमें एकदम से कमी आई है, उसका एकमात्र कारण रहा है दलितों में आई जागृति। उनमें यह जागृति दलित साहित्य से आई है। दलित साहित्य दोहरे-तिहरे शोषण की जानकारी देता है। यह आत्मसम्मान की बात करता है, यह भाईचारे और बराबरी की बात करता है। इससे पहले का भारतीय साहित्य सौंदर्यशास्त्रीय कसौटियों पर कसा जाता था। पहली बार दलित साहित्य ने वे कसौटियां ही बदल दी। अब सौंदर्यशास्त्र की जगह समाजशास्त्र प्रमुख हो गया है। दलित साहित्य अस्मिता का साहित्य बन गया है।

दलित पीड़ा को वही जान सकता है, जिसने उसे भोगा या सहा हो। दलित आत्मकथाओं के लिखने का उद्देश्य भी यही है कि समस्त समाज के लोग इन्हें पढ़ें और अपने इर्द-गिर्द बुने साजिश को समझें। दलित आत्मकथाएं चिढ़ाने या गैर-दलितों को गुस्सा दिलाने के लिए नहीं लिखी जा रही हैं। उन्होंने गैर-दलितों के मुंह, नाक और कानों से हाथ खींच कर अलग किया है और उनकी आंखों में अंगुली डाल कर कहा है कि जिस हिंदू समाज के ये गैर-दलित नियामक हैं, उसी में हम भी रहते आ रहे हंै- हजारों वर्षों से। दलित आत्मकथाएं शब्दों का जाल नहीं बुनतीं। परिदृश्यों में सहजता और स्वाभाविकता कायम रखना दलित आत्मकथाओं का शिल्पगत गुण है। दलित जब लिखेगा सच ही लिखेगा।

दलित आत्मकथाएं पीड़ा, संघर्ष और क्रोध का मिलाजुला अभिनव स्वर हैं, जिसे साहित्य के जनतंत्र में पहले नहीं देखा-सुना गया। हिंदी दलित आत्मकथाओं ने पाठकों को गहरे तक छुआ है। दलित आत्मकथाकार लेखक होने के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता भी है। उनके आंबेडकरवाद की आक्रामकता संवाद के लिए उकसाती है, गैर-दलितों को चिढ़ाने या भगाने के लिए नहीं। लेकिन कुछ लोग आज भी अपने दुराग्रह का लट्ठ लिए दलित आत्मकथाकारों के पीछे घूम रहे हैं और सच्चाई से मुंह फेर कर हो-हल्ला मचाने में लगे हुए हैं।
आरोप लगाने वाले भूल जाते हैं कि दलित आत्मकथाएं समय और समाज के उस झूठ को आईना दिखाती हैं, जहां धर्म की सहिष्णुता और सौहार्द के यशोगान हजारों साल से गंूज रहे हैं। दलित आत्मकथाएं सचमुच आज एक जीवंत विधा है। दलित आत्मकथाएं सत्य के धरातल पर बेहद दिलचस्प, बेधड़क, मार्मिक और कुनैन की तरह कड़वी हैं।

साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में दलित आत्मकथाओं की खूब चर्चा रही है। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में भी पढ़ाई जाने लगी हैं। भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त विदेशी भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है। दलित आत्मकथाओं की मुख्य विशेषता है इनकी प्रामाणिकता। प्रमाणिकता के कारण ही दलित आत्मकथाएं गैर-दलित आत्मकथाओं से एकदम भिन्न हैं। दलित आत्मकथाकारों ने अपने जीवन के यथार्थ को पूर्ण रूपेण बेपर्दा किया है। हमारे जीवन के यथार्थ में गैर-दलितों को घिन नजर आती है। हमारे गांवों के मोहल्लों से गुजरने पर इनकी नाक बदबू से फट जाती है।

आजकल दलित आत्मकथाओं को लेकर एक नई बात कही-सुनी जा रही है कि जिस दमखम और गंभीरता से हिंदी दलित आत्मकथाओं पर काम हुआ है वह दलित साहित्य की अन्य विधाओं में नहीं हुआ। अब इन्हें कौन समझाए या बताए कि कविता और कहानी के कारण ही दलित साहित्य का विकास हुआ है। हिंदी दलित साहित्य में पहले कविता और कहानी संग्रह ही प्रकाशित होकर आए। दलित लेखकों ने साहित्यिक रचनाओं के साथ-साथ आत्मकथा को भी अपने दुख-दर्द और संताप की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है। जिस सच्चाई का बयान गैर-दलित लेखक अतिरिक्त साहस जोड़ कर भी नहीं कर सकते थे, उसे दलित लेखकों ने सहज भाव से कर दिखाया है।

दलितों की वेदना ही दलित साहित्य की जन्मदात्री है। यह एक व्यक्ति विशेष की वेदना नहीं है और न ही यह एक दिन की है। यह वेदना हजारों की है और हजारों वर्षों की है। इसलिए यह व्यक्त होते समय समूह स्वरूप व्यक्त होती है। गैर-दलित लेखक दलित आत्मकथाओं पर भाषागत सौंदर्य न होने का भले आरोप लगाते रहें, लेकिन दलित जीवन के यथार्थ की ईमानदार अभिव्यक्ति का सहज आकर्षण और संघर्ष तो होता ही है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App